सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल, कॉकरोच पार्टी का संसद मार्च, रोकने के लिए आंसू गैस के गोले, लाठियां, अफरा-तफरी…। लेकिन धर्मेंद्र प्रधान अब भी शिक्षा मंत्री की कुर्सी पर जमे हैं। सवाल उठ रहे कि आखिर पीएम मोदी धर्मेंद्र प्रधान से हटाकर आंदोलन खत्म क्यों नह
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धर्मेंद्र प्रधान को अब तक न हटाए जाने के पीछे 4 बड़े फैक्टर्स हैं…

- सरकार ये नैरेटिव नहीं बनने देना चाहती कि दबाव में झुक गई। UPA सरकार को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी। मोदी सरकार उसी से सबक ले रही है।
- सीनियर जर्नलिस्ट नीरजा चौधरी बताती हैं कि यूपीए के दौर में अशोक चह्वाण से शुरू हुआ इस्तीफों का दौर कई मंत्रियों को ले डूबा। यूपीए सरकार दबाव संभाल नहीं पाई और उसकी छवि बिगड़ती चली गई।
- पॉलिटिकल एक्सपर्ट रशीद किदवई कहते हैं कि सरकार ने धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफा ले लिया, तो संदेश जाएगा कि सरकार से गलती हुई है। मोदी सरकार किसी तरह से ये नहीं दिखाना चाहती है कि उसने किसी दबाव या आरोप के चलते अपने मंत्री का इस्तीफा लिया।
- इसलिए शुरुआत से ही नैरेटिव बना रही है कि वो सिस्टम को सुधार रहे हैं। NEET 2026 पेपर लीक मामले में CBI, राजस्थान SOG और राज्यों की पुलिस जांच कर रही हैं। वहीं 21 जून को रि-एग्जाम कराकर 16 जुलाई को रिजल्ट जारी कर दिया।
- NTA को दुरुस्त करने के लिए सरकार ने 2 जॉइंट सेक्रेटरी- अनुजा बापट और रुचिरा विज, 2 नए जॉइंट डायरेक्टर- आकाश जैन और आदित्य राजेंद्र भोजगढिया को एजेंसी में भेजा है।

- 2015 में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की सीएम वसुंधरा राजे पर आरोप लगे कि दोनों ने लंदन में रह रहे भगोड़े ललित मोदी की वहां से पुर्तगाल जाने में मदद की है। सुषमा और वसुंधरा के इस्तीफे की मांग होने लगी।
- तब 24 जून 2015 को केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने एक बयान दिया- ‘नहीं… नहीं, इसमें (मोदी सरकार में) मंत्रियों के त्यागपत्र नहीं होते हैं, भैया। यूपीए सरकार नहीं है, ये एनडीए सरकार है।’ राजनाथ का यही बयान बीजेपी सरकार का अघोषित नियम बना हुआ है।
- इसके बाद भी कई मंत्रियों के इस्तीफा की मांग हुई, लेकिन इन्हें तब नहीं हटाया गया। जैसे- इसके बाद लगातार ट्रेन दुर्घटनाओं के कारण रेल मंत्री सुरेश प्रभु, 4 किसानों को गाड़ी से कुचलने का बेटे पर आरोप लगने के कारण गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा टेनी, JNU विवाद और रोहित वेमुला आत्महत्या मामले के चलते मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी।
- पॉलिटिकल एनालिस्ट रशीद किदवई बताते हैं कि मोदी सरकार में किसी मंत्री के इस्तीफा न देने का इतिहास रहा है। सिर्फ एमजे अकबर का मामला छोड़ दें तो। 2018 में #MeToo मामले में एम.जे. अकबर ने विदेश राज्यमंत्री के पद से इस्तीफा दिया था।
- नवंबर 2021 में भी विपक्ष ने गड़बड़ी, भ्रष्टाचार जैसे आरोपों का सामना कर रहे बीजेपी नेताओं के इस्तीफे की मांग की। वरना संसद नहीं चलने देने की धमकी दी। तब भी मोदी सरकार ने विपक्ष को संदेश भिजवा दिया कि ऐसा कुछ नहीं होगा।
- धर्मेंद्र प्रधान बीजेपी के कद्दावर नेता और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री रहे देवेंद्र प्रधान के बेटे हैं। कम उम्र से ही संघ से जुड़े। 1983 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में सक्रिय हुए।
- 1998 में बीजेपी से जुड़े। 2000 में पहला चुनाव जीतकर विधायक बने। 2004 से केंद्र की राजनीति में एक्टिव हुए और संसद पहुंचे। मई 2014 में मोदी सरकार के पहले कार्यकाल से ही प्रधान कैबिनेट में हैं। यानी संघ, संगठन और सरकार तीनों में ही प्रधान की स्थिति मजबूत है।
- मई 2016 में पीएम मोदी ने गरीब महिलाओं को मुफ्त LPG कनेक्शन देने के लिए फ्लैगशिप स्कीम ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ लॉन्च की। इसकी पूरी जिम्मेदारी पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के पास थी। तब इसके मंत्री थे- धर्मेंद्र प्रधान।

उज्ज्वला योजना के तहत 10.55 करोड़ से ज्यादा कनेक्शन बांटे जा चुके हैं। 7 साल तक पेट्रोलियम मंत्री रहे प्रधान की छवि उज्ज्वला योजना के चलते एक ‘डिलीवरी लीडर’ के तौर पर बनी।
- प्रधान की छवि मीडिया और बेतुकी बातों से दूर, बेहद गंभीर और लो-प्रोफाइल लीडर की है। यही खासियतें उन्हें बीजेपी आलाकमान का और करीबी बना देती है।
- प्रधान ने संगठन में भी काम किया और नतीजे दिए। उन्होंने उत्तराखंड (2017), कर्नाटक (2018), उत्तर प्रदेश (2022), बिहार (2025) जैसे विधानसभा चुनावों में अहम जिम्मेदारियां संभाली।
- 2017 में ओडिशा में प्रधान ने ही राज्य में पंचायत और बूथ लेवल पर संगठन खड़ा किया, जिसका रोल 2024 में बीजेपी की जीत में काफी अहम है।

- मोदी सरकार यह मानकर चल रही थी कि CJP का प्रोटेस्ट देशव्यापी नहीं है। यह कुछ दिन चलकर शांत हो जाएगा। मोदी सरकार को जब तक राजनीतिक तौर पर कोई नुकसान होते नहीं दिखता, वह किसी प्रोटेस्ट के आगे नहीं झुकते।
- वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी कहते हैं, ‘सरकार किसी भी आंदोलन को यह देखकर तोलती है कि उस मुद्दे से जनता में कितनी नाराजगी है। उनकी राजनीति पर कितना असर पड़ेगा। जनता में क्या बड़ा मैसेज जा रहा है। इस आंदोलन के बीच सरकार ने NEET की परीक्षा भी करवा ली गई, रिजल्ट आ गया। अगर ये नहीं होता तो प्रेशर बन सकता था।’

दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया। शाम 4 बजे के बाद रैपिड एक्शन फोर्स ने जंतर-मंतर भी खाली करवाया।
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सवाल-1: तो क्या धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो ही नहीं सकता? जवाबः 20 जुलाई के प्रोटेस्ट के बाद सरकार पर दबाव बढ़ा है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने कॉकरोच पार्टी के दो राष्ट्रीय प्रवक्ताओं को मिलने बुलाया। कॉकरोच पार्टी ने तीन मांगे रखीं, जिनमें धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भी है। जेपी नड्डा ने इन मांगों पर लीडरशिप से चर्चा करने का आश्वासन दिया है।

CJP के राष्ट्रीय प्रवक्ता सौरव दास और आशुतोष रांका स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को अपनी मांगों का ज्ञापन सौंपते हुए।
सरकार राजनीतिक नुकसान का कैलकुलेशन करके ही कोई अगला कदम उठाएगी।
2020-21 में किसान आंदोलन एक बड़ा उदाहरण है। तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसान धरने पर बैठ गए। सरकार ने महीनों तक ‘कृषि कानून’ वापस नहीं लिए। आखिरकार नवंबर 2021 में उसे झुकना पड़ा और पीएम मोदी ने खुद कानून वापसी का ऐलान करते हुए कहा- हमारी तपस्या में ही कोई कमी रह गई होगी।
चर्चा है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल और बीजेपी के संगठन में बदलाव होने वाला है। सरकार के सामने 2 विकल्प हैं…
- धर्मेंद्र प्रधान को सरकार से संगठन की ओर शिफ्ट किया जाए।
- शिक्षा मंत्रालय के बजाय किसी अन्य मंत्रालय का जिम्मा दिया जाए।
ऐसा पहले भी हो चुका है… नवंबर 2014 में सुरेश प्रभु को केंद्रीय रेल मंत्री बनाया गया। उनके कार्यकाल में कई रेल हादसे हुए, जिनको लेकर विपक्ष ने उनके इस्तीफे की मांग की। अगस्त 2017 में प्रभु ने इस्तीफे पेशकश भी की। हालांकि सरकार ने इस्तीफा मंजूर नहीं किया। एक महीने बाद उन्हें कॉमर्स मिनिस्ट्री में शिफ्ट कर दिया गया। वे 2 साल तक मंत्री रहे। 2019 के बाद वे केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह नहीं बना पाए।
सवाल-2: प्रधान ने इस्तीफा नहीं दिया, तो क्या CJP का प्रोटेस्ट फेल माना जाएगा?
जवाब: CJP ने अपना पूरा आंदोलन धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के इर्ग-गिर्द भुनाया था। आज जेपी नड्डा से बातचीत के बाद भी प्रधान इस्तीफा नहीं देते हैं, तो दिल्ली पहुंचे हजारों प्रदर्शनकारियों में निराशा आएगी।

अभिजीत दीपके 6 जून को भारत आए, तो जंतर-मंतर पर यह पोस्टर लेकर प्रदर्शन कर रहे थे।
वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष CJP के भविष्य को लेकर आश्वस्त नहीं है। उनके मुताबिक, ‘इस आंदोलन में प्लानिंग और लीडरशिप की कमी दिखी है। जब कोई इतना बड़ा आंदोलन शुरू करता है, भूख हड़ताल करता है तो पहले इसे खत्म करने का एग्जिट रूट भी होना चाहिए। लेकिन CJP के पास ऐसा नहीं था। जो मोदी सरकार को समझता है, उसे पता होना चाहिए कि वे दबाव में फैसले नहीं लेते।’
हालांकि विजय त्रिवेदी कहते हैं, ‘आंदोलनों की कामयाबी दो तरीकों से देख जा सकती है। एक तो अपनी बात जनता तक पहुंचा पाए या नहीं पहुंचा पाए और सरकार को बात सुननी पड़ी या नहीं। इस हिसाब से यह आंदोलन आधा सफल रहा है।’
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अनशन खत्म करने के लिए सोनम वांगचुक ने जो 3 ताजा शर्तें रखी हैं, उनमें धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का सीधा जिक्र नहीं है। इसे एक बड़ा U-टर्न माना जा रहा है। वांगचुक ने 28 जून को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर ही भूख हड़ताल शुरू की थी। प्रोटेस्ट के बैनर्स से लेकर ज्यादातर बयानों में इसी मांग का जिक्र होता था। पूरी खबर पढ़िए…
