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एन. रघुरामन का कॉलम:‘अनफिल्ड टाइम’ का इस्तेमाल करें, तो क्रिएटिविटी बाहर आएगी




परिवार की एक शादी में शामिल होने बुधवार रात जब मैं बेंगलुरु जा रहा था तो मैंने तय किया कि इस बार लैपटॉप साथ नहीं ले जाऊंगा। मुझे सिर्फ मैरिज हॉल में उसकी सुरक्षा की चिंता ही नहीं सता रही थी, बल्कि रिश्तेदार मुझे ‘स्क्रीन मैन’ कहने लगे थे तो मैंने डिजिटल उपवास की योजना भी बनाई थी। वैसे भी मैं मोबाइल फोन की छोटी-सी स्क्रीन से चिपका रहने वाला व्यक्ति नहीं हूं। इसलिए मैं लगातार आसपास के माहौल को देखता हुआ इस कॉलम के लिए मेंटल नोटिंग करता रहा। फिर यही कॉलम मैंने मोबाइल पर लिखा। मेरे एक रिश्तेदार की पहली प्रतिक्रिया थी कि ‘घंटों तक आसपास देखते हुए आप बोर नहीं होते?’ मैंने कहा, ‘बिल्कुल नहीं।’ इस सवाल-जवाब ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि मैं तो जानबूझकर अपने लिए बोरियत पैदा करने की कोशिश कर रहा हूं, फिर भी इस एक हवाई सफर में मेरे दिमाग में कई आइडिया कैसे आ गए? पूरे रास्ते लोगों को देखते हुए मैं सोचता रहा कि वे कैसे व्यवहार करते हैं, क्या खाते हैं, क्या पहनते हैं, कैसे और क्या बात करते हैं और उनकी बॉडी लैंग्वेज कैसी है। यह सब देख रही मेरी आंखों से दिमाग कई सवाल पूछ रहा था। आखिरकार वही सवाल अगले कुछ दिनों के लिए मजबूत स्टोरी आइडिया बन गए। जैसे ही उन विचारों को मैंने अपनी डायरी में लिखा मेरा तनाव और एंग्जायटी खत्म हो गए कि भीड़भाड़ वाली शादी में मैं अगला आर्टिकल कैसे लिख पाऊंगा। कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ वाटरलू में कॉग्निटिव न्यूरोसाइंस के प्रोफेसर डॉ. जेम्स डैनकर्ट कहते हैं कि ‘जब कोई व्यक्ति तनाव भरी स्थिति से अलग होकर खुद को सोचने के लिए स्पेस देता है तो एक नया आइडिया जन्म लेता है। डॉ. जेम्स के इस दावे को नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई फिल्म ‘इक्का’ में भी देखा जा सकता है। एक सीन में पब्लिक प्रॉसिक्यूटर का किरदार निभा रहीं तिलोत्तमा शोम को रोजमर्रा की एक घटना देखकर फॉरेंसिक से जुड़ी एक अहम बात समझ आ जाती है। एक चाय-पान की दुकान में बैठे हुए उनका दिमाग तो खाली होता है, लेकिन नजरें बर्तन धो रहे दुकानदार पर होती हैं। वह ब्रश या कपड़े की बजाय अपनी उंगली गिलास के अंदर तक डालता है और इसे अंदरूनी सतह पर घुमाकर गंदगी बाहर निकालता है। यही उनके लिए ‘यूरेका’ मोमेंट होता है। वह इस मोशन को उस सबूत के साथ कनेक्ट करती हैं, जिसे जांचकर्ता नजरअंदाज कर चुके थे। वह विजुअलाइज करती हैं कि अगर हत्या में कार की चाबी इस्तेमाल की गई थी तो उसी चाबी से कार स्टार्ट भी की गई होगी। यानी, की-होल के छोटे चैम्बर में खून के निशान होंगे, जिन्हें सिर्फ ऊपर से साफ करके नहीं हटाया जा सकता, जैसा अपराधी ने किया होगा। यह सीन इसलिए मायने रखता है, क्योंकि यह किसी क्लासिक थ्रिलर ट्रोप जैसा है, जिसमें कोई साधारण काम एक जटिल फॉरेंसिक पहेली को हल कर देता है। इसी के बाद मुकदमे की दिशा बदल जाती है। पब्लिक प्रॉसिक्यूटर ऐसा ठोस सबूत पेश कर पाती हैं, जो सीधे बचाव पक्ष के नैरेटिव को चुनौती देता है। इसे आप ‘एम्प्टी टाइम’ कहिए या ‘अनफिल्ड टाइम’, लेकिन जब यह आपके किसी बड़े लक्ष्य से जुड़ जाता है तो इंसान को बोरियत महसूस नहीं होती। जैसे मुझे आसपास हो रही घटनाओं को देखने में कभी बोरियत नहीं होती। कंटेंट कंज्यूमिंग कम करके मैं असल में माइंडफुलनेस के लिए स्पेस बनाता हूं। इसका मतलब यह भी नहीं कि पान वाले को देखते हुए पब्लिक प्रॉसिक्यूटर या सहयात्रियों को देखते हुए मैं पूरे समय क्रिएटिविटी से भरा हुआ था। लेकिन जब बिना किसी उम्मीद के यह देखना चलता रहा तो अचानक यह गतिविधि पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के लक्ष्य से जुड़ गई- एक जटिल क्रिमिनल केस में ब्रेक-थ्रू की तलाश। फंडा यह है कि वर्कप्लेस पर क्रिएटिव बनने के लिए यह महत्वपूर्ण है कि आपके पास थोड़ा ‘अनफिल्ड टाइम’ हो, जिसे ‘मी टाइम’ भी कह सकते हैं।



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