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- Shivya Nath Column | Kerala Responsible Tourism Model Environment Culture
3 घंटे पहले
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शिव्या नाथ ट्रैवल ब्लॉगर और ‘रूटलेस एंड रेस्टलेस’ की बेस्टसेलिंग राइटर
मैं लगातार केरल के बारे में सोचती रही हूं। दक्षिण भारत की उस समृद्ध भूमि की मनमोहक सुंदरता में मैं जैसे रम-सी गई थी। गेंदे के चमकीले पीले फूलों के खेतों के बीच साइकिल चलाना, धुंध से ढके वेस्टर्न घाट में पैदल चलना, केले के पत्ते पर परोसे स्वादिष्ट और शाकाहारी भोजन का स्वाद लेना और यात्रा के दौरान मिले लोगों से दयालुता, विनम्रता, उद्यमशीलता और मानवीय संवेदनाओं की अनगिनत कहानियां सुनना- ये सब अनुभव मेरी स्मृति में तरोताजा हैं।
केरल की यात्रा के बाद ही मैं इस नतीजे पर पहुंची थी कि रिस्पॉन्सिबल-टूरिज्म अब पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगा। केरल रिस्पॉन्सिबल-टूरिज्म मिशन शुरू करने वाला भारत का पहला राज्य था। इसका स्पष्ट उद्देश्य था- पर्यटकों के लिए घूमने की बेहतर जगहों और स्थानीय लोगों के जीवनयापन के लिए बेहतर स्थानों का विकास करना।
टूरिज्म प्रोजेक्ट्स का ध्यान अमूमन पहले उद्देश्य पर केंद्रित रहता है- पर्यटकों के लिए बुनियादी ढांचा तैयार करना। इसी सोच का परिणाम है कि जंगलों के बीच से सड़कें बनाई जाती हैं और पहाड़ों पर बसे पर्यटन स्थलों पर कंक्रीट का बोझ बढ़ता जाता है।
कई बार अधिकारी पर्यटकों की मांगें पूरी करने को ही अपनी प्राथमिकता बना लेते हैं, चाहे उससे स्थानीय पर्यावरण या संस्कृति को कितना ही नुकसान क्यों न पहुंचे। लद्दाख के शुष्क पर्वतीय मरुस्थल में सदियों पुराने सूखे कम्पोस्ट टॉयलेट्स की जगह फ्लश टॉयलेट्स को बढ़ावा दिया जाता है। पूरे देश में ही ऐसी प्रवृत्तियों के कारण पर्यटन, स्थानीय जीवन को बेहतर बनाने के बजाय कई बार उसके लिए बाधा बन जाता है।
लेकिन केरल की यात्रा के दौरान मुझे इस विचार का दूसरा पक्ष भी समझ में आया। मेरी मुलाकात कई छोटे उद्यमियों और महिला स्वयं-सहायता समूहों से हुई, जिन्हें केरल के रिस्पॉन्सिबल-टूरिज्म मिशन ने अपने अनेक कार्यक्रमों के तहत व्यावसायिक कौशल का प्रशिक्षण दिया था।
इन गतिविधियों में पापड़म बनाना, रीसाइकल्ड मोमबत्तियां तैयार करना और प्लास्टिक थैलों के विकल्प के रूप में कपड़े के बैग सिलना जैसी पहलें शामिल थीं। भारत के कई राज्यों में व्यावसायिक प्रशिक्षण तो दिया जाता है, लेकिन रोजगार के अवसरों के अभाव में ऐसे कार्यक्रम अकसर सफल नहीं हो पाते।
केरल की सफलता का आधार इन कौशलों को पर्यटन से जोड़ना था। उद्यमियों को होटलों, रिसॉर्टों और होमस्टे से जोड़कर ऐसे संबंध स्थापित किए गए, जिन्होंने उनकी आजीविका को स्थायित्व प्रदान किया।
जिन उद्यमियों से मेरी मुलाकात हुई, उनमें से अनेक अपने कारोबार का विस्तार करने और जीवन-स्तर में सुधार लाने में सफल रहे हैं। वहीं रिस्पॉन्सिबल-टूरिज्म से जुड़ी रहने की जगहों को स्थानीय स्तर पर तैयार करने के लिए इको-कॉन्शस उत्पादों की नियमित आपूर्ति मिलने लगी है। इससे ऐसा मॉडल विकसित हुआ है, जो पर्यटकों के लिए बेहतर डेस्टिनेशन और स्थानीय लोगों के लिए बेहतर जीवन-स्थल तैयार करता है।
केरल में नीला नदी के किनारे यात्रा करते समय हमने कई ऐसे शिल्पकारों के साथ समय बिताया, जो अकेले अपने पारम्परिक शिल्प को जीवित रखे हुए हैं। हमने उनके जीवन के बारे में जाना, उनसे अनेक जिज्ञासापूर्ण प्रश्न पूछे और उनके काम का दस्तावेजीकरण किया। उनके शिल्प और परम्परा को समझने का अनुभव अपने आप में अत्यंत मूल्यवान था।
मध्य केरल में स्थित थेक्कडी के पेरियार टाइगर रिजर्व में मुझे वन विभाग की एक दूरदर्शी पहल के बारे में जानकर और भी प्रेरणा मिली। मन्नान जनजाति सदियों तक इस जंगल में बाघों, तेंदुओं और अन्य वन्यजीवों के साथ रहती आई थी।
वे मुख्यतः जंगल से मिलने वाले संसाधनों पर ही निर्भर रहते थे। जब उन्हें जंगल के बफर क्षेत्र में बसाया गया, तो उनकी आजीविका के अवसर बहुत कम हो गए। इसके बाद सामुदायिक पर्यटन की पहल शुरू की गई, जिसका उद्देश्य उनके लिए वैकल्पिक आजीविका के साधन विकसित करना था। चूंकि वे जन्म से ही इन जंगलों से परिचित थे, इसलिए उन्हें बुनियादी पर्यटन प्रशिक्षण देकर गाइड्स, बांस राफ्टिंग दल के सदस्य और शिकार-रोधी दस्तों का हिस्सा बनने के लिए तैयार किया गया।
स्थानीय समुदायों के पारम्परिक ज्ञान का उपयोग वन्यजीव संरक्षण को मजबूत करने, आजीविका के अवसर पैदा करने और यात्रियों को गाइडेड वॉक्स और ट्रेक्स के जरिये जंगल को अधिक गहराई से समझने का अवसर देने में मददगार साबित हुआ है। यह एक ऐसा मॉडल है, जिसे भारत के अन्य जनजातीय क्षेत्रों में भी अपनाया जाना चाहिए।
जंगलों के बीच से सड़कें बनाई जाती हैं और पहाड़ों पर बसे पर्यटन स्थलों पर कंक्रीट का बोझ बढ़ता जाता है। कई बार अधिकारी पर्यटकों की मांगें पूरी करने को ही अपनी प्राथमिकता बना लेते हैं, चाहे उससे स्थानीय पर्यावरण या संस्कृति को कितना ही नुकसान क्यों न पहुंचे। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

