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मौन की राह; साइलेंट रिट्रीट से बदली जिंदगी मिला सुकून:दो दशक की थेरेपी जहां रही नाकाम, साइलेंट रिट्रीट के मौन ने संवारी बिखरी जिंदगी




भागदौड़ भरी आधुनिक जिंदगी में हम लगातार बोल रहे हैं, लिख रहे हैं, स्क्रीन स्क्रॉल कर रहे हैं और संवाद के शोर में घिरे हुए हैं। शादी, बच्चे, करिअर में सफलता…सब कुछ हासिल करने के बाद भी मन में अजीब सा असंतोष और खालीपन बना रहता है। चर्चित अमेरिकी लेखक बोरिस फिशमैन ऐसी ही स्थिति से गुजर रहे थे। जब लगा कि दो दशकों की थेरेपी और लगातार बातचीत भी उनके जीवन को नहीं सुधार पा रही है, तो उन्होंने एक अनोखा ‘मौन’ का रास्ता चुना। ये मौका मिला उन्हें जॉर्जिया के एक साइलेंट रिट्रीट में… इसके बाद जिंदगी किस तरह बदली, जानिए फिशमैन से… ‘मेरी तीस की उम्र उपलब्धियों से भरी दिखती थी। शादी, बच्चे, दो चर्चित किताबें और यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर की नौकरी, सब कुछ था। लेकिन भीतर गहरा असंतोष था। पत्नी से रिश्ता तनावपूर्ण था, माता-पिता बनने की खुशी जिम्मेदारियों में दब गई थी, किताबों को सराहना मिली, पर पाठक नहीं। नौकरी के कारण परिवार से 2400 किमी दूर था…पूरी तरह हताश। वर्षों की थेरेपी और बातचीत कोई समाधान नहीं दे सकी। शब्दों ने मुझे सफलता तो दिलाई, पर भीतर खालीपन बढ़ता गया। सोशल मीडिया और लगातार शोर ने इस बेचैनी को और गहरा कर दिया था। एक परिचित ने मुझे ‘साइलेंट रिट्रीट’ के बारे में बताया। यह साधारण ईसाई मौन आश्रम था। न कोई विलासिता, न वाई-फाई। मैं ईसाई नहीं था, पर बिखरी हुई जिंदगी से इतना थक चुका था कि वहां जाने का फैसला ले लिया। आश्रम खेतों के बीच बसा सादा मठ था। मुझे छोटी कुटिया मिली, जिसमें जरूरी सुविधाएं थीं। फोन-लैपटॉप जमा कराने के बाद मेरे पास करने के लिए सचमुच कुछ भी नहीं बचा था। जब मैंने बोलना बंद किया, तो पहली बार प्रकृति की आवाजें सुनाई देने लगीं। मैं नंगे पैर खेतों में घूमता, पक्षियों की चहचहाहट सुनता और पेड़ों की खुरदरी छाल महसूस करता। वर्षों बाद समझ आया कि ‘वर्तमान में जीना’ सिर्फ विचार नहीं, बल्कि अनुभव है। यहां तक कि पुरानी गाड़ी के स्टेयरिंग व्हील को देखना भी असाधारण रूप से वास्तविक और अर्थपूर्ण लगा। मौन के उस विस्तृत एकांत में, जब फोन का शोर और शब्दों की अनवरत दौड़ थम गई, मन की धुंध छंटने लगी। तभी महसूस हुआ कि जिंदगी सबसे गहरा उद्देश्य प्रेम है और उसे प्रियजनों तक पहुंचाना ही सबसे बड़ी जिम्मेदारी। रिट्रीट से लौटने के बाद मेरी दुनिया तुरंत नहीं बदली। अगली किताब भी सफल नहीं हुई और पारिवारिक समस्याएं भी बनी रहीं। हाल में जब दोबारा वहां गया, तो जीवन का गहरा सच समझ आया। मठ के एक वरिष्ठ ने कहा, ‘यहां आने वाले लोग मशहूर होने की दौड़ में नहीं हैं, लेकिन वे अच्छे इंसान हैं।’ तब एहसास हुआ कि मैं हर जगह फिट होने और दूसरों को प्रभावित करने की कोशिश में खुद को खो रहा था। मौन ने सिखाया कि किसी विशेष व्यक्ति बनने के दबाव से मुक्त होना ही सच्ची आजादी है। आज मैं अधिक शांत हूं, क्योंकि मौन ने मुझे मेरी असली पहचान से मिलवा दिया।’ -बोरिस



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