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कई बार हम अपने दिल का बोझ हल्का करने के लिए दोस्तों या परिजन से बात करते हैं, लेकिन कभी-कभी यही बातचीत सामने वाले के लिए मानसिक बोझ बन जाती है। मनोचिकित्सकों के अनुसार, जब आप बिना सहमति, बिना समय देखे और बिना हद का ध्यान रखे अपनी भारी भावनाएं या दुख-दर्द दूसरे से साझा करते हैं। इसे ‘ट्रॉमा डंपिंग’ कहते हैं। आजकल यह शब्द तेजी से चलन में है। लॉस एंजेलिस की एंग्जाइटी व ट्रामा थेरेपिस्ट चेरिल ग्रॉसकॉफ बताती हैं कि इसे लोग सामाजिक गलती मानने लगे हैं। इसलिए कई लोग अपना दुख-दर्द या आघात की बात करने से डरते हैं, जबकि ऐसे मुश्किल हालात से निपटने में दोस्तों, रिश्तेदारों का समर्थन जरूरी होता है। यह वेंटिंग है। इसका मकसद मन में दबी हुई परेशानी या गुस्से को बाहर निकालकर राहत पाना होता है, इसलिए इसे ‘मन का गुबार या भड़ास निकालना’ या ‘मन हल्का करना’ भी कहते हैं। थेरेपिस्ट स्टेफनी महालेक कहती हैं, ‘आघात, शोक या तनाव के बारे में भरोसेमंद लोगों से बात करना सामाजिक सहारा और रिकवरी में मदद कर सकता है। समस्या दर्द बताने में नहीं, बल्कि बातचीत के तरीके में है।’ मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, इससे रिश्तों में दूरी भी बढ़ सकती है। ट्रॉमा डंपिंग को 3 संकेतों से पहचानें 1. सुनने वाले के लिए सीमा तय नहीं – अगर आपने कभी नहीं पूछा कि क्या तुम इस वक्त सुन सकते हो? और जब वे थकान जताते हैं तो आप नाराज हो जाते हैं। 2. एक ही जवाब – अगर आपको बार-बार वही कहानी सुनानी पड़ती है, क्योंकि सुनने वाले ने ‘सही’ शब्द नहीं कहे या आप उन्हें अपनी स्थिति को सुधारने की उम्मीद करते हैं। 3. दोस्ती ‘इमरजेंसी मोड’ में – आप तभी संपर्क करते हैं, जब कुछ गड़बड़ हो और सुनने वाला हमेशा ‘स्थिर करने वाला’ बन जाए तो रिश्ता केवल संकट के इर्द-गिर्द घूम रहा है। उदाहरण के लिए आपका साथी थका हुआ घर आता है और आप दुख, भविष्य की चिंताएं सुनाने लगते हैं। जब वे कहते हैं- अभी आराम कर लूं, तो आप कहते हैं ‘आप मेरा दुख नहीं सुनते, कद्र नहीं करते।’ सोशल मीडिया पर निजी आघात पर पोस्ट 300% तक बढ़े अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन की रिपोर्टों के अनुसार, करीब 50% युवा दोस्तों या पार्टनर के ‘ट्रॉमा डंपिंग’ के बाद मानसिक थकान महसूस करते हैं। बम्बल और हिंज जैसी डेटिंग एप्स की हालिया रिलेशनशिप ट्रेंड्स रिपोर्ट के मुताबिक, 65% से अधिक यूजर्स ने माना कि पहली या शुरुआती कुछ मुलाकातों में ही उन्हें ट्रॉमा डंपिंग का सामना करना पड़ा। प्यू रिसर्च के डिजिटल बिहेवियर स्टडीज के अनुसार, पिछले 4-5 वर्षों में सोशल मीडिया पर मानसिक बीमारियों और निजी आघातों पर कंटेंट पोस्ट 300% से अधिक बढ़ा है। विशेषज्ञों के अनुसार, अपनी पीड़ा बताने से पहले सामने वाले से पूछें कि वह सुनने को तैयार है।
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ट्रॉमा डंपिंग; दुख-दर्द सुनाने से बढ़ रही दूरियां:मनोवैज्ञानिक बोले- भावनाएं बताने से पहले सामने वाले का रुख जानें, बिना सहमति साझा करने से समस्या
