नालों पर अस्थायी कच्चे बांध, नई सिंचाई प्रणाली अपनाएंगे



भास्कर न्यूज | कोंडागांव राज्य शासन के निर्देश पर कलेक्टर नूपुर राशि पन्ना के मार्गदर्शन में खरीफ मौसम 2026 में संभावित अल्प, अनियमित बारिश से निपटने के लिए कृषि विभाग ने आकस्मिक कार्ययोजना बनाई है। किसानों के लिए जरूरी दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। उप संचालक कृषि के.एन. मरकाम ने बताया कि कम बारिश की स्थिति में किसानों को संरक्षण जुताई अपनाने की सलाह दी गई है। इससे मिट्टी की संरचना सुरक्षित रहती है। नमी बनी रहती है। कार्बनिक पदार्थों का संरक्षण होता है। भूमि की जलधारण क्षमता बढ़ती है। मरकाम ने बताया कि किसानों को अपनी जमीन की प्रकृति, बारिश की स्थिति के अनुसार फसल चुनने की सलाह दी गई है। सूखा-प्रतिरोधी किस्में अपनाने को कहा गया है। कम अवधि में पकने वाली उन्नत किस्मों के उपयोग पर जोर दिया गया है। डायरेक्ट सीडेड राइस (डीएसआर) पद्धति अपनाने की सलाह दी गई है। डीएसआर में धान की रोपाई की जरूरत नहीं होती। 30 से 40 प्रतिशत तक पानी की बचत संभव है। कृषि विभाग ने हल्की जमीन में तिल, रामतिल, मूंगफली की खेती की सलाह दी है। भारी जमीन में शीघ्र, मध्यम अवधि की धान किस्में लेने को कहा है। ऊपरी जमीन में मूंग, उड़द, अरहर की जल्द पकने वाली किस्में बोने की सलाह दी है। कतार पद्धति से बुवाई पर जोर दिया गया है। मिश्रित खेती अपनाने को कहा गया है। बुवाई के समय गोबर खाद, जैविक खाद के उपयोग की सलाह दी गई है। कम बारिश में भी फसल का विकास बेहतर हो सकेगा। उप संचालक कृषि ने बताया कि कम वर्षा की स्थिति में किसानों को कम अवधि, कम पानी में तैयार होने वाली वैकल्पिक फसलों को अपनाने की सलाह दी जा रही है। इनमें बाजरा, ज्वार, मक्का, मूंग (के-851, पूसा विशाल, बीएम-4, एचयूएम-12, विराट), उड़द (टी-9, पंत यू-30, बरखा, गौतम, टीयू-94-2), अरहर, तिल, मूंगफली, तोरिया तथा रागी, कोदो एवं कुटकी जैसे मिलेट शामिल हैं। ये फसलें अत्यधिक सूखा सहन कर सकती हैं। ये कम पानी में भी अच्छी पैदावार देती हैं। इन फसलों को पारंपरिक फसलों की तुलना में बहुत कम सिंचाई की आवश्यकता होती है। ये 60 से 80 दिनों में तैयार हो जाती हैं। साथ ही प्रधानमंत्री आशा योजना के अंतर्गत दलहन एवं तिलहन फसलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी होने से किसानों को उचित मूल्य भी प्राप्त होगा। जल संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए विभाग ने नालों पर अस्थायी कच्चे बांध निर्माण, खेतों में आवश्यकतानुसार सिंचाई, टपक एवं स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों के उपयोग, हाथ से निराई, खेत तालाब निर्माण, ढलान के आड़े जुताई, मल्चिंग तकनीक, कंटूर ट्रेंच, एलबीसीडी, गेबियन संरचनाओं तथा डबरी एवं स्टॉप डेम निर्माण जैसे उपाय अपनाने की सलाह दी है। इन उपायों से वर्षा जल का संरक्षण होगा। भू-जल स्तर बढ़ेगा। मृदा कटाव रुकेगा। संकट की स्थिति में जीवनरक्षक सिंचाई सुनिश्चित हो सकेगी। कृषि विभाग ने जिले के किसानों से अपील की है कि वे मौसम की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विभाग द्वारा सुझाई गई वैज्ञानिक कृषि तकनीकों एवं जल संरक्षण उपायों को अपनाएं।



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