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यौन हिंसा नाबालिग का भविष्य बिखेरती है, जमानत पर बरतें विशेष सतर्कता: हाईकोर्ट



चंडीगढ़ | पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने पॉक्सो अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में जमानत को लेकर एक अहम कानूनी स्पष्टीकरण दिया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि यदि मेडिकल रिपोर्ट में यौन हमले की पुष्टि नहीं भी होती है, तो सिर्फ इस आधार पर आरोपी को जमानत नहीं दी जा सकती। जस्टिस सुमीत गोयल ने पटियाला के एक मामले में आरोपी की नियमित जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि पीड़ित नाबालिग की गवाही जमानत पर विचार करते समय सबसे महत्वपूर्ण और ठोस साक्ष्य है। जस्टिस सुमित गोयल ने फैसले में कहा कि यौन हिंसा नाबालिग का भविष्य बिखेरती है लिहाजा ऐसे मामलों में जमानत का लाभ देने पर विशेष सतर्कता बरतने की जरूरत है। क्या है पूरा मामला…16 फरवरी 2025 को पटियाला जिले के बनूड़ थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी। आरोप है कि याचिकाकर्ता नाबालिग पीड़ित को झूठे बहाने से सुनसान जगह ले गया और वहां उसका यौन उत्पीड़न किया। आरोपी ने अपनी जमानत याचिका में दलील दी थी कि मेडिकल साक्ष्य अभियोजन के आरोपों का समर्थन नहीं करते क्योंकि रिपोर्ट में यौन हमले का कोई उल्लेख नहीं है। कोर्ट ने फैसले में कहा कि जब किसी नाबालिग को कम उम्र में शारीरिक, भावनात्मक और मानसिक चोट पहुंचती है, तो उसका प्रतिकूल प्रभाव उसके पूरे व्यक्तित्व पर पड़ता है। न्याय और समाज के व्यापक हित में ऐसे मामलों की सुनवाई विशेष सावधानी और सतर्कता के साथ की जानी चाहिए। खासकर जमानत याचिका पर विचार करते समय। मामले के तथ्यों, पीड़ित की उम्र और उसके बयानों को देखते हुए प्रथम दृष्टया आरोपी की संलिप्तता साफ दिखाई देती है। इन्हीं तर्कों के साथ अदालत ने आरोपी को राहत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने खारिज की दलील : हाईकोर्ट ने आरोपी की इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि मेडिकल साक्ष्य न मिलना जमानत का एकमात्र आधार नहीं हो सकता। ट्रायल कोर्ट में पीड़ित अपना बयान दर्ज करा चुका है, जिसमें उसने आरोपी पर स्पष्ट आरोप लगाए हैं और अपने बयान पर अडिग रहा है। कोर्ट ने कहा कि पीड़ित की गवाही अपने आप में ठोस साक्ष्य है।



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