भास्कर सीरीज ‘स्पाई फाइल्स’ में आप पढ़ रहे हैं- ‘ऑपरेशन कहूटा।’ पार्ट-1 में आपने पढ़ा- 1974 में भारत के परमाणु परीक्षण के बाद पाकिस्तान भी एटम बनाने की तैयारी में जुट गया था। इंजीनियर डॉ. अब्दुल कदीर खान ने नीदरलैंड्स के एक न्यूक्लियर लैब से परमाणु ब
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भारत की खुफिया एजेंसी RAW और इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद, पाकिस्तान के इस मिशन को भेदने में जुटी थीं। कई तरह की चर्चाएं थीं। कुछ अमेरिका से आईं, तो कुछ फ्रांस से, लेकिन भारत को जरूरत थी पुख्ता सबूत की। पार्ट-2 में उससे आगे की कहानी…
साल था 1977 और अक्टूबर महीना। रावलपिंडी में सर्दियों की शुरुआत हो चुकी थी। बाजार में एक कतार में दर्जियों की दुकानें थीं। हर दुकान के बाहर रंग-बिरंगे कपड़ों के थान लटके हुए।
इसी गली में तारीक दर्जी की दुकान थी। छोटी-सी, पर काम उसका बेहतरीन था। रावलपिंडी में सब जानते थे, लेकिन तारीक का एक और परिचय था, जो सिर्फ दिल्ली जानती थी।
उस रोज तारीक सिलाई मशीन के सामने बैठा था। तभी पड़ोस की दुकान से रफीक ने आवाज लगाई- ‘यार तारीक! जरा इधर आ।’
रफीक उसका पुराना साथी था, उसी गली का दर्जी। उस रोज रफीक के चेहरे पर अजीब-सी चमक थी।
‘क्या हुआ?’ तारीक ने पूछा।
‘फौज का ऑर्डर आया है। बड़ा ऑर्डर। ढेर सारी वर्दियां सिलनी है, वो भी दो रोज के भीतर।’ रफीक ने बताया।
तारीक ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘वाह मियां तुम्हारी तो लॉटरी लग गई… पर इतनी वर्दियों की डिमांड क्यों है?’
‘अब ये तो नहीं पता भाई… बस फौज का एक ड्राइवर बता रहा था कि कहूटा में उनका कोई कैंप लगने वाला है।’ रफीक ने बताया।
‘कहूटा? कहूटा में क्या हो रहा?’ तारीक के दिमाग में ये बात बिजली सी कौंधी, पर उसने खुद को संभालते हुए कहा- ‘हां कोई भर्ती-वर्ती का कैंप होगा। फौज का तो काम ही ऐसा है।’
रफीक ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘कुछ वर्दियां तुम भी सिल देना तारीक। मैं अकेले इतना बड़ा ऑर्डर कैसे पूरा कर पाऊंगा।’
तारीक- ‘हां क्यों नहीं…’
इसके बाद तारीक और रफीक, दोनों अपने काम में जुट गए… देर शाम तारीक पुराने बस स्टैंड के पास एक कोने में बने टेलिफोन बूथ में पहुंचा। एक नंबर डायल किया और कोड वर्ड में बता दिया- ‘भारी तादाद में फौजी कहूटा भेजे जा रहे हैं।’

रावलपिंडी में अपनी दुकान पर सिलाई करता हुआ तारीक। AI इमेज
अगली सुबह दिल्ली के लोधी रोड में RAW का दफ्तर। एक अधेड़ उम्र का आदमी चाय की चुस्की लेते हुए वो संदेश पढ़ रहा था। वो थे- रामेश्वर नाथ काव। RAW के प्रमुख और पूर्व पीएम इंदिरा गांधी के सबसे भरोसेमंद ब्यूरोक्रेट।
काव ने संदेश दो बार पढ़ा। फिर अपने साथी अफसर की तरफ देखा। ‘हम्म… कहूटा,’ उन्होंने कहा। साथी अफसर समझ गए।
‘सर, वहां की सुरक्षा…’ अफसर ने हिचकिचाते हुए पूछा।
काव ने चाय का कप रखते हुए कहा- ‘मुझे पता है। फ्रांस कोशिश कर चुका है। अमेरिका कोशिश कर चुका है। कोई अंदर नहीं घुस पाया है।’
फिर थोड़ा रुककर काव ने कहा- ‘अगर हम अंदर नहीं जा सकते, तो क्या हुआ? जो अंदर से बाहर आ रहा है, हम उसे तो पकड़ सकते हैं।’
‘मतलब सर?’ अफसर ने पूछा।
RAW चीफ- ‘इंसान अपनी पहचान बदल सकता है, लेकिन अपने शरीर का सच नहीं बदल सकता। परमाणु रिएक्टर में काम करने वाले वैज्ञानिकों और फौजियों का शरीर रेडिएशन सोख लेता है। पता है, रेडिएशन के कण सबसे लंबे वक्त तक कहां जमा रहते हैं?’
अफसर चुप रहे। काव ने कहा- ‘बालों और नाखूनों में।’
कहूटा में कहीं ना कहीं नाई की दुकान होगी। वहां फौजी और वैज्ञानिक बाल कटवाने आते होंगे। हमें कहूटा के सैलूनों से वो बाल चाहिए। अगर उन बालों में प्लूटोनियम या यूरेनियम के अंश मिले… तो समझो पाकिस्तान का झूठ बेनकाब हो गया।’

RAW के पहले चीफ रामेश्वर नाथ काव। काव ने ही RAW की नींव रखी थी।
इसके बाद RAW ने अपने एजेंटों को कोड वर्ड में मैसेज भेजकर नई रणनीति बताई। रणनीति थी- ‘कहूटा में मौजूद फौजियों या वैज्ञानिकों के बाल जमा करके भारत भेजना।’
RAW के नौ एजेंट। सब के सब अलग-अलग शहरों में पाकिस्तानी बनकर रह रहे थे। कोई दर्जी, कोई व्यापारी, कोई सब्जीवाला। उन्हें तीन-तीन के गुट में बांटा गया।
कहूटा में एक नाई की दुकान थी। प्लान के मुताबिक तारीक, करीम और अरशद, RAW के ये तीन एजेंट सुबह-सुबह सफाईकर्मी और कचरा उठाने वाला बनकर उस बाजार में पहुंचे। फिर मौका पाकर तीनों ने अपनी ड्रेस बदली और सैलून में घुस गए।
दुकान छोटी थी। तीन कुर्सियां, एक आईना, दीवार पर पुराने फिल्मी कैलेंडर। नाई उस्ताद रफीक, 50 साल की उम्र, हल्की मूंछें और जिंदगी भर के किस्से।
तारीक ने दुकान में घुसते ही क्रिकेट की बहस छेड़ दी। इमरान खान बेहतर है या जहीर अब्बास। उस्ताद रफीक भी क्रिकेट का दीवाना था। पांच मिनट में दुकान में माहौल ऐसा था जैसे किसी चाय के ढाबे पर बहस छिड़ी हो।
इसी दौरान दो फौजी सैलून में दनदनाते हुए घुसे। कंधे पर पट्टियां, तीखी नजर। वे बिना बारी का इंतजार किए सीधे जाकर कुर्सियों पर बैठ गए। नाई को डांटते हुए बोले- ‘पहले हमारे बाल काटो। वक्त नहीं है अपने पास।’
नाई बाल काटने लगा। अब तीनों लड़कों की नजरें फौजियों के गिरते हुए बालों पर थीं। वे बारीकी से देख रहे थे कि फौजियों के बाल फर्श पर कहां गिर रहे हैं। कुछ देर बाद बाल कटवाकर फौजी चले गए।
अब सैलून वाला झाड़ू लेकर उन बालों को साफ करने के लिए आगे बढ़ा, तभी अरशद और करीम आपस में भिड़ गए। ‘तूने मुझे गाली कैसे दी?’ एक चिल्लाया। ‘तेरी हिम्मत कैसे हुई मुझसे ऐसे बात करने की।’ दूसरे ने उसका कॉलर पकड़ लिया।
सैलून में शोर मच गया। नाई झाड़ू छोड़कर दोनों को छुड़ाने के लिए बीच में आ गया। सैलून में बैठे बाकी लोग भी मार-पीट को शांत कराने में जुट गए।

कहूटा के सैलून में जानबूझकर लड़ाई करते हुए RAW के जासूस। AI इमेज
इसी अफरा-तफरी के बीच, तारीक ने फर्श पर गिरे फौजियों के बालों को समेटकर एक लिफाफे में डाला और जेब में रखकर चुपचाप निकल गया।
वो सीधे रावलपिंडी स्टेशन पहुंचा। वहां से ट्रेन पकड़कर लाहौर आया। प्लेटफॉर्म पर भारत जाने वाली समझौता एक्सप्रेस खड़ी थी। तारीक ने चुपके से बालों वाला लिफाफा दिल्ली जाने वाले एक मुसाफिर के बैग में रख दिया।
करीब 10 घंटे बाद ट्रेन दिल्ली पहुंची। जांच के नाम पर एक-एक बैग की तलाशी ली गई। फिर RAW के एक अफसर के हाथ वो लिफाफा लग गया।
जब फॉरेंसिक लैब में उन बालों की जांच की गई, तो पता चला कि उसमें ‘हाईली एनरिच्ड यूरेनियम’ के कण हैं। वही यूरेनियम, जिसका इस्तेमाल परमाणु बम बनाने में होता है।’
RAW जान चुका था कि पाकिस्तान कहूटा में परमाणु बम बना रहा है। अब ये बात भारत के प्रधानमंत्री तक पहुंचानी थी और यहीं से कहानी में ऐसा मोड़ आया, जिससे RAW के मिशन पर पानी फिर गया।
दरअसल, इमरजेंसी के बाद हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस हार चुकी थी। जनता पार्टी के मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने थे। RAW से उनका पुराना बैर था।
उनका मानना था कि इमरजेंसी के दौरान इंदिरा के कहने पर RAW ने विपक्षी नेताओं की जासूसी की थी। मोरारजी ने RAW का बजट भी 30% कम कर दिया था।
उस रोज RAW चीफ आरएन काव कुछ अफसरों के साथ प्रधानमंत्री दफ्तर पहुंचे। फाइलें सामने रखीं। सबूत रखे। फिर कहा- सर, ‘पाकिस्तान कहूटा में परमाणु बम बना रहा है। हमारे पास सबूत हैं। एक एजेंट भी मिला है, जो उनका पूरा ब्लूप्रिंट दे सकता है- दस हजार डॉलर में। अगर आप कहें तो…’
तब 10 हजार डॉलर की कीमत 80-85 हजार रुपए के बराबर थी।
मोरारजी ने हाथ उठाया। ‘नहीं। पाकिस्तान के मामले में हम दखल नहीं देंगे।’
कमरे में सन्नाटा छा गया। काव ने एक पल रुककर कहा, ‘सर, अगर पाकिस्तान परमाणु बम बना लेता है तो…’
‘मैंने अपना फैसला बता दिया।’ मोरारजी ने कहा। काव बाहर निकले और RAW चीफ पद से इस्तीफा दे दिया।

प्रधानमंत्री मोरराजी देसाई से बातचीत करते हुए RAW प्रमुख आरएन काव। AI इमेज
उस वक्त जनरल जिया-उल-हक पाकिस्तान के राष्ट्रपति थे। RAW के पूर्व अधिकारी बी. रमन अपनी किताब ‘द काउब्वॉयज ऑफ रॉ’ में लिखते हैं- ‘जनरल जिया अक्सर मोरारजी देसाई को फोन करते थे। देसी दवाओं और मूत्र चिकित्सा पर सलाह लेने के बहाने। मोरारजी इस पर गदगद हो जाते थे।
जिया गंभीरता दिखाते हुए उनसे पूछते- ‘जनाब, एक दिन में कितनी बार मूत्र पीना चाहिए? क्या ये सुबह का पहला मूत्र होना चाहिए या दिन के किसी भी वक्त का?’
दरअसल, मोरारजी देसाई स्वमूत्र पीते थे। वे इसे नेचर थेरेपी मानते थे। एक बार तो अमेरिका में उन्होंने टीवी पर कह दिया था कि वो रोजाना अपना मूत्र पीते हैं।
उस रोज भी जनरल जिया का फोन आया था, पर मोरारजी देसाई नेचर थेरेपी बताने के मूड में नहीं थे। वे परेशान थे। गुस्से में थे।
पाकिस्तान के ग्रुप कैप्टन रहे एसएम हाली एक आर्टिकल में इस घटना का जिक्र करते हैं- ‘मोरारजी ने फोन पर कहा, ‘जनरल जिया, ‘मुझे पता चल गया है। पाकिस्तान परमाणु बम बना रहा है।’
जिया घबरा गए, पर आवाज में मिठास बनाए रखी। ‘नहीं जनाब… यह सब झूठ है। पाकिस्तान ऐसा कुछ नहीं कर रहा।’
‘तो फिर कहूटा में क्या हो रहा है?’ मोरारजी ने पूछा।
इसके बाद फोन कट गया। जिया समझ गए कि उनका एटमी ताकत बनने का राज हिंदुस्तान जान चुका है। उन्होंने फौरन फौज और खुफिया एजेंसियों की बैठक बुलाई। आदेश सीधा था- ‘RAW के जासूसों को ढूंढो और खत्म करो।’
पाकिस्तानी फौज और एजेंसियों ने पिछले कुछ महीनों के सारे फोन कॉल्स खंगाले। खास तौर पर वो कॉल, जो हिंदुस्तान में किए गए थे।
उसके बाद चुन-चुनकर RAW एजेंट्स मार दिए गए। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया जाता है कि कम से कम 30-35 जासूस मारे गए थे। अंडर कवर एजेंट तारीक, करीम और अरशद भी नहीं बचे।
न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बाद में पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम का ब्लूप्रिंट इस्लामाबाद में एक ड्राय क्लीनर के बैग में मिला था। जब वो ब्लू प्रिंट किसी तरह दिल्ली पहुंचा, तो उसे देखकर वैज्ञानिक हैरान रह गए। पाकिस्तान सिर्फ एटम बम नहीं बना रहा था, उसने तो पूरा ढांचा तैयार कर लिया था।
जनवरी 1980, इंदिरा गांधी 353 सीटें जीतकर फिर से प्रधानमंत्री बनीं। उन्होंने दोबारा ऑपरेशन कहूटा शुरू करने का आदेश दिया, लेकिन इस बार मकसद सिर्फ जानकारी जुटाना नहीं था।

साल 1980, चुनाव जीतने के बाद लोगों से मिलकर खुशी जाहिर करती हुईं इंदिरा गांधी।
दरअसल, जून 1981 में इजराइली एयर फोर्स ने इराक के ओसिरक परमाणु संयंत्र पर बमबारी करके उसे तबाह कर दिया था। भारत भी कहूटा में कुछ ऐसा ही करना चाहता था।
बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने जगुआर विमानों की मदद से कहूटा पर हवाई हमले की योजना बनाई। फरवरी 1983 में सेना के अफसर गोपनीय तरीके से इजराइल भी गए।
इजराइल ने भारत को पाकिस्तान के एफ-16 लड़ाकू विमानों के बारे में टेक्निकल जानकारी दी। बदले में भारत ने मिग-23 की जानकारी इजराइल से साझा की।
सीनियर सिक्योरिटी एनालिस्ट भरत कर्नाड एक आर्टिकल में लिखते हैं- ‘प्लान के मुताबिक 6 एफ-16 और 6 एफ-15 लड़ाकू विमानों को इजराइल के हाइफा से उड़कर गुजरात के जामनगर पहुंचना था। वहां से हवा में ईंधन भरते हुए उन्हें जम्मू-कश्मीर के उधमपुर जाना था। फिर पाकिस्तानी बॉर्डर में घुसकर हमला करना था।
दो एफ-16 कहूटा पर बम गिराने वाले थे। जबकि, एक एफ-16 पाकिस्तानी वायु सेना की किसी भी कार्रवाई का जवाब देने के लिए हवा में मुस्तैद रहने वाला था।’
ये सीक्रेट प्लान था, लेकिन सितंबर 1984 में अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA ने पाकिस्तान को बता दिया- ‘भारत हवाई हमला कर सकता है।’
उसी दिन अमेरिकी टेलीविजन चैनल ABC ने भी ये खबर प्रसारित कर दी। मजबूरन RAW को कहूटा पर अटैक करने के प्लान को होल्ड करना पड़ा।
एक महीने बाद… 31 अक्टूबर 1984, दिल्ली में हल्की-हल्की सर्दियां पड़नी शुरू हो गई थीं। हमेशा की तरह पीएम इंदिरा गांधी सुबह 6 बजे उठ गईं। नाश्ते में उन्होंने दो टोस्ट, संतरे का जूस और अंडे लिए। इसके बाद वो अखबार पढ़ने लगीं।
सुबह 8.30 बजे BBC की एक डॉक्यूमेंट्री के लिए इंदिरा का इंटरव्यू होना था। पीएम को तैयार करने के लिए सुबह-सुबह ही मेकअप आर्टिस्ट उनके घर पहुंच गए थे।
सुबह 9.10 बजे, इंदिरा हाथ से बुनी हुईं हल्के नारंगी रंग की साड़ी पहने 1, सफदरजंग रोड से अपने दफ्तर 1, अकबर रोड के लिए निकलीं। वे पैदल ही चल रही थीं। उन्हें धूप से बचाने के लिए कॉन्स्टेबल नारायण सिंह छाता लेकर उनके बगल में चल रहे थे।
अकबर रोड गेट पर पहुंचते ही सुरक्षा गार्ड बेअंत सिंह और संतरी बूथ पर तैनात सतवंत सिंह ने इंदिरा को नमस्ते किया।
इसी दौरान बेअंत ने पॉइंट 38 बोर की रिवॉल्वर इंदिरा पर तान दी। इंदिरा बोलीं, ‘ये तुम क्या कर रहे हो बेअंत?’ बेअंत ने फायर कर दिया। गोली इंदिरा के पेट में लगी। उसने 4 और गोलियां दागीं।
सतवंत घबरा गया। तभी बेअंत चिल्लाया- ‘गोली मारो।’ सतवंत ने स्टेनगन से धड़ाधड़ 25 गोलियां इंदिरा के सीने में उतार दीं। इंदिरा की मौत के बाद RAW का ऑपरेशन कहूटा ठंडे बस्ते में चला गया।

31 अक्टूबर 1984, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अपने अंतिम सफर पर।
इधर, पाकिस्तान ने चोरी-छिपे परमाणु बम बनाने का काम जारी रखा। सत्ता बदलती रही। सरकारें आती-जाती रहीं, पर कहूटा का काम नहीं रुका।
अब तारीख आई 11 मई 1998, अटल बिहारी वाजपेयी को दूसरी बार प्रधानमंत्री बने 53 दिन बीत चुके थे। उस रोज प्रधानमंत्री आवास में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार यानी NSA ब्रजेश मिश्रा कुछ नर्वस मालूम पड़ रहे थे।
प्रधानमंत्री के सचिव शक्ति सिन्हा वाजपेयी के पास कुछ जरूरी फाइलें लेकर आ रहे थे। उस दिन सिन्हा का जन्मदिन भी था, लेकिन वो जान-बूझ कर बधाई देने वालों के कॉल रिसीव नहीं कर रहे थे।
उधर, राजस्थान के पोकरण में बने कंट्रोल रूम में बैठे वैज्ञानिक मौसम विभाग की रिपोर्ट का इंतजार कर रहे थे। शाम के करीब 3 बजे रिपोर्ट आ गई कि सब कुछ ठीक है।
सीनियर जर्नलिस्ट राज चेंगप्पा अपनी किताब ‘वेपेंस ऑफ पीस’ में लिखते हैं- ‘शाम के 3.45 बजे मॉनीटर पर लाल रोशनी आई। फिर एक सेकेंड बाद तीनों मॉनीटरों पर चौंधियाने वाली रोशनी दिखाई दी। अचानक सभी तस्वीरें फ्रीज हो गईं, धरती के अंदर का तापमान हजारों डिग्री सेंटिग्रेड पहुंच गया।
वहां मौजूद मशहूर साइंटिस्ट और बाद में राष्ट्रपति बने एपीजे अब्दुल कलाम ने लगभग चिल्लाते हुए कहा- ‘अब एक अरब लोगों के हमारे देश को कोई नहीं कह सकता कि उसे क्या करना है। अब हम तय करेंगे कि हमें क्या करना है।’
थोड़ी देर बाद… प्रधानमंत्री आवास में फोन बजा। पहली ही घंटी पर NSA ब्रजेश मिश्रा ने फोन उठाया। रिसीवर पर कलाम की कांपती हुई आवाज गूंजी, ‘सर, वी हैव डन इट।’
ब्रजेश मिश्रा फोन पर ही चिल्लाए, ‘गॉड ब्लेस यू।’
अटल बिहारी वाजपेयी के सचिव रहे शक्ति सिन्हा अपनी किताब ‘वाजपेयी द इयर्स दैट चेंज्ड इंडिया’ में लिखते हैं- ‘लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडिस, यशवंत सिन्हा और जसवंत सिंह प्रधानमंत्री आवास में डायनिंग टेबिल के चारों ओर बैठे हुए थे।
सोफे पर बैठे वाजपेयी गहरी सोच में डूबे थे। कोई किसी से कुछ नहीं बोल रहा था। उस कमरे में मौजूद हर शख्स की आंखों में आंसू थे। बहुत देर बाद वाजपेयी के चेहरे पर मुस्कान दिखाई दी। उन्होंने जोर का ठहाका लगाया।’

साल 1998, पोकरण में परमाणु परीक्षण के बाद खुशी जाहिर करते हुए प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडिस और डॉ. अब्दुल कलाम।
उसी शाम वाजपेयी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया- ‘आज 3.45 बजे भारत ने तीन भूमिगत परमाणु परीक्षण किए हैं। मैं इन्हें सफलतापूर्वक अंजाम देने वाले वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को बधाई देता हूं।
दो दिन बाद यानी 13 मई को भारत ने फिर से दो परमाणु परीक्षण किए।
दुनिया हैरान रह गई। CIA चौंक गई। उन्हें भनक तक नहीं थी। पाकिस्तान में फिर से हलचल मच गई- ‘हिंदुस्तान ने दो बार परमाणु बम का परीक्षण कर लिया और हम एक के लिए तरस रहे।’
ठीक 17 दिन बाद। 28 मई, 1998 की शाम। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ अचानक टेलीविजन पर आए। उन्होंने कहा- ‘बीते दिनों भारत ने जो एटमी परीक्षण किए, आज हमने उसका भी हिसाब चुका दिया है और पांच एटमी परीक्षण किए हैं।’
उसी भाषण में शरीफ ने दावा किया- ‘आज अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने कहा कि हम आपको पांच अरब डॉलर दे रहे हैं। आप मेहरबानी करके एटम धमाका ना करें। मैंने उनसे कहा कि हमारे जमीर का सौदा ना करें, हम बिकने वाली कौम नहीं हैं। क्लिंटन बोले- आप पर प्रतिबंध लग जाएंगे। मैंने कहा- लगा दें पाबंदियां, क्या होगा।’
इस तरह ‘ऑपरेशन कहूटा’ के बाद भी पाकिस्तान परमाणु ताकत हासिल करने वाला दुनिया का सातवां देश बन गया।
आज भी इस मिशन को लेकर सियासी गलियारों में मोरारजी देसाई के उस कदम को लेकर सवाल उठते हैं। मई 1990 में, पाकिस्तान ने मोरारजी को निशान-ए-पाकिस्तान सम्मान भी दिया। ये पाकिस्तान का सबसे बड़ा सम्मान है।
नोट : कहानी में शामिल कुछ असली किरदारों के नाम बदले हुए हैं।
ऑपरेशन कहूटा की पहली कड़ी भी पढ़िए…

18 मई 1974, सुबह के ठीक 9 बज रहे थे। आकाशवाणी के दिल्ली स्टेशन पर उस दौर की ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘बॉबी’ का गाना बज रहा था- ‘हम तुम एक कमरे में बंद हों, और चाबी खो जाए…’
अचानक, गाने को बीच में ही रोक दिया गया। रेडियो पर कुछ सेकेंड्स के लिए सन्नाटा पसर गया। फिर अनाउंसर की गंभीर आवाज गूंजी- ‘एक महत्वपूर्ण प्रसारण की प्रतीक्षा करें…पूरी कहानी पढ़िए…
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रेफरेंस : 1. Vajpayee: The Years That Changed India : By Shakti Sinha 2. The Kaoboys of R&AW : By B Raman 3. Kahuta: The Indo-Israeli Plan to Attack Pakistan’s Nuclear Plant : Saghir Iqbal 4. The man from Pakistan : Douglas Frantz and Catherine Collins 5. Weapons of Peace : Raj Chengappa
