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चीन के महान दार्शनिक कन्फ्यूशियस अपनी गहरी सोच और सरल जीवन दर्शन की वजह से पूरी दुनिया में प्रसिद्ध थे। वे कठिन से कठिन बात को भी इतने सहज तरीके से समझाते थे कि सामने वाला तुरंत उसका अर्थ समझ जाता था। उनके ज्ञान और व्यक्तित्व से प्रभावित होकर एक बार चीन के राजा ने उनसे एक अनोखा प्रश्न पूछा था। राजा ने पूछा, “आप मुझे ऐसे व्यक्ति से मिलवाइए, जिसका स्थान देवताओं से भी ऊंचा हो।” कन्फ्यूशियस मुस्कुराए और बोले, “वह व्यक्ति आप स्वयं हैं, क्योंकि आप हमेशा सत्य को जानने की इच्छा रखते हैं। सत्य की खोज करने वाला व्यक्ति सामान्य लोगों से अलग होता है।” राजा उनकी बात सुनकर प्रसन्न हुआ, लेकिन उसके मन में एक और जिज्ञासा जागी। उसने पूछा, “यदि ऐसा है तो मुझे मुझसे भी श्रेष्ठ व्यक्ति से मिलाइए।” कन्फ्यूशियस ने बिना किसी संकोच के कहा, “वह मैं हूं, क्योंकि मैं सत्य को जानने की अपनी इच्छा को कभी समाप्त नहीं होने देता। हर दिन कुछ नया सीखने और समझने का प्रयास करता हूं।” राजा अब और अधिक उत्सुक हो गया। उसने पूछा, “तो क्या आपसे भी महान कोई है?” कन्फ्यूशियस ने उत्तर दिया, “हां, मैं ऐसे व्यक्ति को जानता हूं। आइए, मैं आपको उससे मिलवाता हूं।” इसके बाद दोनों एक गांव पहुंचे, जहां बहुत बूढ़ा व्यक्ति कुआं खोद रहा था। उम्र के कारण उसका शरीर कमजोर पड़ चुका था, फिर भी वह पूरे समर्पण से अपने काम में लगा हुआ था। राजा ने आश्चर्य से पूछा, “यह बूढ़ा व्यक्ति इतनी उम्र में यह कठिन काम क्यों कर रहा है?” कन्फ्यूशियस ने शांत स्वर में कहा, “यह अपने लिए नहीं, बल्कि गांव के लोगों के लिए कुआं खोद रहा है, ताकि सभी को पानी मिल सके। यह हमेशा दूसरों की भलाई के लिए काम करता है। शरीर कमजोर है, लेकिन सेवा का उत्साह आज भी वैसा ही है। यही निस्वार्थ भावना इसे हम दोनों से भी महान बनाती है।” राजा उस बूढ़े व्यक्ति को देखकर भावुक हो गया। उसे समझ आ गया कि वास्तविक महानता न तो राजसत्ता में है, न ज्ञान के अहंकार में, बल्कि दूसरों के जीवन को बेहतर बनाने की निस्वार्थ भावना में है। प्रसंग की सीख
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चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस की सीख:सबसे बड़ी उपलब्धि केवल धन, पद या प्रसिद्धि में नहीं है, सच्ची सफलता दूसरों के जीवन को बेहतर बनाने से मिलती है
