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27 मिनट पहलेलेखक: अदिति ओझा
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महीने की शुरुआत में सैलरी खाते में आते ही लगता है कि इस बार जरूर बचत होगी। लेकिन महीने के आखिर तक अकाउंट फिर खाली होता है। समझ ही नहीं आता कि पैसा आखिर कहां खर्च हो जाता है। कई बार आर्थिक परेशानियों की वजह कोई बड़ी खरीदारी नहीं, बल्कि रोज के अनियोजित खर्च होते हैं।
सभी गैरजरूरी खर्चों को कंट्रोल करने को ‘फाइनेंशियल मिनिमलिज्म’ कहते हैं। इसमें बचत और निवेश को प्राथमिकता दी जाती है।
इन्हीं गैरजरूरी खर्चों पर लगाम लगाने की सोच को ‘फाइनेंशियल मिनिमलिज्म’ कहते हैं। इसका मतलब कंजूसी करना नहीं, बल्कि हर रुपए को सोच-समझकर खर्च करना और बचत व निवेश को प्राथमिकता देना है।
जापान का 100 साल से भी पुराना बजटिंग तरीका ‘ककीबो’ (Kakeibo) भी इसी सिद्धांत पर आधारित है। इसमें हर खर्च को लिखने और समय-समय पर उसकी समीक्षा करने की सलाह दी जाती है, ताकि पता चल सके कि कौन-सा खर्च वास्तव में जरूरी था और कौन-सा नहीं।
आज ‘आपका पैसा’ में फाइनेंशियल मिनिमलिज्म की बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि-
- फाइनेंशियल मिनिमलिज्म कैसे शुरू करें?
- 20-30 साल के युवाओं के लिए मिनिमलिज्म क्यों जरूरी है?
एक्सपर्ट- जितेंद्र सोलंकी, फाइनेंशियल एडवाइजर, गाजियाबाद
सवाल- फाइनेंशियल मिनिमलिज्म क्या है?
जवाब- यह पैसे को मैनेज करने का एक तरीका है। इसमें व्यक्ति गैरजरूरी खर्च नहीं करता है। रकम को बचत या निवेश में लगाता है।
उदाहरण के लिए-
- एक व्यक्ति हर साल बदलते ट्रेंड को फॉलो करने के लिए नया स्मार्टफोन खरीदता है।
- वहीं, फाइनेंशियल मिनिमलिज्म अपनाने वाला व्यक्ति पुराना फोन ठीक से चलने तक उसी का इस्तेमाल करता रहता है।
सवाल- क्या फाइनेंशियल मिनिमलिज्म का मतलब सिर्फ कम खर्च करना है?
जवाब- नहीं, इसका मतलब सही जगह और सही चीजों पर खर्च करना है, जैसेकि-
- कम कीमत देखकर बार-बार जूते खरीदने की बजाय एक बार अच्छी क्वालिटी का और लंबे समय तक चलने वाला जूता खरीदना फाइनेंशियल मिनिमलिज्म है।
- स्वास्थ्य, शिक्षा, बीमा और निवेश जैसी जरूरी चीजों पर खर्च करना भी फाइनेंशियल मिनिमलिज्म का हिस्सा है।
सवाल- फाइनेंशियल मिनिमलिज्म और कंजूसी में क्या फर्क है?
जवाब- फाइनेंशियल मिनिमलिज्म समझदारी से खर्च करना है, जबकि कंजूसी जरूरी खर्च से भी बचना है। ग्राफिक में दोनों का फर्क देखिए-

सवाल- मिनिमलिस्ट लाइफस्टाइल आज दुनिया भर में पॉपुलर क्यों हो रही है?
जवाब- लोग अब सिर्फ ज्यादा कमाने की बजाय पैसों का समझदारी से इस्तेमाल करने और आर्थिक सुकून पाने पर भी ध्यान दे रहे हैं। यही वजह है कि फाइनेंशियल मिनिमलिज्म तेजी से पॉपुलर हो रहा है। इसके पीछे कई वजहें हैं-
- बढ़ती महंगाई और बढ़ता खर्च।
- कर्ज से बचने की चाह।
- गैरजरूरी खरीदारी से दूरी।
- जल्दी आर्थिक आजादी पाने की इच्छा।
- कम तनाव और संतुलित जीवन की चाह।
सवाल- हम जरूरत से ज्यादा सामान क्यों खरीद लेते हैं?
जवाब- इसकी कई वजहें होती हैं-
- जरूरत और इच्छा में फर्क न कर पाना।
- बिना योजना या बजट के खरीदारी करना।
- ‘कभी काम आएगा’ सोचकर अतिरिक्त सामान खरीद लेना।
- कम कीमत देखकर खरीदारी करना।
- खरीदने से पहले यह न सोचना कि उस चीज का इस्तेमाल कितना होगा।
सवाल- ऑनलाइन शॉपिंग एप्स हमारी खरीदारी की आदतों को कैसे प्रभावित करते हैं?
जवाब- ऑनलाइन शॉपिंग एप्स ऐसी डिजिटल स्ट्रैटजी अपनाते हैं, जो लोगों को ज्यादा और जल्दी खरीदारी करने के लिए प्रेरित करती हैं। इसे पॉइंटर्स से समझिए-
पर्सनलाइज्ड रिकमेंडेशन
सर्च और खरीदारी के आधार पर पसंद की चीजें बार-बार दिखाते हैं।
फ्लैश सेल का दबाव
कम समय का ऑफर देकर तुरंत खरीदने का साइकोलॉजिकल प्रेशर बनाते हैं।
लगातार ऑफर और नोटिफिकेशन
लगातार डिस्काउंट और डील्स के मैसेज खरीदारी की इच्छा बढ़ाते हैं।
आसान और तेज पेमेंट
इससे खरीदारी में लगने वाला समय और सोचने का मौका कम हो जाता है।
सवाल- सोशल मीडिया और इन्फ्लुएंसर्स हमारी खर्च करने की आदतों को कैसे बदल रहे हैं?
जवाब- पॉइंटर्स से समझिए-
- नई-नई चीजों की जरूरत महसूस कराते हैं।
- लग्जरी लाइफस्टाइल को सामान्य जैसा दिखाते हैं।
- स्पॉन्सर्ड प्रोडक्ट्स को भरोसेमंद बनाकर पेश करते हैं।
- बार-बार एक ही प्रोडक्ट दिखाकर खरीदने की इच्छा बढ़ाते हैं।
- दूसरों से तुलना करने की आदत बढ़ाते हैं।
सवाल- क्या इमोशनल स्ट्रेस भी फिजूलखर्च की वजह है?
जवाब- हां, कुछ लोग तनाव, उदासी या चिंता में ज्यादा खरीदारी करते हैं। इससे कुछ समय के लिए अच्छा महसूस होता है। इसे ‘इमोशनल स्पेंडिंग’ या ‘रिटेल थेरेपी’ कहा जाता है। अगर यह आदत लगातार बनी रहे, तो बजट और बचत दोनों प्रभावित होते हैं।
सवाल- कौन-से संकेत बताते हैं कि आपके जीवन में फाइनेंशियल क्लटर (आर्थिक अव्यवस्था) है?
जवाब- अगर पैसे होने के बावजूद बचत नहीं हो रही, तो यह फाइनेंशियल क्लटर का संकेत हो सकता है। ग्राफिक में सभी संकेत देखिए-

सवाल- फाइनेंशियल मिनिमलिज्म कैसे शुरू करें?
जवाब- सभी आसान तरीके ग्राफिक में देखिए-

अब इन पॉइंट्स को थोड़ा विस्तार से समझिए-
1. खर्चों का ऑडिट करें
- पिछले 3 महीने का बैंक स्टेटमेंट देखें।
- पता लगाएं सबसे ज्यादा पैसा कहां खर्च हो रहा है।
2. जरूरत और इच्छा में फर्क समझें
खरीदने से पहले खुद से ये सवाल पूछें-
- क्या इसकी सच में जरूरत है?
- क्या इसके बिना काम चल सकता है?
3. ‘24-घंटे या 30-दिन का रूल’ अपनाएं
- छोटी खरीदारी से पहले 24 घंटे रुकें।
- महंगी खरीदारी से पहले 30 दिन इंतजार करें।
4. घर का फाइनेंशियल डिक्लटर करें
- यूज न होने वाले सामान हटाएं।
- इस्तेमाल न होने वाली चीजें बेचें या दान करें।
5. सब्सक्रिप्शन की समीक्षा करें
- OTT, एप्स, जिम और अन्य सर्विसेस को रिव्यू करें।
- जिनका उपयोग नहीं करते, उन्हें बंद करें।
6. EMI और कर्ज कम करें
- नए कर्ज लेने से बचें।
- पहले पुराने कर्ज चुकाने पर फोकस करें।
7. बचत को ऑटोमैटिक बनाएं
- सैलरी आते ही SIP या बचत खाते में पैसा ट्रांसफर करें।
- ‘पहले बचत, फिर खर्च’ का नियम अपनाएं।
8. खरीदारी की लिमिट तय करें
- हर महीने गैरजरूरी खर्च का बजट बनाएं।
- उसी सीमा के भीतर खरीदारी करें।
9. कम, लेकिन अच्छी क्वालिटी खरीदें
- सस्ती और बार-बार खराब होने वाली चीजों से बचें।
- टिकाऊ और उपयोगी वस्तुओं को प्राथमिकता दें।
10. बचाए हुए पैसों का निवेश करें
- केवल खर्च कम करना पर्याप्त नहीं।
- सेविंग्स को SIP, PPF, EPF या अन्य निवेश विकल्पों में लगाएं।
सवाल- ‘24-ऑवर रूल’ और ‘30-डे रूल’ क्या है, डिटेल में समझाएं?
जवाब- पॉइंटर्स से समझिए-
24-ऑवर रूल
- यह नियम रोजमर्रा की छोटी या अचानक होने वाली खरीदारी के लिए अपनाया जाता है।
- अगर कोई चीज तुरंत खरीदने का मन हो, तो कम-से-कम 24 घंटे इंतजार करें।
- इस दौरान सोचें कि आपको वास्तव में इसकी जरूरत है या सिर्फ ऑफर, ट्रेंड या भावनाओं की वजह से खरीद रहे हैं।
- अगर 24 घंटे बाद भी वह चीज जरूरी लगे, तभी खरीदें।
30-डे रूल
- यह नियम महंगी या बड़ी खरीदारी के लिए उपयोगी है।
- कार, महंगा गैजेट, फर्नीचर या अन्य बड़ी खरीदारी का फैसला कम-से-कम 30 दिन के लिए टाल दें।
- इस दौरान अपने बजट, जरूरत और दूसरे विकल्पों पर विचार करें।
- अगर 30 दिन बाद भी वह चीज जरूरी लगे और बजट में फिट हो, तभी खरीदें।
सवाल- कपड़ों पर खर्च कैसे कम करें?
जवाब- पॉइंटर्स से समझिए-
- जरूरत होने पर ही नए कपड़े खरीदें।
- ट्रेंड के पीछे भागने से बचें।
- ऐसे कपड़े चुनें, जिन्हें कई तरीकों से पहन सकें।
- कम, लेकिन अच्छी क्वालिटी के कपड़े खरीदें।
- खरीदारी से पहले अपनी अलमारी जरूर देखें।
- सिर्फ सेल या डिस्काउंट देखकर खरीदारी न करें।
- कपड़ों का सही रखरखाव करें।
सवाल- क्या महंगे गैजेट्स सच में जरूरी हैं? इस खर्च को कैसे कम करें?
जवाब- नहीं, अगर मौजूदा डिवाइस आपकी जरूरत पूरी कर रही है, तो सिर्फ नया मॉडल आने या ट्रेंड के कारण उसे बदलने की जरूरत नहीं है। इसके अलावा-
- खरीदने से पहले फीचर्स और कीमत की तुलना करें।
- पहले बजट तय करें, फिर खरीदारी करें।
- EMI या लोन लेने से पहले कुल खर्च का हिसाब लगाएं।
सवाल- छोटे-छोटे खर्च कम करने से लंबी अवधि में कितना बड़ा फंड बन सकता है?
जवाब- अगर आप रोज सिर्फ ₹100 बचाकर नियमित निवेश करते हैं, तो यही छोटी बचत 10-20 साल में लाखों रुपए का फंड बन सकती है। ग्राफिक में रोज ₹100 बचाने की ताकत देखिए-

सवाल- 20-30 साल के युवाओं के लिए मिनिमलिज्म क्यों जरूरी है?
जवाब- इस उम्र में फाइनेंशियल मिनिमलिज्म अपनाने से भविष्य के लिए मजबूत फाइनेंशियल बेस तैयार होता है। इससे-
- बचत और निवेश की आदत बनती है।
- गैरजरूरी खर्च और कर्ज कम होता है।
- इमरजेंसी फंड बनाना आसान होता है।
- बड़े फाइनेंशियल गोल हासिल करना आसान होता है।
- कम उम्र से निवेश शुरू करने पर कंपाउंडिंग का ज्यादा फायदा मिलता है।
- आर्थिक तनाव कम रहता है।

सवाल- शुरुआती नौकरी में कौन-सी वित्तीय आदतें अपनानी चाहिए?
जवाब- इस दौरान अपनाई गई आदतें भविष्य की आर्थिक स्थिति को मजबूत बना सकती हैं। ऐसे में-
- आय का बजट बनाकर खर्च करें।
- हर महीने पहले बचत और निवेश करें।
- इमरजेंसी फंड बनाना शुरू करें।
- क्रेडिट कार्ड सोच-समझकर इस्तेमाल करें।
- गैरजरूरी कर्ज और खर्च से बचें।
- आय बढ़ने पर बचत और निवेश भी बढ़ाएं।
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हर कोई चाहता है कि 35-40 की उम्र तक उसके पास इतना पैसा हो कि घर खरीदने, कोई बिजनेस शुरू करने या बच्चों की पढ़ाई जैसे सपने पूरे करने के लिए पैसों की चिंता न करनी पड़े।
अच्छी बात यह है कि 1 करोड़ का फंड बनाने के लिए बहुत बड़ी सैलरी होना जरूरी नहीं है। पूरी खबर पढ़ें…

