पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 21 साल पुराने दोहरे हत्याकांड में दोषी को राहत देने से इनकार कर दिया है। जस्टिस विनोद एस भारद्वाज, सुखविंदर कौर की खंडपीठ ने मोहन लाल नामक दोषी की अपील को खारिज करते हुए निचले कोर्ट द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। मोहन लाल ने 18-19 जनवरी 2003 की रात अपने दोस्त की पत्नी को हासिल करने के लिए अपने ही दोस्त और अपनी पत्नी की हत्या कर दी थी। अगली सुबह जब भजन लाल के परिजन मोहन लाल के घर पहुंचे तो उसने दावा किया कि दोनों ने जहरीला पदार्थ खाकर आत्महत्या कर ली है। कहानी बनाई कि उसने दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में देखा था इसलिए बदनामी के डर से उसने पुलिस को सूचित नहीं किया, दोनों के शवों का अंतिम संस्कार भी कर दिया। दोषी ने केस को मोड़ने के लिए झूठा पत्र लिखा, जो भजन लाल द्वारा बताया गया था। एफएसएल की जांच में खुलासा हुआ कि वह पत्र मोहन लाल ने लिखा था। कोर्ट ने यह भी माना कि मोहन लाल की निशानदेही पर मिली इंसुलिन की शीशी और सिरिंज इस अपराध की सबसे बड़ी कड़ियां थीं। कोर्ट ने टिप्पणी की कि भजन लाल और संतोष रानी के बीच किसी अवैध संबंध का कोई ठोस सबूत नहीं था, यह पूरी कहानी कातिल ने खुद गढ़ी थी। 2005 में शुरू हुई थी कानूनी जंग: सिरसा की अतिरिक्त सत्र अदालत ने 27 सितंबर 2005 को मोहन लाल को दोषी करार दिया था। उसे आईपीसी की धारा 302 के तहत उम्रकैद और जुर्माना लगाया गया था। 21 साल तक चली लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद अब हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ियां मोहन लाल के गुनाह को साबित करने के लिए पर्याप्त हैं। कोर्ट ने कहा कि दोषसिद्धि में किसी भी हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।
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हैंड राइटिंग ने खोला था कातिल का राज, हाईकोर्ट ने उम्रकैद बरकरार रखी
