Headlines

खनिज कानून में संशोधन आदिवासियों के अधिकारों पर हमला : विक्सल कोंगाड़ी



कोलेबिरा विधायक नमन विक्सल कोनगाड़ी ने रविवार को प्रेस कांफ्रेंस कर केंद्र सरकार पर खनिज कानून में संशोधन के बहाने राज्यों के अधिकारों,आदिवासी हितों और संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार की नीतियां गैर-भाजपा शासित राज्यों को कमजोर करने और उनके अधिकारों में हस्तक्षेप करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। विधायक ने कहा कि देश के प्राकृतिक संसाधनों पर पहला अधिकार उन स्थानीय समुदायों का होना चाहिए,जो पीढ़ियों से जल,जंगल और जमीन का संरक्षण करते आए हैं। खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम में किए जा रहे बदलावों से राज्यों की आर्थिक स्वायत्तता प्रभावित होने की आशंका है। खनन क्षेत्रों से प्राप्त राजस्व का उपयोग स्थानीय विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, रोजगार और विस्थापित परिवारों के पुनर्वास में होना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार की नीतियां प्राकृतिक संसाधनों को कुछ चुनिंदा बड़े पूंजीपतियों के हित में सौंपने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। उन्होंने कहा कि झारखंड जैसे खनिज संपदा से समृद्ध राज्य को उसकी प्राकृतिक संपदा का उचित लाभ मिलना चाहिए, लेकिन राज्य के हितों की लगातार अनदेखी की जा रही है। पेसा, वनाधिकार और पांचवीं अनुसूची का हवाला विक्सल कोनगाड़ी ने कहा कि अनुसूचित क्षेत्रों में पेसा कानून, 1996, वनाधिकार कानून, 2006 और संविधान की पांचवीं अनुसूची आदिवासी समुदायों के अधिकारों तथा ग्रामसभा की भूमिका की रक्षा करते हैं। ऐसे में खनिज और वन संसाधनों से जुड़े निर्णयों में स्थानीय समुदायों की सहमति और भागीदारी को दरकिनार करना लोकतांत्रिक और संघीय व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि विकास के नाम पर जंगल, पहाड़, नदी-नालों और खनिज संपदा का अंधाधुंध दोहन स्वीकार नहीं किया जा सकता। केंद्र सरकार को आदिवासी अधिकारों, पर्यावरण संरक्षण, ग्रामसभा की शक्ति और राज्यों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। विधायक ने कहा कि जल, जंगल, जमीन और खनिज केवल प्राकृतिक संपदा नहीं हैं, बल्कि आदिवासी समाज की पहचान,संस्कृति और जीवन का आधार हैं।



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *