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पेपर लीक इस समय देश में कितना बड़ा मुद्दा है सब जानते हैं। अब तक ज्यादातर जेनज़ी जो पॉलिटिक्स में कोई दिलचस्पी नहीं ले रहे थे, उन्हें उन्हीं पॉलिटिशियंस से सवाल पूछने थे कि क्यों उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ किया गया। क्यों देश में ईमानदारी से वह पेपर भी नहीं हो सकते, जिनके लिए इतना मुश्किल एंट्रेंस एग्जाम होता है। जिसके लिए माता-पिता लाखों का लोन लेकर बच्चों को पढ़ाते हैं और फिर वही एक दिन लीक हो जाता है। उसी के साथ बह जाते हैं सभी अरमान भी और पानी ठहर जाता है आंखों में। उसी तस्वीर को डॉ. शॉर्ट फिल्म से दिखाया आरंभ थिएटर ग्रुप ने। यह बताया निर्देशक सोहेल घावरी ने। 6.30 मिनट की इस फिल्म की कास्ट में नूर है, सिनेमाटोग्राफर प्रभात यादव है और प्रोडक्शन टीम में भगवान सिंह, सोनू बरोका, गौरव गिरी, रवि यादव हैं। कहानी में दिखाया कैसे एक लड़की नीट परीक्षा के लिए तैयारी कर रही होती है कि तभी वह अपने लैपटॉप पर पेपर लीक होने की खबरें देखती हैं। आंखों में डर होता है और अनिश्चित समय के लिए एक सवाल जिसका कोई जवाब नहीं मिलता। फिर एक उम्मीद लेकर वह अपना बैग खोलती है और अपना मेडिकल व्हाइट कोट पहनती है। खुद को शीशे में देखती है और फिर आत्महत्या कर लेती है। एक तरफ सुसाइड नोट पड़ा रह जाता है। फोन वाइब्रेट कर रहा होता है और डॉक्टर बनने के अरमान कहीं गुम हो जाते हैं…। बन गया ऐतिहासिक वृत्तांत डायरेक्टर सोहेल घावरी ने बताया- इसके साथ दिल्ली में हुए जेनज़ी प्रोटेस्ट की झलक दिखाई जाती है किस तरह युवा उन बच्चों की मौत का हिसाब लेने के लिए खड़े होते हैं। शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांगते हैं। 36 दिनों के बाद इस्तीफा मिलता है। मगर, यह आज़ादी मिलने के जैसे ही मुश्किल था क्योंकि बच्चों को बुरी तरह पीटा गया और फिर भी उनमें इंकलाब का जोश कम नहीं हुआ। यह एक तरह का हिस्टोरिकल क्रोनिकल भी है जो आने वाली पीढ़ियों को याद रहेगा कि कैसे आज़ादी के 79 साल बाद युवा एक साथ आए और उन्होंने बेहतर भारत, शिक्षा व्यवस्था की मांग की और सरकार को भी मानना पड़ा। यह उन बच्चों के नाम श्रद्धांजलि भी है, जिन्होंने पेपर लीक के कारण अपनी जान दे दी।
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आज़ादी के 79 साल बाद जब युवाओं ने फिर चुना इंकलाब
