साल 1967 और तारीख 23 मार्च। घड़ी में सुबह के 10 बज रहे थे। पंजाब का फिरोजपुर में एक गांव है हुसैनीवाला। सतुलज नदी के किनारे। इसी गांव में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की समाधि है।
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उस रोज यहां मेला लगा था। नारे गूंज रहे थे। तभी 24 साल का नौजवान मंच पर चढ़ा। माइक संभाला और बुलंद आवाज में एक कविता पढ़ी।
‘तेरे लहू से सींचा है, अनाज हमने खाया।
यह जज्बा-ए-शहादत, है उसी से हममें आया॥’
कविता खत्म होते ही तालियां बजने लगीं। ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे गूंजने लगे। नौजवान मंच से उतरा। सामने सेना की वर्दी में एक अफसर खड़ा था।
अफसर ने उसकी पीठ थपथपाई और बोला, ‘बहुत शानदार कविता पढ़ी आपने, लेकिन असली बहादुरी कुर्बानी मांगती है।’
‘कुर्बानी?’ नौजवान ने पूछा।
अफसर मुस्कराया- ‘भगत सिंह जैसा जज्बा आपके भीतर है?’
नौजवान तनकर बोला, ‘साहब, जिस दिन सरहद पर गोली चले, मुझे बुला लेना। आपसे चार कदम आगे दिखूंगा। अगर पीछे भागने लगूं, तो मुझे वहीं गोली मार देना।’
अफसर ने उसके कंधे पर हाथ रखा, ‘आप तो बड़े जज्बाती हो रहे हैं।’
नौजवान ने कहा, ‘मैं हवा में बातें नहीं कर रहा साहब। इस देश को जहां मेरी जरूरत पड़ेगी, यह बंदा हाजिर मिलेगा।’
अफसर ने उसकी पीठ थपथपाई और आगे बढ़ गया।

मंच पर कविता पाठ करता हुआ नौजवान। AI इमेज
ठीक एक महीने बाद… वही फौजी अफसर उस नौजवान के घर पहुंचा। उसे अकेले में ले जाकर कहा- ‘अब वो वक्त आ गया है, जिसका वादा तुमने सतलुज के किनारे किया था।’
नौजवान की धड़कन तेज हो गई। पूछा, ‘क्या मतलब साहब?’
अफसर ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा, ‘मुझे पूरा भरोसा है कि तुम अपनी बात से मुकरोगे नहीं।’
नौजवान चुप रहा। घर-परिवार, नौकरी, शादी, दोस्त… सब एक पल में दिमाग में घूम गए। फिर खुद को संभालकर बोला, ‘काम क्या करना होगा साहब?’
अफसर मुस्कुराया, ‘देश की सेवा। जब तुम तैयार हो जाओगे, तो काम भी समझ जाओगे।’
नौजवान बोला, ‘मुझे थोड़ा वक्त चाहिए।’
अफसर ने जेब से एक पर्ची निकालकर उसके हाथ में रख दी, ‘जब मन पक्का हो जाए, तो इस पते पर आ जाना।’
एक महीने बाद नौजवान उस पते पर पहुंचा। एक पुरानी इमारत। कमरे में मद्धम रोशनी, दीवारों पर भारत-पाकिस्तान के नक्शे और मेज पर कुछ फाइलें रखी थीं।
सामने वही अफसर बैठा था। नौजवान ने जाते ही कहा, ‘साहब, मैं तैयार हूं। बताइए क्या करना है?’
अफसर मुस्कुराया, ‘तुम्हें सरहद पार करके पाकिस्तान जाना है।’
‘पाकिस्तान?’ लड़का हैरान रह गया।
अफसर कुर्सी से उठा और उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोला, ‘देशभक्ति का मतलब सिर्फ सरहद पर बंदूक चलाना नहीं होता। तुम्हें दुश्मन के घर में घुसकर उनके राज चुराने हैं।’
नौजवान ने कहा- ‘यानी… जासूस बनना?’
‘बिल्कुल सही समझे।’
नौजवान थोड़ा झिझका, फिर मन ही मन सोचा कि इसी बहाने पाकिस्तान भी देख लूंगा। बोला, ‘ठीक है साहब, तैयार हूं। कब निकलना है?’
अफसर हंस पड़ा, ‘धीरज रखो। वहां सिर्फ जाना नहीं है, रहना है, उन्हीं में घुलना-मिलना है और उनके राज चुराने हैं। हर पल जान का खतरा रहेगा।’
नौजवान बोला, ‘हां साहब… मैं समझ रहा हूं।’
अफसर ने कहा, ‘ठीक है। घरवालों से कह दो कि सरकारी ट्रेनिंग के सिलसिले में जालंधर जाना है। कल सुबह यहीं मिलते हैं।’

नौजवान से बात करता हुआ अफसर। AI इमेज
नौजवान ने वैसा ही किया। घरवालों से जालंधर जाने की बात कहकर अगले दिन अफसर के पास पहुंच गया।
उसे जालंधर मिलिट्री कैंट भेजा गया। छोटे हथियार चलाना, निशाना लगाना और अपना बचाव करना सिखाया गया। इसके बाद दिल्ली और अमृतसर के सेफ-हाउसेज में उसकी ट्रेनिंग चलती रही।
वहां उसने कंटीले तारों के बीच से बॉर्डर पार करना, छुपकर फोटो खींचना, नक्शे पढ़ना और कोड वर्ड में मैसेज लिखना और समझना सीखा।
फिर उसे एक मस्जिद भेजा गया। वहां के इमाम ने उसे उर्दू बोलना, नमाज पढ़ना और मुसलमानों के रीति-रिवाज ऐसे रटा दिए कि कोई शक भी न कर सके।
अगस्त 1967 में वह फिर अफसर से मिला और बोला, ‘साहब, ट्रेनिंग पूरी हो गई।’
अफसर मुस्कुराया, ‘पंडित जी… अभी सबसे बड़ा काम बाकी है।’
नौजवान ने पूछा, ‘कौन सा काम साहब?’
अफसर ने एक पर्ची उसकी तरफ बढ़ाई, ‘इस पते पर चले जाओ। तुम्हें सब समझ आ जाएगा।’
अगली सुबह वह उस पते पर पहुंच गया। सुनसान इमारत। कमरे का दरवाजा खोलते ही हवा में डिटॉल और सर्जिकल स्पिरिट की तीखी गंध। कमरे के बीचों-बीच एक स्ट्रेचर रखा था। उसके ऊपर सफेद सर्जिकल लाइट जल रही थी।
गले में आला लटकाए डॉक्टर ने नौजवान से कहा, ‘स्ट्रेचर पर लेट जाओ।’
नौजवान ने झिझकते हुए पूछा, ‘लेट जाऊं? पर क्यों?’
डॉक्टर ने सर्जिकल चाकू उठाते हुए कहा, ‘तुम्हारी पहचान मिटाने का वक्त आ गया है। अब भी पीछे हटना चाहो तो हट सकते हो।’
नौजवान ने गहरी सांस ली और बोला, ‘डॉक्टर साहब, मैं पीछे हटने वालों में से नहीं हूं।’
वह स्ट्रेचर पर लेट गया और अपनी मुट्ठियां कस लीं। दर्द से माथे की नसें फूल गईं। उसका खतना कर दिया गया।

खतना के लिए स्ट्रेचर पर लेटा हुआ नौजवान। AI इमेज
थोड़ी देर बाद जब वह कराहता हुआ बाहर निकला, तो सामने वही फौजी अफसर खड़ा था। अफसर ने पीठ थपथपाकर कहा, ‘शाबाश… वेलकम टू द वर्ल्ड ऑफ शैडोज, मोहम्मद असलम।‘
नौजवान का असली नाम था- मोहनलाल भास्कर।
पंजाब के अबोहर का रहने वाला मोहनलाल फिरोजपुर के एक हाई स्कूल में हिंदी का मास्टर था। उसे कविताएं और कहानियां लिखने का शौक था, लेकिन अब वह सब कुछ छोड़कर एक अनजान रास्ते पर निकल चुका था। मंजिल थी- पाकिस्तान।
दरअसल, 1965 की जंग हारने के बाद पाकिस्तान चुपके-चुपके फिर तैयारी में लगा था। बाहर से हथियार मंगाए जा रहे थे। भारत को खबर तो थी, पर पक्की जानकारी चाहिए थी- फौज कहां तैनात है, हथियार कौन से हैं और पाकिस्तान की अगली चाल क्या है।
मोहनलाल को यही सब पता लगाना था।
अगस्त 1967 की एक अंधेरी रात। मोहनलाल दबे पांव पाकिस्तानी बॉर्डर की तरफ बढ़ा। दोनों तरफ खेतों में मक्के लहलहा रहे थे। एक सुनसान जगह देखकर वह खेतों के बीच जमीन पर लेट गया और रात गहराने का इंतजार करने लगा।
दो घंटे बाद वह पेट के बल रेंगते हुए आगे बढ़ा। एक पतली पगडंडी पर जलता हुआ लाल कोयला दिखा। मोहनलाल भांप गया कि पाकिस्तानी रेंजर्स ने चिलम में हुक्का सुलगाया है।
उसने जेब से कपड़े की एक पट्टी निकाली, ऐंठकर रस्सी बनाई और उसके एक सिरे पर आग लगा दी। फिर उस सुलगती रस्सी को एक पेड़ की डाल पर टांग दिया और चुपचाप रेंगते हुए दूर हट गया।
तभी गोलियां चलने लगीं। पाकिस्तानी रेंजर्स जलती रस्सी की तरफ दौड़ पड़े। मोहनलाल यही तो चाहता था। वह दूसरी तरफ से तेजी से आगे बढ़ गया।
पौ फटने से पहले वह पाकिस्तान में दाखिल हो चुका था। उन दिनों पाकिस्तान में इमरजेंसी लगी थी। तनाशाह राष्ट्रपति अयूब खान का राज था। लाहौर, सियालकोट, मुल्तान, पेशावर और रावलपिंडी जैसे बड़े शहरों में कर्फ्यू था।

पाकिस्तान पहुंचने के बाद लाहौर में मोहनलाल भास्कर। AI इमेज
शाम ढलते-ढलते मोहनलाल लाहौर पहुंच चुका था। पहली रात उसे गुलबर्ग इलाके में शेख वहीद के कोठे पर बितानी थी। क्योंकि, ये इलाका जासूसों के लिए सेफ हाउस की तरह था।
कोठे का मालिक था शेख वहीद- लंबा कद, करीने से तराशी दाढ़ी, आंखों पर सुनहरे फ्रेम का चश्मा और उंगलियों में हीरों की अंगूठियां।
उसका असली काम था जाली नोटों का धंधा। उसके पास हर मुल्क की नकली करेंसी थी। एक हाथ से असली नोट दो, दूसरे हाथ से दोगुनी नकली करेंसी ले लो।
इसी कोठे में एक गेस्ट हाउस भी था, जिसकी देखरेख ‘वहीदा बेगम’ नाम की औरत करती थी।
मोहनलाल ने सड़क किनारे एक पीसीओ बूथ से वहीदा बेगम को फोन मिलाया।
मोहनलाल- ‘मोहतरमा, मैंने सुना है, गधे आम खाने लगे हैं।’
वहीदा बेगम- ‘सचमुच! आपने कब देखा?’
मोहनलाल- ‘यही आज कोई 6-7 बजे।’
वहीदा बेगम- ‘शुक्रिया, हम भी देखेंगे।’
शाम ठीक 7 बजे मोहनलाल उस कोठे के मेन गेट पर था। उसने दरबान को कोड वर्ड बताया- ‘आदमखैल से आया हूं अंगूर लाया हूं।’
दरबान उसे ड्राइंग रूम में ले गया। सोफे पर वहीदा बेगम बैठी थी। मोहनलाल ने जेब से दो सौ रुपए निकाले और मेज पर रख दिए। वहीदा ने मुस्कुराकर रुपए उठाए, ‘तशरीफ रखिए असलम मियां।’
उसने सोफे के पास लगा एक बटन दबाया। बगल का दरवाजा खुला और दस लड़कियां कतार में आकर खड़ी हो गईं। मोहनलाल कुछ देर उन्हें देखता रहा, फिर सोचा- ‘ऐसी लड़कियां तो कहीं भी मिल जाएंगी। मुझे जिस्म नहीं, राज चाहिए।’
उसने ना में सिर हिला दिया, ‘इनमें से कोई नहीं।’
वहीदा के इशारे पर सब वापस चली गईं। वह थोड़ी हैरान हुई, ‘माफ कीजिएगा असलम मियां, आज तो इनके अलावा कोई और नहीं है।’
उसने जैसे ही रुपए लौटाने चाहे, मोहनलाल बोला, ‘आज मुझे सिर्फ आप चाहिए।’
वहीदा चौंकी, ‘इन नई-उम्र लड़कियों को छोड़कर आप मुझे पसंद कर रहे?’
मोहनलाल ने तुरंत कहा, ‘क्योंकि आप तजुर्बेकार हैं।’
वहीदा हंस पड़ी, ‘मुझे तो रात दस बजे से पहले फुर्सत नहीं मिलेगी।’
‘कोई बात नहीं। आप एक स्कॉच व्हिस्की की बोतल भिजवा दें। तब तक मैं कमरे में आराम कर लेता हूं।’ मोहनलाल ने कहा।

वहीदा बेगम के कोठे में मोहनलाल भास्कर। AI इमेज
मोहनलाल कमरे में गया, नहाया-धोया, कपड़े बदले और व्हिस्की का गिलास लेकर चुस्कियां लेने लगा।
रात के 9 बज चुके थे। वहीदा कमरे में आई। रेशमी सलवार-कमीज, भारी गहने और आंखों में गहरा सुरमा। बेड पर बैठते हुए बोली, ‘गुस्ताखी माफ असलम मियां… जरा देर हो गई।’
मोहनलाल बोला, ‘कोई बात नहीं वहीदा बेगम।’
अब दोनों शराब पीने लगे। वहीदा एक के बाद एक गिलास खाली करती गई। थोड़ी देर में उसका संतुलन बिगड़ने लगा और जुबान लड़खड़ाने लगी।
मोहनलाल ने धीरे से कहा, ‘वहीदा बेगम… सुना है आपकी कोठे पर बड़े-बड़े लोग आते हैं?’
वहीदा हंसी, ‘हाहाहा… असलम मियां, यहां वो आते हैं जिनके एक दस्तखत पर तुम्हारे जैसे सौ लोगों की किस्मत बदल जाए।’
‘अरे छोड़िए बेगम, कौन सा कोई ब्रिगेडियर, जनरल अपनी बीवी को छोड़कर यहां आएगा?’ मोहनलाल ने कहा।
गिलास में शराब डालते हुए वहीदा बोली, ‘शौकत। ब्रिगेडियर शौकत। पिछले जुम्मे को पूरी बोतल खाली करके गया था। और वो रावलपिंडी वाले जनरल साहिब… जब भी लाहौर आते हैं, सबसे पहले वहीदा का हाल पूछते हैं।’
‘अच्छा? पर फौजी अफसर तो बड़े सख्त होते हैं वहीदा जी…?’ मोहनलाल ने उसे उकसाया।
वहीदा झट से बोल पड़ी, ‘असलम मियां… शराब अंदर जाती है न, तो फौजियों की वर्दियां उतर जाती हैं। वे बड़े-बड़े राज… सब इसी कमरे में बिखेर देते हैं।’
थोड़ा रुककर बोली, ‘उस दिन… ब्रिगेडियर शौकत बता रहा था कि खारियां कैंट में अमेरिकी पैटन टैंकों की नई खेप आ रही है… कहता था, ‘वहीदा, इस बार हिंदुस्तानी बॉर्डर पर ऐसा घेरा बनाएंगे कि दिल्ली तक धुआं उठेगा!’ हाहाहा… बताओ भला, मुझे इन टैंकों से क्या लेना-देना?’
मोहनलाल ने ठहाका लगाया, ‘वाह वहीदा बेगम… आप तो फौज की राजदार निकलीं। इसी बात पर एक-एक जाम और हो जाए।’

वहीदा बेगम के साथ मोहनलाल भास्कर। AI इमेज
थोड़ी देर बाद वहीदा बेसुध होकर सो गई। मोहनलाल ने तुरंत एक कागज पर सबकुछ कोडवर्ड में लिखा और अपनी कमीज के कॉलर में छिपा लिया। फिर वह भी सो गया।
तड़के अजान की आवाज से मोहनलाल की आंख खुली। वहीदा सो रही थी। वह उठा और अखबार पढ़ने लगा। फिर नहा-धोकर तैयार हुआ, वहीदा को जगाया और जल्द वापस आने का वादा करके वहां से निकल गया।
अब मोहनलाल को यह खुफिया राज जल्द से जल्द हिंदुस्तान भेजना था।
पुराने बस स्टॉप के पास एक फोटो स्टूडियो था। दुकानदार अभी-अभी शटर उठाकर सफाई कर रहा था। मोहनलाल ने कहा, ‘अस्सलाम वालेकुम रहीम चाचा। एक फोटो खिंचवानी थी।’
‘इतनी तड़के?’ रहीम ने मुस्कुराकर पूछा।
‘हां चाचा, बाद में भीड़ हो जाती है ना,’ मोहनलाल भी मुस्कुराया।
रहीम उसे अंदर ले गया। पर्दे के पीछे दीवार में एक छोटा सा खुफिया उपकरण लगा था। मोहनलाल ने तुरंत अपनी कमीज के कॉलर से कागज निकाला और मैसेज टाइप करके भेज दिया। फिर रहीम से विदा लेकर बाहर निकल आया।
उधर, दिल्ली में खुफिया एजेंसी के दफ्तर में मशीनें घनघना उठीं। अफसरों ने मैसेज डिकोड किया तो पता चला कि पाकिस्तान के खारियां कैंट में अमेरिकी पैटन टैंकों की नई खेप पहुंच रही है।
असल में रहीम भी भारत की खुफिया एजेंसी से जुड़ा था।
अगले कुछ महीने मोहनलाल लाहौर में ही रहा। वहां उसका एक गाइड था- बाबा समुंद सिंह। समुंद को अफीम की लत थी, नशे में सुध-बुध खो बैठता था, पर काम में पक्का था।
सबके सामने दोनों बाप-बेटा थे और काम- भैंसों का व्यापार। जब भी किसी फौजी छावनी के अंदर की खबरें निकालनी होतीं, तो वे छावनी के एक तरफ वाले गांव से भैंसें खरीदते और उन्हें हांकते हुए दूसरी तरफ बेचने निकल जाते।
लोग भैंसों को देखते रह जाते और मोहनलाल अंदर तैनात टैंकों की गिनती, जवानों की तादाद और तोपों के मॉडल दिमाग में छाप लेता।

मोहनलाल भास्कर और उनका गाइड बाबा समुंद सिंह। AI इमेज
एक रोज मोहनलाल बस पकड़कर खारियां छावनी के लिए निकला। लाहौर से करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर, पाकिस्तान की सबसे बड़ी छावनी। इसे अमेरिका ने रूस पर नजर रखने के लिए बनवाया था।
बस जैसे ही खारियां पहुंची, मोहनलाल की नजर बगल से गुजरते फौज के काफिले पर पड़ी। उसने कंडक्टर से कहा, ‘भाई, मेरा टिकट झेलम तक का कर दो।’
कंडक्टर- ‘पर आपको तो यहीं उतरना था?’
‘हां, पर झेलम में भी थोड़ा काम है। वहां से निपटकर आऊंगा,’ मोहनलाल ने कहा।
बस आगे बढ़ गई। रास्ते भर वह पाकिस्तान की पूरी बटालियन को देखता रहा- अमेरिकी पैटन टैंक, शफी टैंक और 105 एमएम तोपें।
झेलम बस स्टैंड पर उतरने के बाद मोहनलाल एक भीड़-भाड़ वाली सड़क पर चल पड़ा। थोड़ी देर बाद वो एक घड़ी की दुकान पर था। उसने कलाई से पुरानी घड़ी निकाली और काउंटर पर रखते हुए कहा- ‘अस्सलाम वालेकुम करीम भाई। इसकी सुई अटक गई है… जरा देखिए तो।’
करीम ने घड़ी ली और पीछे का ढक्कन खोला। अंदर महीन कागज का टुकड़ा चिपका था। करीम मुस्कुराया, ‘कल आइएगा भाई साहब, बन जाएगी।’
मोहनलाल वहां से चला गया। घड़ी वाला भारत की खुफिया एजेंसी का ही बंदा था। फील्ड से जो भी खबरें आतीं, वह ट्रांसमीटर से सीधे भारत भेज देता था।
एक सुबह मोहनलाल पान की दुकान पर खड़ा था। तभी रेडियो की आवाज उसके कानों में गूंजी- ‘आज मियांवाली जेल में तीन हिंदुस्तानी जासूसों को फांसी दे दी गई।’
मोहनलाल का दिल हलक में आ गया। उसने तुरंत खुद को संभाला और मन ही मन बुदबुदाया- ‘वापस हिंदुस्तान लौट जाना ठीक रहेगा।’
वह फौरन अपने ठिकाने पर पहुंचा और रात होने का इंतजार करने लगा।
जैसे ही रात के आठ बजे, वह घने जंगलों के रास्ते हिंदुस्तान की तरफ निकल पड़ा। टोह लेता हुआ, रास्ता बदल-बदलकर पूरी रात चलता रहा। ट्रेनिंग पक्की थी और वह पहले भी कई बार आ-जा चुका था, इसलिए दिक्कत नहीं हुई।
सुबह होने से पहले ही वह हिंदुस्तान की सीमा में कदम रख चुका था। जालंधर पहुंचते ही वह खुफिया विभाग के अफसर से मिला और पाकिस्तान का सारा हाल बयां कर दिया।
करीब छह महीने तक यह सिलसिला चलता रहा। मोहनलाल अब 16 बार पाकिस्तान आ-जा चुका था। इसी बीच दिसंबर 1967 में उसकी शादी हो गई। पर उसकी जासूसी की भनक किसी को नहीं थी, न मां-बाप को, न पत्नी को।

पत्नी के साथ मोहनलाल भास्कर।
मार्च 1968 की बात है। मोहनलाल जालंधर के एक सेफ-हाउस में ठहरा था। रात आठ बजे किसी ने दरवाजा खटखटाया। बाहर उसका साथी सवा छह फीट लंबे एक नौजवान के साथ खड़ा था।
साथी ने कहा, ‘ये अमरीक सिंह है। अपनी ही लाइन का बंदा है। साहब का हुक्म है कि आज रात यह आपके कमरे में रुकेगा, सुबह इसे पाकिस्तान निकलना है।’
मोहनलाल ने उसे ठहरा तो लिया, पर उसका मन कह रहा था कि यह बंदा खरा नहीं है। उसने अपना बैग सिरहाने छोड़कर बोला, ‘अमरीक भाई, मैं शौच होकर आता हूं।’
वह बाहर निकला और बरामदे की लाइट बंद कर दी। शौचालय का दरवाजा जोर से बंद किया और फिर दबे पांव वापस आकर कमरे की खिड़की से झांकने लगा। उसने देखा कि अमरीक उसके बैग से जासूसी के सीक्रेट कागज निकाल-निकालकर पढ़ रहा था और वापस रख रहा था।
मोहनलाल का शक सही निकला। अगले दिन उसने अपने अफसर से इसकी शिकायत भी की, पर अमरीक मुकर गया।
16 सितंबर 1968 की सुबह। मोहनलाल एक बार फिर पाकिस्तान के लिए निकला। इस बार न जाने क्यों उसका दिल गवाही नहीं दे रहा था। बार-बार ख्याल आ रहा था कि यहीं से घर लौट जाए, लेकिन फौजी अफसर को दिया हुआ वादा याद आ जाता।
वह भारी कदमों से आगे बढ़ता रहा। पाकिस्तानी सीमा से ठीक पहले खालड़ा सेक्टर पड़ता है। जब मोहनलाल वहां से गुजर रहा था, तो रेडियो पर गाना बज रहा था- ‘ओ जाने वाले, हो सके तो लौट के आना…’
अगले दिन मोहनलाल पाकिस्तान पहुंच चुका था। लाहौर जाने वाली बस खड़ी थी। वह चुपचाप चढ़ा और कोने की सीट पर जाकर बैठ गया। थोड़ी दूर जाकर बस एक गांव में रुकी। कुछ सवारियां उतरीं और कुछ चढ़ीं।
तभी मोहनलाल की नजर एक चेहरे पर पड़ी। वही अमरीक सिंह अपने चार साथियों के साथ बस में सवार हो चुका था। उसने सीधे मोहनलाल की तरफ देखा, दुआ-सलाम किया और बगल वाली सीट पर बैठ गया।
मोहनलाल घबरा गया, पर कुछ कह नहीं पाया। उसे यह भी नहीं पता था कि अमरीक पाकिस्तानी एजेंसियों से मिला हुआ है। आगे क्या हुआ, कल यानी रविवार को पढ़िए पार्ट-2 में…
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