पाकिस्तान पर हमला हुआ, तो सऊदी और तुर्किये भी साथ लड़ने आएंगे। 7 अगस्त 2026 को मक्का में तीनों देशों में बीच एक खास रक्षा समझौता हुआ है। अब किसी एक पर हमला, तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। इसे ‘इस्लामिक NATO’ की शुरुआत माना जा रहा, जिसका सबसे ज्यादा
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आखिर एकसाथ क्यों आए पाकिस्तान-सऊदी-तुर्किये और क्या इससे भारत को चिंता करनी चाहिए; इसे ही डिकोड करेंगे आज के एक्सप्लेनर में…
सवाल-1: सऊदी-पाकिस्तान-तुर्किए के बीच क्या डील हुई है? जवाब: करीब 11 महीने पहले सितंबर 2025 में पाकिस्तान और सऊदी अरब में ये डिफेंस समझौता हुआ था। फिर जनवरी 2026 में चर्चा हुई कि इसमें तुर्किये भी शामिल हो सकता है।
पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी तीनों सुन्नी बहुल देश हैं। तुर्किये और सऊदी में बाकी सुन्नी इस्लामिक देशों की लीडरशिप को लेकर तनाव भी रहा है। हालांकि पिछले कुछ सालों से व्यापारिक साझेदारी के जरिए दोनों अपने रिश्ते सुधार रहे हैं। 8 जनवरी को दोनों ने पहली बार नेवी पार्टनरशिप के लिए बैठक की थी।
अब तुर्किये, सऊदी और पाकिस्तान में हुए इस पैक्ट को ‘मक्का एग्रीमेंट’ कहा जा रहा है।
तुर्किये के थिंक टैंक TEPAV में सिक्योरिटी एनालिस्ट डॉ. निहत अली ओजकान बताते हैं…
- सऊदी अरब, कच्चे तेल का सबसे बड़ा एक्सपोर्टर देश है और दुनिया की टॉप-20 अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। इस साझेदारी में आर्थिक मदद देगा।
- पाकिस्तान परमाणु हथियार रखने वाला इकलौता इस्लामिक देश है। वह परमाणु हथियार, बैलिस्टिक मिसाइल और आर्मी की मदद भी देगा।
- तुर्किये के पास NATO सदस्य देशों में अमेरिका के बाद दूसरी सबसे बड़ी सेना है। वो अपनी एडवांस मिलिट्री टेक्नोलॉजी और एक्सपीरियंस देगा। उसने सऊदी-पाकिस्तान से अपनी ड्रोन टेक्नोलॉजी साझा की है।
- पाकिस्तान के F-16 फाइटर जेट अपग्रेड किए और समुद्री युद्धपोत बनाने में मदद की है।

7 अगस्त 2026 को मक्का में सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ ने जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट पर साइन किए हैं।
सवाल-2: तुर्किये NATO का मेंबर, सऊदी को अमेरिकी सुरक्षा; फिर इस डील की जरूरत क्यों पड़ी? जवाब: इसकी 2 वजहें हैं…
1. अमेरिका पर भरोसा नहीं रहा
- ट्रम्प की NATO के संस्थापक सदस्य डेनमार्क के ग्रीनलैंड इलाके पर हमले की धमकी और फिर ईरान जंग के चलते तेल संकट की वजह से NATO देशों में दो धड़े बंट गए हैं।
- इधर ईरान, सऊदी, UAE, कतर, ओमान जैसे मिडिल ईस्ट के सुन्नी देशों पर हमले कर रहा है। ईरान के प्रॉक्सी हूती ने भी सऊदी पर हमले किए हैं। जबकि इन देशों में अमेरिकी सैन्य बेस हैं और अमेरिका इन्हें सुरक्षा की गारंटी देता है।
- इसलिए ट्रम्प और अमेरिका के कमिटमेंट पर इन देशों का भरोसा कम हुआ है। अगर NATO टूटता है, तो तुर्किये के लिए भी बैकअप के तौर पर ये इस्लामिक NATO काम आएगा।
2. इजराइल के मुकाबले न्यूक्लियर ताकत की जरूरत
- तेल भंडार के चलते खाड़ी देश पैसे से संपन्न हैं, लेकिन अमेरिकी की गारंटी के चलते इन्होंने कभी परमाणु हथियार नहीं बनाए। मिडिल ईस्ट में इजराइल अकेला देश है, जिसके पास परमाणु हथियार हैं।
- ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में स्ट्रैटजिक स्टडीज प्रोग्राम के डिप्टी डायरेक्टर विवेक मिश्र के मुताबिक, कभी इजराइल खुद को फंसा हुआ देखेगा, तो न्यूक्लियर अटैक भी कर सकता है।
- खाड़ी देशों को इसका अंदाजा है कि तब उन्हें अमेरिका से न्यूक्लियर सपोर्ट नहीं मिलेगा। इसीलिए वह पाकिस्तान को साथ लेकर ये बताना चाहते हैं कि उनके पास परमाणु हमले का जवाब देने की क्षमता है। पाकिस्तान भी अरब देशों को न्यूक्लियर शील्ड देने की बात कर चुका है।
सवाल-3: क्या डील में और मुस्लिम देश शामिल होंगे और ये ‘इस्लामिक नाटो’ बन सकता है? जवाबः इस्लामिक नाटो की चर्चा तेज तब तेज हुई, जब 7 से 9 सितंबर 2025 तक इजराइल ने 72 घंटों के अंदर 6 इस्लामिक देश- यमन, कतर, लेबनान, सीरिया और ट्यूनिशिया पर हमले किए।
इसके बाद 15 सितंबर को दोहा में इस्लामिक देशों की इमरजेंसी मीटिंग बुलाई गई। अरब लीग और ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कॉर्पोरेशन यानी OIC के 50 से ज्यादा देश जुटे। इसमें इस्लामिक देशों के लिए NATO जैसा ही एक संगठन बनाने का प्रस्ताव तैयार हुआ, लेकिन इसकी कोई ठोस टाइमलाइन नहीं बन पाई।

इजराइल के 72 घंटों के अंदर 6 इस्लामिक देशों पर हमले के बाद ही 17 सितंबर 2025 को सऊदी अरब और पाकिस्तान में डिफेंस पैक्ट हुआ था
अब तुर्किये के एक ऑफिसर ने कहा है कि तीनों देशों की ये डील किसी के खिलाफ नहीं है, बल्कि बाकी देशों के लिए खुली है।
हालांकि ऐसा नहीं लगता कि ये NATO की तरह मजबूत संगठन बन पाएगा…
- 4 अप्रैल 1949 को बना NATO 33 देशों का मजबूत सैन्य संगठन है। इसके आर्टिकल-5 के मुताबिक, किसी भी एक देश पर हमला, सभी देशों पर हमले के समान है।
- इसी आर्टिकल 5 की तर्ज पर हुए समझौते के बावजूद सऊदी और पाकिस्तान अब तक एक-दूसरे की जंग से दूर रहे हैं। पाकिस्तान, अफगानिस्तान तालिबान से संघर्ष में है। वहीं सऊदी अरब पर ईरान और हूतियों ने हमले किए हैं।
- मिडिल ईस्ट की पॉलिसी एनालिस्ट एलिसन माइनर कहती हैं, ‘ये समझौता नाटो जैसा नहीं है और न ही किसी नए क्षेत्रीय गुट जैसा है। पाकिस्तान ने ये भी संकेत दिया है कि इसमें उसकी न्यूक्लियर शील्ड शामिल नहीं होगी।
- पहले भी मुस्लिम देशों ने NATO जैसा गठबंधन बनाने की कोशिशें कीं, लेकिन कामयाब नहीं हुए। जैसे- 2015 में सऊदी अरब ने ‘इस्लामिक मिलिट्री काउंटर टेररिज्म कोलिशन’ (IMCTC) शुरू किया, जिसमें पाकिस्तान, तुर्किये जैसे 43 देश हैं।
- इसे ‘मुस्लिम NATO’ कहा जाता था, लेकिन इसमें NATO जैसी एकजुटता का कोई प्रावधान नहीं था। 2015 में OIC ने भी एक ‘जॉइंट काउंटर-टेरर फोर्स’ बनाने का प्रस्ताव रखा, लेकिन ये लागू नहीं हुआ।
विदेश मामलों के जानकार और JNU के प्रोफेसर डॉ. राजन कुमार कहते हैं, ‘मुस्लिम देश आपस में ही लड़ते रहते हैं। शिया बहुल ईरान और सऊदी अरब दुश्मन बने हुए हैं। तुर्किये के लोग भी ऐसा संगठन पसंद नहीं करेंगे। मिस्र, जॉर्डन और कतर, अमेरिका के बड़े सहयोगी हैं। जबकि इंडोनेशिया, मलेशिया जैसे देशों की राजनीति बाकी इस्लामिक देशों से बहुत अलग है। ऐसे में इन सभी का सैन्य गठबंधन बनना मुश्किल है।’
राजन के मुताबिक, सभी इस्लामिक देश चीन के करीब जाने की कोशिश करते हैं। इसलिए अमेरिका भी इनको एक साथ नहीं आने देगा। अमेरिका का मिडिल ईस्ट देशों पर बहुत प्रभाव है। अगर इस्लामिक देशों ने वाकई मेहनत की, तो भी एक औपचारिक सैन्य संगठन बनने में सालों लग जाएंगे।’
सवाल-4: क्या सऊदी-पाकिस्तान, तुर्किये का गठबंधन भारत के लिए चुनौती बनेगा? जवाब: हां, ये भारत के लिए 2 तरह से चिंता की बात है…
1. साउथ एशिया में भारत का कूटनीतिक प्रभाव कमजोर होगा
- साउथ एशिया में भारत सबसे बड़ी क्षेत्रीय ताकत है, लेकिन पाकिस्तान एक बड़ी चुनौती है। उसे अमेरिका का समर्थन हासिल है। ईरान जंग में मध्यस्थता से भी पाकिस्तान का प्रभाव बढ़ा है।
- थिंक टैंक अटलांटिक काउंसिल में सीनियर फेलो माइकल कुगेलमैन कहते हैं, ‘इस पैक्ट से पाकिस्तान-अमेरिका के रिश्ते बेहतर होंगे, क्योंकि ट्रम्प प्रशासन, ईरान के खिलाफ इन देशों के एकजुट होने का स्वागत करेगा।’
- वहीं तुर्किये यूरोप, मिडिल ईस्ट और साउथ एशिया तक अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। तुर्किये एशिया और यूरोप के बीच लैंड-ब्रिज का काम करता है। भूमध्य सागर के रास्ते ये अफ्रीका से भी सीधा जुड़ा है।
- स्ट्रैटेजिक एक्सपर्ट ब्रह्म चेलानी कहते हैं, ‘इस पैक्ट से अरब सागर और भूमध्य सागर के इलाके में रीजनल सिक्योरिटी का इन्फ्रास्ट्रक्चर बदल जाएगा। एग्रीमेंट में ‘इस्लामिक एकजुटता’ का जिक्र है। समझौते का वेन्यू मक्का है, यानी ये पैक्ट पैन-इस्लामिक कैरेक्टर का है।’
- अब तक भारत के ज्यादातर इस्लामिक देशों के साथ डिप्लोमेटिक और आर्थिक संबंध हैं। सऊदी अरब और UAE भारत के टॉप-5 ट्रेड पार्टनर्स में शामिल हैं। अब इन व्यापारिक रिश्तों पर भी असर पड़ सकता है।

पाकिस्तान से जंग हुई, तो मुश्किल बढ़ेगी
- मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान, तुर्किये ने पाकिस्तान को सैन्य मदद दी, खास तौर पर एडवांस्ड ड्रोन। तुर्किये ने पाकिस्तान के समर्थन में बयान भी दिए।
- ब्रह्म चेलानी के मुताबिक, ‘आगे भी कोई जंग होती है, तो भारत के लिए प्रतिरोध करना चुनौतीपूर्ण होगा। भारत पाकिस्तान में कोई सैन्य कार्रवाई करता है, तो पाकिस्तान, भारत के खिलाफ ये समझौता लागू कर सकता है।’
- इस समझौते के चलते पाकिस्तान से संघर्ष के दौरान भारत के लिए रणनीतिक फैसले लेना मुश्किल होगा।’
- सऊदी का पैसा, तुर्किये की डिफेंस पार्टनरशिप और पाकिस्तान की स्ट्रैटेजिक पोजिशन एक तिहरा इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करता है। इससे डिफेंस रिसर्च, खुफिया जानकारी शेयर करने में तेजी आएगी।
सवाल-5: भारत इसे कैसे काउंटर कर सकता है? जवाबः जानकार कहते हैं कि भारत 2 तरह की तैयारी कर सकता है…
1. सऊदी, तुर्किये जैसे देशों से रिश्ते बेहतर करना
- भारत के पूर्व राजदूत अनिल त्रिगुनायत कहते हैं, ‘भारत को दूसरे देशों के साथ आउटरीच पर जोर देना होगा। सऊदी से हमारे रिश्ते पहले ही बहुत अच्छे हैं और तुर्की भले ही पाकिस्तान का साथ देता रहा है, लेकिन हम भी तुर्की के साथ अच्छे रिश्ते बना सकते हैं।’
- भारत इजराइल के साथ सहयोग बढ़ा रहा है। साथ ही ग्रीस और साइप्रस के साथ रक्षा साझेदारी और आपसी संबंध बढ़ा रहा है। इन देशों से तुर्किये का पुराना विवाद है।
- डॉ. राजन कुमार कहते हैं, ‘OIC देशों से भारत के अच्छे संबंध रहे, लेकिन कई मुद्दों पर भारत सहमत नहीं है। मसलन- OIC बैठक में कश्मीर मुद्दा उठाया गया था। भारत चाहेगा कि उसके करीबी इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे OIC देश, किसी पैक्ट के तहत पाकिस्तान के साथ न जाएं।’
2. अहम समुद्री रूट्स पर नेवी को मजबूत करना
- ब्रह्म चेलानी कहते हैं, ‘ये तीनों देश अहम समुद्री रूट्स पर हैं। इसलिए भारत को अब हिंद महासागर में अपनी नेवी बढ़ाने पर काम करना होगा।’
- बॉस्फोरस और डार्डेनेल्स दो स्ट्रेट हैं, इन्हें तुर्किये स्ट्रेट कहते हैं। ये काला सागर से भूमध्य सागर जाने का इकलौता रास्ता है। तुर्किये का इन पर कंट्रोल है।
- लाल सागर के किनारे बसा सऊदी अरब बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट के नजदीक है। इस स्ट्रेट के रास्ते से दुनिया का करीब 10% समुद्री व्यापार है। सऊदी का एक तट पर्शियन गल्फ में भी है।
- वहीं अरब सागर से पाकिस्तान की करीब एक हजार किमी लंबी कोस्टलाइन मिलती है। ग्वादर और कराची पोर्ट पाकिस्तान के अहम समुद्री ट्रेड स्पॉट हैं।


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