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इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने झांसी के प्रेमनगर थाना क्षेत्र से जुड़े एक बहुचर्चित हत्याकांड में सत्र अदालत द्वारा दी गई सजा को रद्द कर दिया। कोर्ट ने तीनों दोषियों अनूप दुबे, कपिल शर्मा और आकाश उर्फ अक्कू को बरी कर दिया। मालूम हो कि वर्ष 2013 में देवेंद्र उर्फ दीपक तोमर नामक व्यक्ति 14 मई को लापता हो गया था और 17 मई को उसका शव बरामद हुआ था। ट्रायल कोर्ट ने चार आरोपियों को धारा 302/34, 201/34 और 506 आईपीसी के तहत दोषी करार दिया था। इनमें से एक आरोपी गौरव झा की फैसले के तुरंत बाद मृत्यु हो गई थी, इसलिए बाकी तीन ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी। इनका कहना था कि मृत्यु का कारण नहीं पता चला और आरोपियों के खिलाफ विश्वसनीय साक्ष्य के बगैर सजा सुनाई गई है। जो कानून के खिलाफ है। कोर्ट ने आदेश में कई खामियां गिनाईं हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कई अहम खामियां गिनाईं:कहा – शव इतनी सड़ी-गली अवस्था में मिला था कि केवल कंकाल बचा था, और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में मृत्यु का कारण स्पष्ट नहीं हो सका था। कंकाल की कोई डीएनए जांच भी नहीं कराई गई, जिससे यह साबित नहीं हो सका कि वह देवेंद्र का ही शव था।
घटनास्थल पर आखिरी बार आरोपियों के साथ देखे जाने के दोनों गवाह अदालत में मुकर गए थे।घटनास्थल से बरामद खोखा कारतूस के जब्ती ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने वाले स्वतंत्र गवाहों से भी पूछताछ नहीं कराई गई थी। सभी आरोपियों का धारा 27 साक्ष्य अधिनियम के तहत एक ही साझा ज्ञापन तैयार किया गया था, जबकि प्रत्येक आरोपी का अलग-अलग होना चाहिए था। मृत्यु का कारण ही साबित नहीं हुआ कोर्ट ने कहा कि जब मृत्यु का कारण ही साबित नहीं हो सका, तो कारतूस और बैलिस्टिक रिपोर्ट का कोई खास मूल्य नहीं रह जाता। कोर्ट ने यह भी कहा कि कंकाल की बरामदगी सार्वजनिक स्थान से हुई थी, इसलिए महज आरोपियों के इशारे पर बरामदगी को दोष सिद्ध करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। इन तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष संदेह से परे मामला साबित करने में विफल रहा और सभी तीन अपीलों को स्वीकार करते हुए दोषियों को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।
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झांसी हत्याकांड मामले में तीन दोषी हाईकोर्ट से बरी:कोर्ट ने कहा- मृत्यु का कारण ही साबित नहीं, संदेह लाभ मिला
