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Devshayani ekadashi 2026, bhagwan vishnu puja vidhi, chaturmas rules, rituals about chaturmas in hindi


4 घंटे पहले

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आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी, हरिशयनी एकादशी और पद्मा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस बार यह व्रत 25 जुलाई को किया जाएगा। मान्यता है कि इसी दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर चार महीने की योगनिद्रा के लिए चले जाते हैं। इन चार महीनों को चातुर्मास कहा जाता है, जो कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी (20-21 नवंबर) तक चलता है।

उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु के विश्राम काल की शुरुआत होती है। इसके बाद चातुर्मास में विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक संस्कारों पर रोक लग जाती है। इस दौरान धार्मिक अनुष्ठान, पूजा-पाठ, जप, तप, दान, हवन और आध्यात्मिक साधना करने का विशेष महत्व है।

24 जुलाई से शुरू होगी एकादशी तिथि, 25 जुलाई को रहेगा व्रत – देवशयनी एकादशी तिथि 24 जुलाई की सुबह 9.12 बजे से शुरू होगी, जो कि 25 जुलाई की सुबह 11.34 बजे तक रहेगी। उदयकालीन तिथि के आधार पर देवशयनी एकादशी का व्रत 25 जुलाई को रखा जाएगा।

चार महीने तक विवाह और अन्य मांगलिक संस्कार के लिए मुहूर्त नहीं

देवशयनी एकादशी के साथ ही चातुर्मास की शुरुआत हो जाती है। मान्यताओं के अनुसार इस दौरान 16 संस्कारों में शामिल विवाह, उपनयन, मुंडन, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्यों के लिए मुहूर्त नहीं रहते हैं। माना जाता है कि भगवान विष्णु के योगनिद्रा में जाने के कारण हमारे शुभ कार्यों में श्रीहरि उपस्थित नहीं हो पाते हैं, विष्णु जी की उपस्थिति के बिना किए गए मांगलिक कार्य सफल नहीं हो पाते हैं, इसलिए इस दौरान इन मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं।

चातुर्मास को धर्म-कर्म के लिए विशेष फलदायी माना गया है। इस अवधि में भजन, कीर्तन, सत्संग, कथा, भागवत पाठ, पूजा और अनुष्ठान करने से आध्यात्मिक लाभ मिलने की मान्यता है। इस दौरान दान-पुण्य और संयमित जीवन का भी विशेष महत्व बताया गया है।

राजा बलि से जुड़ी है भगवान विष्णु के शयन की कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु के चार महीने के शयन का संबंध राजा बलि से है। मान्यता है कि जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण कर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी थी, तब बलि ने अपना सर्वस्व दान कर दिया था।

भगवान वामन ने पहले पग में पूरी पृथ्वी, आकाश और सभी दिशाओं को नाप लिया। दूसरे पग में उन्होंने स्वर्ग लोक को अपने अधीन कर लिया। जब तीसरे पग के लिए स्थान नहीं बचा, तो राजा बलि ने अपना सिर भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया। उनकी भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का अधिपति बनाया।

राजा बलि ने भगवान से अपने साथ रहने का वर मांगा। भक्त की इच्छा पूरी करने के लिए भगवान विष्णु चार महीने तक पाताल लोक में निवास करते हैं। इसी कारण इस अवधि को भगवान के योगनिद्रा काल से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि इस दौरान सृष्टि के संचालन का दायित्व भगवान शिव संभालते हैं।

देवउठनी एकादशी पर फिर शुरू होंगे मांगलिक कार्य

चातुर्मास का समापन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी देवउठनी एकादशी (20-21 नवंबर) पर होता है। इसी दिन भगवान विष्णु की योगनिद्रा समाप्त होने की मान्यता है। इसके बाद विवाह और अन्य शुभ कार्यों की शुरुआत फिर से हो जाती है। ग्रंथों में देवशयनी एकादशी को सौभाग्य प्रदान करने वाली तिथि बताया गया है। एकादशी व्रत और भगवान विष्णु की भक्ति करने से भक्त के पापों का नाश होता है।

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