NEET पेपर लीक प्रोटेस्ट, संसद मार्च और फिर पुलिस का लाठीचार्ज। विपक्ष ने पीएम आवास तक घेरा, लेकिन पीएम मोदी एक शब्द नहीं बोले।
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फिर 23 जुलाई की सुबह उन्होंने X पर लिखा- ‘युवाओं के हित से ज्यादा जरूरी कुछ भी नहीं है। पेपर लीक के दोषियों को सजा देने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट्स बनेंगे। युवाओं के भविष्य के साथ खेलने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।’
देर रात एक वीडियो मैसेज में भी कहा- ‘फास्ट-ट्रैक कोर्ट का प्रपोजल 24 जुलाई, शुक्रवार की कैबिनेट बैठक में रखेंगे। अगले सप्ताह संसद में इससे जुड़ा बिल पास कराने की कोशिश की जाएगी।’
इधर दिल्ली हाई कोर्ट ने पेपर लीक के मामले देखने के लिए फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट भी बना दी।
तो क्या अब फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने से सारी दिक्कतें दूर हो जाएंगी या इसमें भी कोई बड़ा लूपहोल; जानेंगे भास्कर एक्सप्लेनर में…
सवाल-1: एग्जाम में गड़बड़ी के मामलों में अब तक कितने लोगों को सजा हुई है? जवाब: 2002 से 2025 तक 45 बड़े एग्जाम में पेपर लीक हुआ। इन सब में 1-1 लाख या उससे ज्यादा बच्चे बैठे थे। अब तक सिर्फ 2 मामलों में सजा सुनाई गई।
- 27 एग्जाम नौकरियों में भर्ती के थे, बाकी 18 कॉलेज, यूनिवर्सिटीज के एंट्रेंस और स्कूलों के बोर्ड एग्जाम थे।
- 1658 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। इनमें 925 के खिलाफ चार्जशीट दाखिल हुईं।
- 2 मामलों में 32 लोग बरी हुए। 43 लोग अभी सुनवाई के दौरान जेल में हैं। 2 मामलों में 18 लोगों को दोषी ठहराया गया।
- 45 एग्जाम में टोटल 3.86 करोड़ स्टूडेंट्स शामिल हुए थे, जिन्हें पेपरलीक के चलते नौकरी या मनपसंद कॉलेज में एडमिशन के लिए 4 साल तक का इंतजार करना पड़ा। हर एग्जाम दोबारा करवाने में औसतन करीब 183 दिन लगे।
- 45 में से 23 एग्जाम में पेपर लीक केंद्र या राज्यों में बीजेपी की सरकार के दौरान हुए। 14 कांग्रेस की सरकारों और बाकी 8 एग्जाम दूसरे दलों की सरकारों में हुए। सबसे ज्यादा 11 पेपर लीक उत्तर प्रदेश, 7 राजस्थान और 3 गुजरात में हुए।
- ज्यादातर मामलों में सालों की सुनवाई के दौरान आरोपियों को जमानत मिलती रही। कई मामलों में जांच एजेंसियों ने आरोपियों को लापता घोषित करके केस बंद कर दिया।
ये सारी जानकारियां इंडियन एक्सप्रेस की इन्वेस्टिगेशन में सामने आई हैं।
जिन दो मामलों में दोषी ठहराए गए, वो रेलवे भर्ती बोर्ड से जुड़े हैं…
पहला मामला, 2002: 23 साल बाद सजा, लेकिन सारे दोषियों को जमानत
- 2002 में असिस्टेंट स्टेशन मास्टर भर्ती के लिए 8 अगस्त, 2002 को एग्जाम होना था। पेपर लीक के चलते एक दिन पहले एग्जाम रद्द हो गया। एक साल बाद दोबारा एग्जाम हुआ।
- 21 जुलाई, 2025 को अहमदाबाद की CBI स्पेशल कोर्ट ने अहमदाबाद, वडोदरा और आनंद में तैनात 7 रेलवे ऑफिसर्स और एक RPF कांस्टेबल को दोषी ठहराया।
- सभी को 5 साल जेल और 5 लाख रुपए जुर्माने की सजा हुई। फिलहाल सभी जमानत पर हैं। मामला अब गुजरात हाई कोर्ट में चल रहा है।
दूसरा मामला, 14 साल बाद सजा, मुख्य आरोपी जमानत पर बाहर
- 2010 में असिस्टेंट लोको पायलट और असिस्टेंट स्टेशन मास्टर की पोस्ट के लिए 6 और 13 जून को हुए एग्जाम पेपर लीक के चलते रद्द हो गए।
- 30 जनवरी, 2024 को हैदराबाद की CBI कोर्ट ने RRB-मुंबई के अध्यक्ष रहे सतेंद्र मोहन शर्मा, उनके बेटे और 8 अन्य लोगों को 5 साल जेल और 7.87 लाख रुपए के जुर्माने की सजा सुनाई। शर्मा को 2 फरवरी, 2024 को तेलंगाना हाई कोर्ट से जमानत मिल गई।

NEET, JEE और UGC जैसे बड़े एग्जाम NTA करवाती है, जो धर्मेंद्र प्रधान के केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के अधीन है।
सवाल-2: NEET 2026 के मामले में अब तक क्या हुआ है? जवाब: 3 मई 2026 को हुआ NEET-UG एग्जाम पेपर लीक के खुलासे के बाद 12 मई को रद्द कर दिया गया। अभी CBI, राजस्थान SOG और राज्यों की पुलिस जांच कर रही हैं। 13 आरोपी गिरफ्तार हुए। इसमें NTA की पेपर-सेटिंग कमेटी से जुड़े दो एक्सपर्ट भी हैं- पुणे की बायोलॉजी की लेक्चरर मनीषा गुरुनाथ मंधारे और केमिस्ट्री के प्रोफेसर पी. वी. कुलकर्णी।
एग्जाम करवाने वाली संस्था नेशनल टेस्टिंग एजेंसी, NTA ने 21 जून को कड़ी सुरक्षा में दोबारा एग्जाम करवाया। इसका नतीजा भी आ गया है।
पेपर लीक में दिल्ली का राउज एवेन्यू कोर्ट सुनवाई कर रहा है। सभी 13 आरोपियों की ज्यूडिशियल कस्टडी 24 जुलाई तक बढ़ा दी गई है। CBI ने अभी तक चार्जशीट दाखिल नहीं की है और कहा है कि अभी कुछ और गिरफ्तारियां हो सकती हैं। 24 जुलाई को कोर्ट में आरोपियों की हिरासत बढ़ाए जाने पर सुनवाई होनी है।

NEET पेपर लीक के बाद रीएग्जाम से पहले पूरे देश में 22 बच्चों की जान चली गई है।
सवाल-3: आखिर पेपर लीक रोकने का कानून और इसकी खामियां क्या हैं? जवाब: जून 2024 तक पेपर लीक के लिए कोई एक सेंट्रल कानून नहीं था। धोखाधड़ी, आपराधिक साजिश और जालसाजी के लिए IPC की 420, 120B और 467-471 जैसी धाराओं में मुकदमा दर्ज होता था। इनमें जमानत की कोई सख्त शर्तें नहीं हैं। हालांकि कुछ राज्यों ने अलग से नकल-विरोधी भी कानून बनाए, मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट भी शामिल किया। उत्तर प्रदेश में कुछ मामलों में गैंगस्टर एक्ट भी लगाया गया।
ये कानून काफी नहीं थे, 2024 में NEET-UG और UGC के एग्जाम में धांधली के बाद, 21 जून 2024 को केंद्र सरकार ने पेपर लीक के खिलाफ नया कानून लागू किया। इसका नाम है- सार्वजानिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम। इस कानून के मुताबिक,
पेपर लीक करना, इसमें मदद करना, गलत तरीके से OMR शीट हासिल करना, नकल करवाना, एग्जाम के लिए कंप्यूटर नेटवर्क वगैरह से छेड़छाड़, एग्जाम से जुड़ी फर्जी वेबसाइट बनाने या परीक्षक को धमकी जैसे कामों को सजा के दायरे लाया गया है।
ये सभी अपराध गैर-जमानती हैं, जिनमें दो कैटेगरी में सजा का प्रावधान है-
- पेपर लीक वगैरह करने पर 3 से 5 साल की सजा और 10 लाख तक का जुर्माना हो सकता है।
- एग्जाम करवाने वाली संस्था या एजेंसी के डायरेक्टर या मैनेजमेंट के ऑफिसर्स ने कोई अपराध किया, तो 3 से 10 साल तक की जेल और एक करोड़ का जुर्माना हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता कहते हैं कि सिर्फ कानून बना देना काफी नहीं है। कानूनी प्रक्रिया, कोर्ट में सुनवाई के दौरान लूपहोल्स का फायदा उठाकर अपराधी बच निकलते हैं। इसके कुछ उदाहरण देखिए…
2006: रेलवे पेपर लीक, यूपी के 2 विधायक आरोपी
- फरवरी 2006 में रेलवे ग्रुप-D एग्जाम पेपर लीक के चलते रद्द हो गया, जुलाई में दोबारा एग्जाम हुआ। मामले में 2012 से 2026 तक कोर्ट में 142 बार सुनवाई हुई है।
- इसमें दो आरोपी, बेदीराम और विपिन दुबे, उत्तर प्रदेश में विधायक हैं- बेदीराम गाजीपुर की SC रिजर्व्ड सीट जखानिया से ‘सुभासपा’ के विधायक हैं, जबकि विपुल दुबे भदोही की ज्ञानपुर सीट से निषाद पार्टी के विधायक हैं।

विधायक बनने से पहले बेदीराम को रेलवे से बर्खास्त किया गया था, 24 साल से अलग-अलग पेपर लीक में नाम आता रहा।
- सुभासपा और निषाद पार्टी दोनों, उत्तर प्रदेश में बीजेपी के साथ सरकार में शामिल हैं। सुभासपा चीफ ओम प्रकाश राजभर और निषाद पार्टी के मुखिया संजय निषाद दोनों सरकार में मंत्री हैं। बेदीराम पर रेलवे भर्ती पेपर लीक से जुड़े 5 मामले, मध्य प्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन, यानी MPPSC के 2 और पुलिस भर्ती एग्जाम का 1 मामला दर्ज है। वहीं, विपुल दुबे पर गैंगस्टर एक्ट के तहत मामला दर्ज है।
- बेदीराम और विपुल दोनों ने कहा है कि उन पर आरोप झूठे और मनगढ़ंत है।
- लखनऊ की एक अदालत ने 11 जुलाई, 2024 को बेदीराम और दुबे दोनों के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किए थे। उनकी रिहाई की अर्जी खारिज कर दी गई और 26 जुलाई, 2024 को कोर्ट ने चार्ज तय किए, हालांकि अभी भी सुनवाई जारी है।

विपुल दुबे
2015: UPPSC प्री एग्जाम, अब तक जांच अधूरी
- एग्जाम से एक घंटा पहले लखनऊ के एक सेंटर पर पेपर का पैकेट खोलकर सवालों की फोटो खींच ली गई। मामला खुला, तो दो महीने बाद दोबारा एग्जाम हुआ।
- सीएम अखिलेश यादव की तत्कालीन सरकार पर 86 में से 56 SDM के पदों पर मनमाने ढंग से नियुक्ति का आरोप लगा।
- इलाहाबाद हाई कोर्ट ने UPPSC अध्यक्ष अनिल यादव की नियुक्ति रद्द करके जांच CBI को सौंपी। 11 साल बाद भी जांच पूरी नहीं हुई है।
2016: यूपी PSC, RO/ARO भर्ती, क्लोजर रिपोर्ट पर कोई सुनवाई नहीं
लखनऊ के सेंटर पर पेपर लीक हुआ। जांच के बाद CB-CID ने 2018 में क्लोजर रिपोर्ट दी। हालांकि जब कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया, तो एजेंसी ने दूसरी क्लोजर रिपोर्ट दी। इस पर अब तक कोई फैसला नहीं हुआ है।
2016: कर्नाटक PUC, सभी आरोपी बरी
कर्नाटक ‘प्री यूनिवर्सिटी कोर्स’ पेपर लीक में सीनियर ऑफिसर्स सहित 19 लोग गिरफ्तार हुए। हालांकि 2024 में बेंगलुरु सेशन कोर्ट ने जांच में गंभीर खामियों का हवाला देकर सबको बरी कर दिया।
2021: राजस्थान सब-इंस्पेक्टर भर्ती, अधिकारी को जमानत
2025 में राजस्थान हाई कोर्ट ने कहा कि राजस्थान पब्लिक सर्विस कमीशन, RPSC के अंदरूनी लोगों ने ही पेपर लीक करवाया। आरोपी RPSC मेंबर रामू राम नायका जमानत पर हैं। बाकी दो मेंबर- मंजू शर्मा और संगीता आर्या ने इस्तीफा दे दिया। उन्हें कोई सजा नहीं हुई।

मंजू शर्मा यूपी के रहने वाले मशहूर कवि कुमार विश्वास की पत्नी हैं। उन्हें अक्टूबर 2020 में RPSC का सदस्य बनाया गया, सितंबर 2025 में उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
2024: NEET-UG, CBI कोर्ट में सुनवाई जारी
- पेपर लीक के बाद दिसंबर 2024 में 46 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई। मामला अभी भी पटना की CBI कोर्ट में लंबित है।
सवाल-4: क्या फास्ट ट्रैक कोर्ट बनने से पेपर लीक की दिक्कतें दूर हो जाएंगी? जवाब: बहुत मुश्किल है, क्योंकि इसमें 3 बड़ी अड़चनें हैं…
1. फास्ट ट्रैक कोर्ट पर केंद्र सरकार का सीधा कंट्रोल नहीं
फास्ट ट्रैक कोर्ट्स, यानी FTCs को कंट्रोल करने वाला कोई केंद्रीय कानून नहीं है। इन पर राज्य सरकारों का नियंत्रण है।
21 मार्च 2025 को लोकसभा में एक सवाल के जवाब में केंद्र सरकार ने कहा- ‘FTCs और उनका कामकाज राज्य और UTs और राज्यों के हाई कोर्ट्स के अधीन है।’
आगे कहा गया, ‘संविधान के आर्टिकल 233 के तहत, डिस्ट्रिक्ट, निचली कोर्ट्स और FTCs में जजों की नियुक्ति राज्य के हाई कोर्ट की सिफारिश और राज्य के गवर्नर के अधीन है। इस प्रक्रिया में केंद्र सरकार की कोई सीधी भूमिका नहीं है।’

21 मार्च 2025 को सरकार द्वारा दिए जवाब में साफ लिखा है- FTCs और उनका काम राज्य सरकार/UTs की डोमेन में है।
2. हर मामला तेजी से निपटाना मुश्किल
- मार्च 2026 में सरकार ने लोकसभा में कहा, ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी, मुकदमों की मुश्किलें, जांच, सबूत का टाइप और मुकदमों से जुड़े स्टेकहोल्डर्स जैसे- बार एसोसिएशन, जांच एजेंसी और गवाह वगैरह पर निर्भर करता है कि मुकदमे में कितनी देर लगेगी।
3. जल्दबाजी से गलत फैसले का खतरा
- सुप्रीम कोर्ट की चिंता रही है कि किसी मामले में तेजी से फैसला देने के चलते किसी आरोपी के साथ अन्याय न हो जाए। 1952 में सुप्रीम कोर्ट ने एक कानून रद्द किया था। इसके जरिए सरकार ने स्पेशल कोर्ट्स को तेजी से सुनवाई के लिए अपनी मर्जी से मुकदमे चुनने की छूट दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा- ‘तेजी शब्द खुद में बहुत अस्पष्ट और भ्रामक पैरामीटर है। तेजी से सुनवाई के लिए मामलों को लॉजिकली चुना जाना चाहिए- जैसे मामले के पीड़ितों की स्थिति वगैरह देखते हुए। 2002 में भी सुप्रीम कोर्ट के 7 जजों की संविधान पीठ ने भी एक ऐतिहासिक फैसले में कहा- ‘आपराधिक कार्यवाही के निपटारे के लिए कोई डेडलाइन तय करना न सही है, न व्यावहारिक है और न ही न्यायिक तौर पर स्वीकार्य है। महज एक तय समय बीत जाने के चलते कोर्ट मुकदमे को खत्म करने के लिए बाध्य नहीं है। ऐसी सख्त टाइमलाइन तय करने की न्यायिक अनुमति भी नहीं है।’
सुप्रीम कोर्ट में वकील विराग गुप्ता कहते हैं, POCSO, ड्रग्स एक्ट और दूसरे गंभीर मामलों में भी जिन फास्ट ट्रैक कोर्ट से जल्द न्याय देने की बात की गई, वो भी व्यावहारिक तौर पर सफल नहीं है। नए क्रिमिनल कानूनों में भी 3 साल के भीतर न्याय की बात है, लेकिन जिला अदालतों में ही सबसे ज्यादा पेंडिंग मामले हैं।’

तेलंगाना के एक डिस्ट्रिक्ट कोर्ट कॉम्प्लेक्स में बनाई गई POCSO स्पेशल कोर्ट के उद्घाटन की तस्वीर।
सवाल-5: इससे पहले जो फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए गए, वो कैसा काम कर रहे? जवाब: देश में अभी 2 तरह के फास्ट ट्रैक कोर्ट हैं-
1. फास्ट ट्रैक कोर्ट, FTC
- 2015 से 2020 के 14वें वित्त आयोग में 1800 फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की सिफारिश थी। इरादा था-हत्या, किडनैपिंग, महिलाओं, बच्चों, विकलांगों या बीमार लोगों के साथ गंभीर अपराध के मामलों या 5 साल पुराने प्रॉपर्टी के मामलों की तेज सुनवाई। जनवरी 2026 तक देश के 21 राज्यों और UTs में सिर्फ 862 FTC बन पाए हैं।
2. फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट, FTSC
- 2019 में केंद्र सरकार ने ‘निर्भया फंड’ के तहत FTSC बनाने की स्कीम शुरू की।
- इरादा था- महिलाओं और बच्चों के खिलाफ रेप जैसे यौन अपराध, खास तौर पर POCSO एक्ट के मामलों का निपटारा करना।
- 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 774 FTSC हैं। इनमें से 398 ‘POCSO स्पेशल कोर्ट’ हैं।
भारतीय न्याय संहिता, यानी BNS में सिफारिश है कि मुकदमों का निपटारा 2 साल और यौन अपराधों का निपटारा 2 महीने के अंदर होना चाहिए। वहीं FTSC योजना के तहत टारगेट है कि ये हर 3 महीने में 42 मुकदमों के हिसाब से सालाना 165 मामलों का निपटारा करें।
हालांकि तेजी से काम करने के बावजूद फास्ट ट्रैक कोर्ट जरूरत भर मुकदमों की सुनवाई नहीं कर पा रहे…
- सभी FTC और FTSC में आने वाले मामले निपटाने का सालाना औसत रेट करीब 96% है। 2024 में FTSCs में कुल 88,902 केस आए, इनमें से 85,595 में सुनवाई पूरी हुई।
- सरकार के मुताबिक, 30 मार्च 2025 तक FTSCs ने 3.34 लाख मामलों का निपटारा किया है।
- एक FTSC औसतन हर महीने 9.5 मामलों की सुनवाई पूरी कर लेता है। जबकि ऐसे ही मामलों में ट्रायल कोर्ट हर महीने 3.3 केस की सुनवाई कर पाते हैं।
- इसके बावजूद भारी तादाद में फास्ट ट्रैक कोर्ट्स में मुकदमे पेंडिंग हैं। 2023 के आखिर तक FTSCs में 24 लाख से ज्यादा मामले पेंडिंग हैं।
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