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नमस्कार, रामजी का वनवास 14 साल में पूरा हो गया था। लेकिन कई ग्रेड थर्ड टीचर्स का ‘वनवास’ है कि खत्म होने का नाम नहीं लेता। सड़क पर सुरक्षा के लिए हेलमेट पहनना जरूरी है, लेकिन अब क्या हॉस्पिटल में भी हेलमेट पहनें? शहर-शहर पानी से भरे ‘क्रेटर’ क्रिएटर्स को आकर्षित कर रहे हैं। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1. मास्टरजी का नौकरी वाला ‘वनवास’ रामचंद्र जी अगर थर्ड ग्रेड टीचर होते तो 14 साल बाद भी घर लौटने की गारंटी नहीं थी, क्योंकि कई टीचर्स 15 साल से घर जाने की ताक में हैं। तबादला नहीं हुआ। जिस भांति भगवान राम ने वनवास के दौरान निषादराज को गले लगाने, सुग्रीव को न्याय दिलाने, शबरी का सम्मान करने और रावण को परास्त करने जैसे कई काम किए। उसी तरह ग्रेड थर्ड शिक्षक भी चुनावी सूचियां बनाने, SIR की लिस्ट भरने, मकानों-पोखरों-जोहड़ों की गणना करने, वन्यजीव गिनने, मातृ-शिशु की जन्म-मृत्युदर के आंकड़े जुटाने जैसे महत्वपूर्ण काम करता है। भगवान राम तो फिर भी 14 साल बाद घर लौट आए थे, लेकिन शिक्षकों का वनवास जारी है। वे दीपावली पर घर जा सकते हैं, लेकिन छुटि्टयां खत्म होते ही फिर लौटना पड़ता है। तबादला हुए बिना ये वनवास खत्म नहीं होगा। यही टीस लेकर राजधानी में बड़ी तादाद में टीचर जुटे। टेंट के नीचे बच्चों के साथ बैठे। पोटली भर-भर कर आवेदन पहुंचाए। वार्ता पर वार्ता चली। एक बार तो प्रतिनिधियों और शिक्षकों के बीच ऐसी स्थिति बन गई कि डटे रहें या उठ जाएं। आखिरकार मंत्रीजी के आश्वासन पर धरना समाप्त हो गया। संयोजक साहब ने माइक थामकर ऐलान कर दिया- ये तो ट्रेलर था, अगर समझौता नहीं माना तो पिक्चर भी दिखा देंगे। 2. हॉस्पिटल में भी हेलमेट अनिवार्य हो सरकारी अस्पतालों और स्कूलों में भी हेलमेट अनिवार्य कर देना चाहिए। क्योंकि हालात तो सुधरने से रहे। सरकारी इमारतों की दशा बड़ी खराब है। ऐसे में चौमासे-चौमासे सरकारी इमारतों से पाला न ही पड़े तो अच्छा। फिर भी मजबूरी में जाना ही पड़ जाए तो मोबाइल में ध्यान मत रखिएगा। छत की तरफ देखकर चलिएगा। क्या पता कब कोई प्लास्टर या झुका हुआ छज्जा आप पर आ गिरे। लोग घायल होकर हॉस्पिटल जाते हैं, यहां तो हॉस्पिटल जाकर घायल हो रहे हैं। चूरू के सुजानगढ़ में जनाना हॉस्पिटल के बरामदे का प्लास्टर काफी टाइम से जर्जर था। एक महिला इलाज कराकर लौट रही थी। बरामदे का जर्जर प्लास्टर सीधा उसके सिर पर आकर गिरा। गमीमत रही कि जान बच गई। प्रभारी ने बताया कि 2-3 बार लिखकर दे चुके, मरम्मत नहीं कराई गई। कुछ और कमरों का प्लास्टर कहीं-कहीं से झड़ चुका है। कहीं झड़ने वाला है। हो सकता है मरम्मत न कराना भी इलाज की कोई पद्धति हो। बीमार आदमी का ध्यान अपनी बीमारी से हटकर छत की तरफ चला जाएगा। प्लास्टर की हालत देखकर बीमार व्यक्ति ‘अमृत’ का गाना गुनगुनाएगा- दुनिया में कितना गम है, मेरा गम कितना कम है। शुक्र है नेताजी ने इस घटना को लेकर कुछ नहीं कहा। कुछ कहते तो यही कहते-बताओ प्रभारी जी, प्लास्टर महिला पर गिरा था या महिला ही नाचते-कूदते… 3. चलते-चलते.. जरा बारिश बरसती है और शोर मच जाता है- फलां इलाके में ड्रेनेज की पोल खुल गई। फलां सड़क पर गड्ढा हो गया। अब बारिश होगी तो पानी भी भरेगा, गड्ढे भी होंगे। यह कोई नई बात थोड़े ही है। नदियों का कैचमेंट एरिया खाकर आदमी जल-जमाव की फिक्र करता है। दूसरी बात यह कि बारिश रोजगार लेकर आती है। सड़कें टूटेंगी तो नई सड़क का टेंडर निकलेगा। ठेकेदारों-मजदूरों को रोजगार मिलेगा। गड्ढे होंगे तो कारों-बाइकों में मरम्मत का काम पैदा होगा। मैकेनिकों को रोजगार मिलेगा। गड्ढे में गिरकर किसी का स्पाइनल कोड खिसकेगा तो अस्पतालों को काम मिलेगा, दवा विक्रेता कमाएंगे। कीचड़ से कपड़े गंदे होंगे तो साबुन बिकेगा, वॉशिंग पाउडर बिकेगा। कपड़े धोने की मशीनें बिकेंगी। अब हजारों लोगों को जो गड्ढे, भरा हुआ गंदा पानी रोजगार दे रहा है तो कुछ लोगों के पेट में पता नहीं क्यों दर्द होने लगता है। वे विरोध करने लगते हैं। इससे अच्छा यह होना चाहिए कि हम गड्ढों के चारों ओर नाच-नाच कर उत्सव मनाएं और इन्हें रोजगार का देवता घोषित कर दें। इनपुट सहयोग- स्मित पालीवाल (जयपुर), सुनील स्वामी (सुजानगढ़, चूरू)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल सुबह 7 बजे मुलाकात होगी।
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हॉस्पिटल में भी 'हेलमेट' पहनें क्या?:टीचर, ट्रांसफर और 'रामजी का वनवास'; गड्ढों में 'वेनिस' का नजारा
