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हाईकोर्ट ने पाली के एक सिविल विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित एक डिक्री को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने यह कार्रवाई इसलिए की क्योंकि यह डिक्री मुकदमे के एकमात्र वादी की मृत्यु के बाद, उसके कानूनी प्रतिनिधियों को पक्षकार बनाए बिना ही पारित कर दी गई थी। इस फैसले के साथ ही, डिक्री के आधार पर शुरू की गई निष्पादन कार्यवाही भी स्वतः रद्द हो गई है। यह मामला पाली के रोहट क्षेत्र निवासी कालूराम की अपील से जुड़ा है। अपील में बताया गया कि अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, पाली ने 30 अप्रैल 2025 को लाला राम के पक्ष में एकपक्षीय डिक्री पारित की थी, जबकि लाला राम की मृत्यु 26 मई 2023 को ही हो चुकी थी। अपील में यह भी बताया गया कि लाला राम की मृत्यु के बावजूद, उनके कानूनी प्रतिनिधियों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया। इसके लिए न तो देरी माफी का आवेदन किया गया और न ही मुकदमे की समाप्ति को रद्द करने के लिए कोई अर्जी दी गई। जस्टिस फरजंद अली ने अपने फैसले में कहा- सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के ऑर्डर 22 के तहत निर्धारित अवधि में कानूनी प्रतिनिधियों को रिकॉर्ड पर नहीं लाने से मुकदमा स्वतः समाप्त हो जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मुकदमे को कानूनी रूप से बहाल किए बिना ट्रायल कोर्ट आगे की कार्यवाही नहीं कर सकता। हाईकोर्ट ने कालूराम की अपील को स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित डिक्री और उससे जुड़ी निष्पादन कार्यवाही को रद्द कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने कानूनी प्रतिनिधियों को कानून के तहत उपलब्ध अन्य कानूनी उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी है।
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राजस्थान हाईकोर्ट ने रद्द किया पाली कोर्ट का फैसला:कहा- कानूनी प्रतिनिधियों को शामिल किए बिना मुकदमा स्वतः समाप्त
