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लुटियंस की नई दिल्ली में यॉर्क रोड के बंगला नंबर 17 पर भीड़ जुट रही थी। यह जवाहरलाल नेहरू का आवास था, जो कुछ ही घंटों में आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बनने वाले थे।

संन्यासियों ने उन्हें पीतांबर पहनाया, माथे पर राख-तिलक लगाया। माथे की राख पोंछते ही नेहरू रात के भाषण की तैयारी में जुट गए। तभी फोन की घंटी बजी।

लाहौर से एक ट्रंक कॉल थी। बात खत्म होते ही नेहरू का चेहरा उतर गया। मुंह से एक शब्द नहीं निकला। रिसीवर रखते ही उन्होंने दोनों हाथ चेहरे पर रख लिए। हाथ हटे तो आंखों में आंसू थे।

चर्चित किताब ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ में लैरी कॉलिन्स और डोमिनिक लैपियर लिखते हैं कि उस वक्त नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी पास ही थीं। पूछने पर नेहरू ने बताया- लाहौर में हिंदू-सिख इलाकों की पानी सप्लाई काट दी है, बच्चे प्यास से तड़प रहे हैं, पानी लेने जो निकल रहा है, उसे मार दिया जा रहा है, शहर जल रहा है।

रुंधे गले से नेहरू बोले- मैं अब देश को कैसे संबोधित करूंगा? मेरे दिल का टुकड़ा लाहौर जल रहा है।

इंदिरा ने पिता को दिलासा दिया। नेहरू ने खुद को संभाला और ठीक रात 11:55 बजे संसद के सेंट्रल हॉल पहुंच गए। सूती बंडी के काज में गुलाब खोंसे नेहरू ने ऐतिहासिक भाषण दिया- Tryst with Destiny

जैसे ही घड़ी की सुई 12 पर पहुंची, शंखनाद गूंजा। हजारों की भीड़ ने संसद भवन घेर रखा था, मूसलाधार बारिश हो रही थी और उसी बारिश में गूंज उठे नारे- ‘महात्मा गांधी की जय।’

लेकिन जिस शख्स के नाम की जय-जयकार दिल्ली में गूंज रही थी, वह उस वक्त दिल्ली से सैकड़ों किलोमीटर दूर, कलकत्ता के बदबूदार मोहल्ले की एक जर्जर इमारत के अंधेरे बंद कमरे में सोया हुआ था।

महात्मा गांधी कलकत्ता में मुस्लिमों के कद्दावर नेता सुहरावर्दी के साथ बैठे हैं। तस्वीर अगस्त 1947 की है।

महात्मा गांधी कलकत्ता में मुस्लिमों के कद्दावर नेता सुहरावर्दी के साथ बैठे हैं। तस्वीर अगस्त 1947 की है।

भारत की आजादी से 33 घंटे पहले, यानी 13 अगस्त 1947 की दोपहर करीब 3 बजे।

कलकत्ता की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती की तंग गलियों में एक पुरानी खस्ता हाल शेवरले कार धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। अंदर बैठे थे 77 साल के मोहनदास करमचंद गांधी। 4 लाख से ज्यादा लोगों की इस बस्ती में गंदगी और बदबू का कोई हिसाब नहीं था।

कार जैसे ही मुहल्ले में पहुंची, गुस्साई भीड़ ने पत्थर और बोतलें बरसानी शुरू कर दीं। भीड़ में सिर्फ हिंदू थे। कार का दरवाजा खुला। गांधी उतरे, एक हाथ से शाल संभाले, दूसरा हाथ शांति की मुद्रा में उठाए।

भीड़ से कोई चिल्लाकर बोला- ‘एक साल पहले नोआखाली में मुसलमानों ने कत्ल-ए-आम किया, बहू-बेटियों का बलात्कार किया, तब आप कहां थे?’

गांधी सीधे भीड़ के बीच चले गए। बोले, ‘आप मुझे मारना चाहते हैं? ठीक है, मैं सामने हूं। मारिए।’

गांधी ने आगे कहा- नोआखाली में अब एक भी हिंदू नहीं मारा जाएगा, इसका वचन खुद मुस्लिम लीग नेता हुसैन शहीद सुहरावर्दी ने दिया है। अगर फिर भी किसी हिंदू की जान गई, तो वे अपनी जान दे देंगे। भीड़ पल भर में शांत पड़ गई।

गांधी उसी मोहल्ले के एक जर्जर मकान ‘हैदरी मंजिल’ में ठहर गए। कभी किसी अमीर मुसलमान का घर, अब चूहों-कॉकरोचों का बसेरा था, जिसे उनके आने से पहले साफ करवाया गया था। यहीं से गांधी कलकत्ता के मुसलमानों और नोआखाली के हिंदुओं, दोनों को बचाने की कोशिश में जुट गए।

अगले दिन, यानी 14 अगस्त की प्रार्थना सभा में करीब 10 हजार लोग जुटे। गांधी ने कहा, ‘कल हम आजाद हो जाएंगे, लेकिन आज आधी रात को देश के टुकड़े भी होंगे। कल खुशी का दिन होगा, उतना ही दुख का भी। यह आजादी हमें एक बड़ी जिम्मेदारी सौंप रही है। अपना विवेक और भाईचारा मत छोड़िए। कलकत्ता में अगर यह बच गया, तो समझिए पूरे देश में बच गया।’

रात 12 बजे, जब नेहरू भारत की आजादी का ऐतिहासिक भाषण दे रहे थे, हैदरी मंजिल में न बल्ब जला, न लालटेन, न मोमबत्ती। सिर्फ अंधेरा और सन्नाटा। गांधी उस दिन थोड़ा जल्दी सोने चले गए थे।

15 अगस्त को गांधी की प्रार्थना सभा में 30 हजार से ज्यादा लोग पहुंचे। गांधी ने पूरा दिन उपवास, गीतापाठ और चरखे में बिताया। न झंडा फहराया, न कोई राजनीतिक भाषण दिया। सूचना-प्रसारण विभाग ने आजादी पर संदेश मांगा, तो उन्होंने साफ इनकार करते हुए कहा- ‘मेरे पास देश के लिए कोई संदेश नहीं है। मेरा दिल सूख चुका है।’

उस रोज गांधीजी की प्रार्थना सभा में कलकत्ता के मुसलमानों के नेता सुरहावर्दी ने कहा, ‘अब मैं बोलूंगा, ‘जयहिन्द’! मेरे बाद आप लोग भी बोलेंगे!’ जवाब में 30 हजार लोगों के गले से फूट पड़ा- जय हिंद।

पूरा देश साम्प्रदायिक दंगों की आग में झुलस रहा था, सिवाए कलकत्ता के। प्रार्थना-सभा के बाद गांधी जी उसी पुरानी शेवरले गाड़ी में शहर के दौरे पर निकले। इस बार कलकत्ता की भीड़ ने महात्मा की कार का स्वागत पत्थरों और बोतलों से नहीं, गुलाब-जल से किया। आंखों में आभार के आंसू भरकर वह शहर मानो कह रहा हो- ‘गांधी जी! आपने हमें बचा लिया।’

14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान की आजादी के जश्न में शामिल मोहम्मद अली जिन्ना। साथ में लॉर्ड और लेडी माउंटबेटन भी हैं।

14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान की आजादी के जश्न में शामिल मोहम्मद अली जिन्ना। साथ में लॉर्ड और लेडी माउंटबेटन भी हैं।

कलकत्ता में गांधी अपनी जान की बाजी लगाकर हिंदू-मुसलमानों को एक-दूसरे का गला काटने से रोकने में जुटे थे, उधर करांची में मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान बनने के जश्न की तैयारी कर रहे थे। उस रोज जिन्ना के तमाम कार्यक्रमों में से एक था- खुली गाड़ी में करांची की सड़कों पर अभिवादन परेड निकालना।

‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ में लैरी कॉलिन्स और डोमिनिक लैपियर लिखते हैं- परेड से कुछ घंटे पहले सी.आई.डी. ने वायसराय माउंटबेटन को खबर दी थी कि आर.एस.एस. के कुछ लोग जिन्ना की खुली गाड़ी पर बम गिराने की साजिश रच रहे हैं और साजिशकर्ताओं की पहचान अब तक नहीं हो पाई।

माउंटबेटन ने जिन्ना से बंद गाड़ी में यात्रा की गुजारिश की। जिन्ना ने साफ इनकार कर दिया। जिस मुल्क के लिए उन्होंने जिंदगी खपाई, उसके पहले ही कार्यक्रम में कायद-ए-आजम मुंह छिपाकर निकलें, यह मुमकिन नहीं था।

भारत की आजादी से एक दिन पहले, यानी 14 अगस्त की सुबह करांची असेंबली हॉल में पाकिस्तान बनने का जश्न शुरू हुआ। तमगों से सजे माउंटबेटन जिन्ना के बगल में बैठे। ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ के मुताबिक, दोनों नेता अपना भाषण खत्म कर उस काली खुली रोल्स-रॉयस की तरफ बढ़े, जो माउंटबेटन को पहले ही किसी शव-गाड़ी जैसी लगने लगी थी।

कार स्टार्ट हुई, तोपों की सलामी गूंजी और तीन मील लंबी सड़क पर इंसानों का समंदर उमड़ पड़ा। भीड़ लगातार ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’, ‘कायद-ए-आजम जिंदाबाद’ के नारे लगा रही थी।

एल्फिंस्टन स्ट्रीट पहुंचते ही अचानक नारे थम गए। एक डरावनी खामोशी फैल गई। यहां ज्यादातर दुकानें हिंदुओं की थीं। माउंटबेटन ने मन ही मन खुद को मौत के लिए तैयार कर लिया। लेकिन कुछ नहीं हुआ। गाड़ी सुरक्षित गवर्नमेंट हाउस पहुंच गई।

पूरी यात्रा के दौरान तनाव से बेरंग रहा जिन्ना का चेहरा, कार रुकते ही पहली बार खिल उठा। उन्होंने अपने कमजोर हाथों से माउंटबेटन के घुटने थाम लिए और कहा, ‘खुदा का शुक्र है, मैं आपको जिंदा बचाकर ले आया!’ माउंटबेटन ने जवाब दिया, ‘माई गॉड। कौन किसे बचाकर लाया है। आप मुझे या मैं आपको?’

‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ के मुताबिक, बाद में जांच में पता चला कि आर.एस.एस. के लोग सच में करांची पहुंच चुके थे। हालांकि जिस नेता को बम फेंकने का इशारा देना था, ठीक उसी पल उसकी हिम्मत जवाब दे गई।

14 अगस्त की वह डरावनी कार-यात्रा सुरक्षित निपट गई। 15 अगस्त को जिन्ना ने सारे राजकीय अधिकार अपने हाथ में ले लिए। हमेशा लोकतंत्र की दुहाई देने वाला नेता, नए राष्ट्र की कमान संभालते ही लगभग एक तानाशाह की हैसियत में आ गया।

15 अगस्त को ही रमजान का आखिरी जुमा पड़ रहा था। पूरे पाकिस्तान में जोश दोगुना हो गया। हर गली, हर नुक्कड़, हर दुकान की खिड़की पर जिन्ना की तस्वीर टंगी थी। आजादी का दिन कायद-ए-आजम का निजी उत्सव जैसा बन गया।

‘पाकिस्तान टाइम्स’ अखबार ने तो यहां तक लिख डाला कि लाहौर के चिड़ियाघर के जानवर भी अपने रखवालों के जरिए जिन्ना को मुबारकबाद भेज रहे हैं और ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारों में मशगूल हैं।

इस जश्न में जिन्ना की इकलौती संतान दीना मौजूद नहीं थी। वो करांची से सैकड़ों किमी दूर बंबई के कोलाबा इलाके के एक फ्लैट में पशोपेश में थी। उन्होंने अपनी बालकनी से भारत-पाकिस्तान दोनों के झंडे लटका रखे थे।

वह तय नहीं कर पा रही थी कि किस मुल्क को अपना कहे? उस भारत को, जहां उसका जन्म हुआ था या उस पाकिस्तान को, जिसे उसके पिता ने गढ़ा था? बालकनी पर लटके वे दो झंडे उसी अनसुलझे सवाल की तस्वीर थे।

आजादी मिलने में अब गिनती के घंटे बचे थे और सरदार पटेल रियासतों को भारत में जोड़ने का काम अनवरत करते जा रहे थे।

13 अगस्त, सुबह साढ़े आठ बजे। गृह सचिव वी.पी. मेनन पटेल के पास एक बुरी खबर लेकर पहुंचे। 97% से ज्यादा बौद्ध और गैर-मुस्लिम आबादी वाला चटगांव हिल पाकिस्तान के हिस्से में जा रहा है। उसी दिन चटगांव से दो लोग पटेल से मिलने आए।

बेटी मणिबेन पटेल की डायरी ‘इनसाइड स्टोरी ऑफ सरदार पटेल’ में लिखा है, ‘बापू (पटेल) सुनकर हैरान रह गए। दोपहर 12 बजे मेनन दोबारा आए, तो उन्होंने वायसराय को चिट्ठी लिखवाई।’

14 अगस्त की सुबह साढ़े पांच बजे से ही कतार लग गई- कच्छ के दीवान, एक और दीवान, फिर एक और मुलाकाती। दिन भर मेनन, मोरारजी देसाई, जवाहरलाल आते-जाते रहे। दोपहर पौने तीन बजे धौलपुर, नाभा और झावर के शासकों ने अपने हस्ताक्षरित विलय-पत्र (इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन) पटेल को सौंपे।

शाम साढ़े सात बजे मेनन ने बताया कि पाकिस्तान के लियाकत अली खान परसों मिलने आएंगे और भोपाल के नवाब भी जल्द अपने हस्ताक्षर भेज देंगे।

रात दस बजे पटेल राजेंद्र बाबू के घर गए, जहां लॉन पर कोई धार्मिक अनुष्ठान चल रहा था। महिलाओं की भीड़ से पूरा लॉन भरा हुआ था। गाड़ियों से सड़क जाम थी।

15 अगस्त की सुबह आठ बजे पटेल वायसराय भवन गए, जहां मंत्रियों और गवर्नर-जनरल की शपथ का नजारा देखा। पौने दस बजे सीधे असेंबली पहुंचे, जहां लॉर्ड और लेडी माउंटबेटन की मौजूदगी में सत्र शुरू हुआ। ग्यारह बजे सत्र खत्म, फिर अनौपचारिक कैबिनेट मीटिंग।

शाम में इंडिया गेट पर ऐतिहासिक झंडा-रोहण हुआ, लेकिन उसी जश्न के बीच लाहौर में गड़बड़ी को लेकर दो बार फोन आया।

16 अगस्त को पटेल लाल किले पर जवाहरलाल के हाथों होने वाले झंडा-रोहण में शामिल हुए। सुबह साढ़े दस बजे डिफेंस काउंसिल की बैठक के लिए गए, लेकिन लियाकत अली खान का विमान न पहुंचने से बैठक आधे घंटे में ही खत्म हो गई।

इसके बाद श्यामा प्रसाद, जवाहरलाल, राजेंद्र बाबू, बलदेव सिंह और कुछ अफसरों के साथ एक लंबी चर्चा शुरू हुई, जो शाम पांच बजे तक चली। विषय था- बंटवारे की रैडक्लिफ लाइन। आजादी के ठीक एक दिन बाद भी, देश की सरहदें अभी कागज पर तय हो रही थीं।

यानी जहां बाकी नेता भाषण दे रहे थे, झंडे फहरा रहे थे, आंसू बहा रहे थे, पटेल फाइलों, दस्तखतों और नक्शों के बीच वह अनदेखा काम कर रहे थे, जिसके बिना आजाद भारत का नक्शा ही पूरा नहीं होता।

नई दिल्ली, 15 अगस्त 1947 की शाम पांच बजे।

अंग्रेजों ने विश्व युद्ध में मारे गए 10 हजार भारतीय सैनिकों की याद में इंडिया गेट बनवाया था। यहीं नेहरू शासकीय तौर पर पहली बार आजाद भारत का तिरंगा फहराने वाले थे।

माउंटबेटन के सलाहकारों ने अंदाजा लगाया था कि करीब 30 हजार लोग आएंगे। रस्सियों की गैलरी, रास्ते समेत पूरा इंतजाम उसी हिसाब से हुआ था। अंदाजा गलत निकला। दो-चार हजार से नहीं, बल्कि पूरे पांच लाख के फासले से।

दिल्ली ने ऐसा मानव-सागर पहले कभी नहीं देखा था। जो रस्सियां-गैलरियां 30 हजार को संभालने के लिए बनी थीं, वे उस भीड़ में कहीं खो गईं। कुर्सियां सूखी टहनियों की तरह टूट रही थीं। कई देहाती लोग, जो घर से खाना बांधकर लाए थे, भूखे ही रह गए। भीड़ में इतने भिंचे हुए थे कि पोटली खोलने के लिए हाथ तक नहीं हिला पा रहे थे।

माउंटबेटन की 17 साल की बेटी पामेला अपने पिता के स्टाफ के साथ वक्त पर पहुंच गई थीं, लेकिन मंच से जब सिर्फ सौ गज दूर रह गईं, तो आगे बढ़ना नामुमकिन हो गया। इतनी घनी भीड़ कि सुई रखने की जगह नहीं थी।

मंच पर खड़े नेहरू ने उनकी परेशानी भांप ली। ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ किताब के मुताबिक नेहरू चिल्लाकर बोले- लोगों के ऊपर से चलती हुई आ जाओ।

पामेला ने कहा, ‘लेकिन मैं ऊंची एड़ी की जूतियां पहने हूं।’

नेहरू बोले, ‘उतार दो।’

पामेला जैसी बड़े घराने की लड़की के लिए इतने बड़े मौके पर नंगे पांव चलना उचित नहीं लगा। उसने मना किया। नेहरू ने फिर कहा- तो पहने ही रहो, लोगों के ऊपर चढ़ो, आगे बढ़ो, किसी को बुरा नहीं लगेगा।

पामेला ने आखिरकार जूतियां हाथ में उठा लीं और इंसानों के उस जिंदा कालीन पर चलना शुरू किया। भीड़ को यह तमाशा भा गया। वे हंसते-हंसते उसे आगे बढ़ाने में मदद करने लगे।

जैसे ही माउंटबेटन की बग्घी के आगे चलते अंगरक्षकों की चमकीली पगड़ियां दूर से दिखीं, भीड़ किसी उफनती लहर की तरह आगे बढ़ने लगी।

बग्घी में बैठे माउंटबेटन को समझते देर न लगी कि जैसा भव्य कार्यक्रम सोचा गया था, वैसा अब मुमकिन नहीं। बैंड भीड़ में फंस चुका था, गार्ड्स हिल भी नहीं सकते थे। खुद माउंटबेटन अपनी बग्घी से उतर पाने की हालत में नहीं थे। उन्होंने नेहरू से चिल्लाकर कहा- झंडा बस फहरा दीजिए, बाकी सब यहीं रोक देते हैं।

केसरिया, सफेद और हरे रंग का वह झंडा धीरे-धीरे डंडे पर चढ़ने लगा। रानी विक्टोरिया के परपोते माउंटबेटन ने अपनी बग्घी में ही खड़े होकर उसे सलामी दी। झंडा जैसे ही पूरी तरह लहराया, पांच लाख से ज्यादा लोगों के गले से हर्षध्वनि निकली।

ठीक उसी वक्त आसमान में एक इंद्रधनुष खिल उठा। शगुन-असगुन में यकीन रखने वाली उस भीड़ के लिए यह किसी ईश्वरीय संकेत से कम नहीं था। लोग एक-दूसरे से कहने लगे- ‘यह इंद्रधनुष भगवान ने भेजा है। अब देखते हैं, कौन हमारे सामने टिकता है।’

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