रील देखकर करियर और निवेश में शॉर्टकट तलाश रहे युवा:धैर्य की कमी और अधूरी तैयारी से बढ़ रही युवाओं की उलझन; बैकअप प्लान जरूरी




कुछ दिनों पहले ब्रिटेन की दूसरी सबसे ऊंची चोटी पर दो युवक माइनस 15 डिग्री में सिर्फ ट्रैकसूट और साधारण जूते पहनकर पहुंच गए थे। समय पर रेस्क्यू न करते तो उनकी जान जा सकती थी। इसकी बड़ी वजह सोशल मीडिया है। ‘शॉटी बॉय’ नाम से चर्चित इन्फ्लुएंसर स्कॉटलैंड की वादियों से हैरतअंगेज कारनामों और धुंध से भरी खूबसूरत तस्वीरें पोस्ट करते हैं। उन्हें देखकर युवा बिना तैयारी के हाइकिंग-ट्रैकिंग के लिए निकल पड़ते हैं। सुंदर लोकेशन पर परफेक्ट फोटो या रील के लिए युवा जानलेवा जोखिम ले रहे हैं। इंटरनेट पर नीले पानी की झीलें, कोहरे से ढकी वादियां और हरियाली से लदे पहाड़ देखकर युवाओं का जोश हिलोरें मार रहा है। हाथ में स्मार्टफोन, आंखों में रील बनाने का जुनून और दिमाग में रोमांच। लेकिन इस चमक-धमक वाली रील्स की दुनिया के पीछे एक ऐसी खौफनाक सच्चाई छिपी है, जिससे इस समय पूरी दुनिया के रेस्क्यू दल परेशान हैं।नतीजा यह है कि तैयारी कम है और जोश ज्यादा, जिसके चलते नौसिखिये ट्रैकर भयानक मुसीबतों में फंस रहे हैं। आंकड़े चौंकाने वाले हैं। स्कॉटलैंड के पहाड़ों पर 17 से 25 साल के युवाओं के साथ होने वाले हादसों की संख्या 2022 के बाद से चार गुना बढ़ चुकी है। पहले जहां 40-50 साल के उम्रदराज लोगों को मदद की जरूरत पड़ती थी, वहीं अब मदद मांगने वाले 25% से ज्यादा युवा हैं। यह बीमारी सिर्फ स्कॉटलैंड तक सीमित नहीं है; अमेरिका, फ्रांस, इटली व स्विट्जरलैंड के पहाड़ों से भी लगातार इमरजेंसी कॉल आ रही हैं। स्कॉटिश माउंटेन रेस्क्यू के वरिष्ठ अधिकारी केव मिचेल कहते हैं,‘ युवाओं को लगता है कि मोबाइल है तो हर मुश्किल से निपट लेंगे। वे यह भी भूल जाते हैं कि ऊंचे पहाड़ों पर मोबाइल नेटवर्क भी काम नहीं करता। युवाओं की कुदरत से जुड़ने की सोच बिल्कुल सही है, लेकिन पहाड़ रील्स जितने सॉफ्ट नहीं होते। अगर इन खूबसूरत वादियों का असली मजा लेना है, तो युवाओं को सिर्फ रील्स देखकर नहीं, बल्कि पूरी तैयारी और सुरक्षा के पुख्ता नियमों के साथ कदम आगे बढ़ाने होंगे। आखिर लाइफ में रील्स से ज्यादा ‘रियल’ जिंदगी की अहमियत है।’ रोमांच व तैयारी के बीच संतुलन ही परिपक्वता मनोवैज्ञानिक जेनेट स्टेइनबर्ग कहते हैं,‘सोशल मीडिया ने रोमांच व नए अनुभवों का आकर्षण तो बढ़ाया है, पर उसके लिए जरूरी तैयारी और धैर्य कम कर दिया है। आज युवा प्रेरणा के आधार पर बड़े फैसले ले लेते हैं, जबकि तैयारी अधूरी होती है। यह प्रवृत्ति सिर्फ ट्रैकिंग या पर्वतारोहण तक सीमित नहीं है, बल्कि करियर, रिश्तों और निवेश में भी दिखाई देती है। सोशल मीडिया अक्सर सफलता व बेहतर नतीजे दिखाता है, पर उनके पीछे की मेहनत व योजना को अनदेखा कर देता है। जोखिम लेना अच्छा है, पर तैयारी व बैकअप प्लान के बिना कदम उठाना लापरवाही है। असली परिपक्वता रोमांच व तैयारी के बीच संतुलन बनाने में है।



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