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नर्मदा के तट पर जन्म, सरयू में विलीन हुए युगतुलसी:रामायण पर आधारित अपार संपदा छोड़ गए,रामायणम आश्रम ने 100 ग्रंथों प्रकाशित किए




श्रीरामचरित मानस की विशिष्ट व्याख्याता पंडित रामकिंकर उपाध्याय को उनके इस विशिष्ट योगदान के लिए युगतुलसी का नाम मिला।इसी योगदान के लिए उनको सन् 1999 में पद्म भूषण सम्मान मिला। 9 अगस्त को उनकी 24 वीं युण्यतिथि है। उनकी समाधि स्थली रामायणम आश्रम पर यह समारोह उनकी कृपामूर्ति के अभिषेक,पूजन-अर्चन के साथ आरती और स्तुतियों से होगा।युगतुलसी का निर्वाण दिवस प्रकाश उत्सव के रूप में मनाया जाएगा।उनके चित्र को झूलन पर विराजमान कर पदों का गायन और गोष्ठी का भी आयोजन किया गया है। युगतुलसी की अध्यात्मिक उत्तराधिकारी व श्रीरामकथा की अन्तर्राष्ट्रीय प्रवक्ता मंदाकिनी रामकिंकर के अनुसार भरत चरित,कैकेई निंदनीया या वंदनीया,मानस के रोग आदि सौ से ज्यादा ग्रंथों का प्रकाशन रामायणम आश्रक की ओर से हो चुका है।महाराज श्री साहित्य पर अभी 100 से ज्यादा ग्रंथों के प्रकाशन की दिशा में आश्रम सक्रिय है। उन्होंने बताया कि युगतुलसी के मानस से जुड़े विशेष योगदान पर देश के कई विश्व विद्यालय सहित अनेक देशों से शोध हो रहे हैं। उन्होंने मानस के गूढ़ रहस्यों का बड़े ही सरल ढ़ग से उजागर कर रामभक्तों पर बहुत बड़ा उपकार किया है।इसके लिए उनको युगों तक याद किया जाएगा। वंशावली नींव और प्रारंभिक जागृति: युगतुलसी पंडित रामकिंकर महाराज का जन्म 1 नवंबर 1924 को जबलपुर (मध्य प्रदेश की संस्कारधानी) शहर में हुआ था। उनके जन्म की शहरी पृष्ठभूमि के बावजूद, उनकी पारिवारिक पहचान उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में भटौली पुल के पास स्थित बरैनी गाँव में गहराई से निहित थी। यह भौगोलिक तालमेल जबलपुर की आधुनिकता और मिर्जापुर की परंपरावादी विरासत, बाद में शहरी बुद्धिजीवी और ग्रामीण भक्त दोनों को समान प्रभावकारिता के साथ संबोधित करने की उनकी क्षमता में परिलक्षित हुआ। किशोरावस्था और प्रज्ञा का जागरण: वर्ष 1942 में 18 वर्ष की उभरती उम्र में (जब स्वतंत्रता संग्राम चल रहा था) उनके जीवन में एक निर्णायक बदलाव आया। उन्होंने अपना पूरा जीवन संत तुलसीदास के कार्यों की खोज और व्याख्या के लिए समर्पित करने का संकल्प लिया। दैवीय योजना से, उन्हें वृंदावन जाने का अवसर मिला, जहाँ उन्हें संतों की मंडली को संबोधित करने का सौभाग्य मिला, जिनमें अवधूत संत श्री उढ़िया बाबा और हरि बाबा जी, कोकिल साईं, अखंडानंदी महाराज जैसे सर्वोच्च, ज्ञानी प्रबुद्ध लोग थे, (जो लगभग ग्यारह महीने) तक चलता रहा। प्रवचन के लिए तैयारी नहीं की, बल्कि एक ‘आंतरिक स्थिति’ में प्रवेश का प्रयास उन्होंने विशेष रूप से कहा था कि “हमने कभी भी प्रवचन के लिए तैयारी नहीं की, बल्कि एक ‘आंतरिक स्थिति’ में प्रवेश करने का प्रयास किया”, जहाँ उनका मानना था कि श्री हनुमान जी महाराज उनके माध्यम से आवश्यक संदेश प्रकट करते हैं। इस पद्धति ने उन्हें उच्च स्तर की सहजता की अनुमति दी और ऐसी व्याख्याओं को जन्म दिया जो प्रायः पारंपरिक रूढ़िवादिता को चुनौती देती थीं। स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति और विश्व विख्यात व्यक्तित्व डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने पंडित रामकिंकरजी को राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में प्रवचन देने के लिए आमंत्रित किया। यह न केवल राम कथा की प्रचलित परंपरा का सम्मान था, बल्कि उस विलक्षण युवा वक्ता के प्रति आदर की अभिव्यक्ति थी, जो उस समय अपने जीवन के दूसरे दशक की आयु के उत्तरार्ध में थे। बीसवीं सदी में भारतीय कला और धर्म के संरक्षण में तत्कालीन रियासतों से उभरते औद्योगिक वर्गों की ओर बदलाव देखा गया। पूज्य रामकिंकर जी की प्रगति इस परिवर्तन का प्रमुख उदाहरण था। उनकी प्रसिद्धि भारत के सबसे शक्तिशाली औद्योगिक राजवंशों में से एक, बिड़ला परिवार के साथ लंबे समय से चले आ रहे संबंधों से बढ़ी।
हाल ही में उत्तर प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने पंडित रामकिंकर के 100वें जन्म शताब्दी समारोह के दौरान इस बात पर बल दिया कि पूज्य रामकिंकरजी की कथाओं ने “जागृति” का कार्य किया। राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान जनता उनके उद्बोधन से प्रभावित होकर सक्रिय हो गयी। प्रवचन श्रृंखला केवट-प्रसंग को समर्पित करते थे रामकिंकर उपाध्याय ने समतावादी और भक्ति-केंद्रित पहलुओं पर अपना ध्यान केंद्रित किया। प्रायः पूरी प्रवचन श्रृंखला केवट-प्रसंग को समर्पित करते थे — वह प्रसंग जहाँ राम एक ‘अछूत’ नाविक की भक्ति स्वीकार करते हैं — जिससे रामायण की एक दृष्टि उजागर होती है जो एक आधुनिक, लोकतांत्रिक समाज के लिए अधिक समावेशी और प्रासंगिक थी।
पंडित रामकिंकर की विरासत अंततः रामचरितमानस के गहन दर्शन को लोकतांत्रिक बनाने के तरीके में पाई जाती है। उन्होंने सिद्ध किया कि सोलहवीं सदी का एक पाठ बीसवीं सदी की मनोवैज्ञानिक और सामाजिक दुविधाओं का समाधान प्रदान कर सकता है। उन्होंने कथाकार को मात्र मनोरंजनकर्ता से एक दार्शनिक में बदल दिया। आध्यात्मिक उत्तराधिकारी दीदी मंदाकिनी श्रीरामकिंकर मंदाकिनी रामकिंकर (दीदी माँ) युगतुलसी पंडित रामकिंकर उपाध्याय की नामित आध्यात्मिक उत्तराधिकारी हैं, जो युग तुलसी की बौद्धिक और भक्तिपूर्ण विरासत को आगे बढ़ाती हैं। प्यार से “दीदी माँ” के नाम से जानी जाने वाली वह पंडित रामकिंकर की आधिकारिक उत्तराधिकारी (उत्तराधिकारी) हैं और उन्हें उनकी मानस-पुत्री (आध्यात्मिक पुत्री) के रूप में वर्णित किया गया है। वह रामकिंकर आध्यात्मिक मिशन का नेतृत्व करती हैं, जिसका मुख्यालय अयोध्या में रामायण आश्रम में है। दीदी माँ ने पूज्य रामकिंकरजी के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन में कई दशक बिताए, न केवल रामचरितमानस की कथा को बल्कि इसके प्रति उनके अद्वितीय, विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण को भी आत्मसात किया। पंडित जी ने सार्वजनिक रूप से उन्हें अपने आध्यात्मिक उत्तराधिकारी (उत्तराधिकारी) के रूप में चयनित किया और इस उत्तराधिकार को प्रतिबिंबित करने के लिए उनका नाम औपचारिक रूप से बदल कर मंदाकिनी श्रीरामकिंकर कर दिया। वह रामचरितमानस की एक अत्यधिक सम्मानित कथावाचक हैं, जो अपने गुरु द्वारा विकसित अद्वितीय “मानस-कथा” शैली को जारी रखती हैं। वह कानपुर, रायपुर, इंदौर, भोपाल, मुंबई, लखनऊ, भिलाई और कोलकाता आदि और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, दक्षिण पूर्व एशिया जैसे देशों में नियमित रूप से शास्त्रोक्त कथावाचन कार्यक्रम (प्रवचन) करती हैं।



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