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'चुनौतियों से डरने के बजाय उन्हें ताकत बनाया':4-5 महीने में 40-50% से 90% हुई बच्चों की उपस्थिति, बांका की शिक्षिका खुशबू को राष्ट्रपति करेंगी सम्मानित




बांका के शिक्षा जगत के लिए यह गौरव का पल है। उर्दू प्राथमिक विद्यालय बिदायदिह में प्रधान शिक्षिका के रूप में कार्यरत खुशबू कुमारी का सिलेक्शन राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए हुआ है। शिक्षा के क्षेत्र में उनके नवाचार, बच्चों के प्रति आत्मीय जुड़ाव और विद्यालय की व्यवस्था में किए गए बदलावों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। वर्ष 2019 के बाद करीब सात साल में राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए बांका से चयनित होने वाली वह पहली शिक्षिका हैं। खुशबू कुमारी कहती हैं कि उनके लिए यह सम्मान केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उन बच्चों, अभिभावकों और शिक्षकों की मेहनत का परिणाम है, जिन्होंने विद्यालय को बदलने में उनका साथ दिया। 27 जुलाई 2025 को मिली जिम्मेदारी, लोगों ने कहा- यहां बहुत चुनौतियां हैं खुशबू कुमारी के अनुसार, 27 जुलाई 2025 को उर्दू प्राथमिक विद्यालय बिदायदिह में प्रधान शिक्षिका के रूप में उनकी प्रतिनियुक्ति हुई। विद्यालय में योगदान देने पहुंचीं तो स्थानीय लोगों और शुभचिंतकों ने उन्हें आगाह किया। उन्होंने बताया, “लोगों ने मुझसे कहा कि आपके लिए यह विद्यालय सही नहीं है। यहां बहुत सारी चुनौतियां हैं और आप महिला हैं, इसलिए आपको परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन मैंने उनसे कहा कि चुनौतियां ही इंसान को मजबूत बनाती हैं। जब तक मैं चुनौतियों का सामना नहीं करूंगी, मुझे कैसे पता चलेगा कि मैं इनसे पार पा सकती हूं या नहीं?” लोगों ने उन्हें यह भी बताया कि विद्यालय के आसपास के लोग अच्छे नहीं हैं। इस पर उनका जवाब था कि कोई भी व्यक्ति जन्म से अच्छा या बुरा नहीं होता। हमारा व्यवहार भी तय करता है कि सामने वाला हमारे साथ कैसा व्यवहार करेगा। विद्यालय पहुंचीं तो कई मोर्चों पर चुनौती मिली खुशबू कुमारी बताती हैं कि विद्यालय में पहुंचने के बाद उन्हें वास्तव में कई चुनौतियां नजर आईं। शिक्षकों से बातचीत में पता चला कि बच्चों के बीच सांप्रदायिक विवाद की स्थिति बन जाती थी और कई बार मामला अभिभावकों तक भी पहुंच जाता था। इसके अलावा बच्चों में अनुशासन की कमी थी। विद्यालय में यूनिफॉर्म पहनकर आने वाले बच्चों की संख्या कम थी। जूते, टाई और बेल्ट की स्थिति भी बेहद खराब थी। सबसे बड़ी चुनौती बच्चों की नियमित उपस्थिति थी, लेकिन 12 वर्षों के शिक्षण अनुभव ने उन्हें इन चुनौतियों से निपटने का आत्मविश्वास दिया। “मैं चुनौतियों से डरी नहीं, बल्कि इन्हें अपनी ताकत बनाने का फैसला किया।” शिक्षकों और विद्यालय शिक्षा समिति के साथ बनाई रणनीति खुशबू ने सबसे पहले विद्यालय के शिक्षकों और शिक्षा समिति के सदस्यों के साथ बैठकर बातचीत की। इसके बाद अभिभावकों तक पहुंचने की रणनीति बनाई गई। उनके अनुसार, महीने में होने वाली अभिभावक-शिक्षक संगोष्ठी यानी PTM ने विद्यालय को बदलने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई। उन्होंने बच्चों से कहा कि उनके भविष्य के लिए वह पूरी मेहनत करेंगी, लेकिन केवल शिक्षक की मेहनत से बच्चों का भविष्य नहीं बदल सकता। इसमें अभिभावकों का सहयोग भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने बच्चों से पूछा- “क्या आप अपने माता-पिता को विद्यालय लेकर आएंगे?” बच्चों ने एक साथ जवाब दिया- “जी मैम, जरूर।” इसके बाद बच्चे अपने माता-पिता को लेकर विद्यालय आने लगे। PTM में अभिभावकों से भावनात्मक संवाद किया खुशबू कुमारी ने बताया कि जब अभिभावक विद्यालय पहुंचे तो उन्होंने उनके साथ केवल बच्चों की पढ़ाई की बात नहीं की, बल्कि भावनात्मक संवाद स्थापित किया। उन्होंने अभिभावकों को समझाया कि बच्चों के भविष्य की सबसे बड़ी जिम्मेदारी उनके माता-पिता की है। शिक्षक कुछ घंटे बच्चों के साथ रहता है, लेकिन परिवार का साथ बच्चों के पूरे जीवन को प्रभावित करता है। धीरे-धीरे अभिभावकों में विद्यालय और बच्चों की पढ़ाई को लेकर जागरूकता बढ़ने लगी। इसका असर कुछ ही महीनों में दिखाई देने लगा। 4-5 महीने में 40-50% से 90% पहुंची उपस्थिति खुशबू के मुताबिक, विद्यालय में बच्चों की उपस्थिति पहले करीब 40-50% रहती थी। अभिभावकों के सहयोग और लगातार प्रयासों के बाद महज 4 से 5 महीने में यह बढ़कर करीब 90% हो गई। उन्होंने बताया कि बच्चों की यूनिफॉर्म की स्थिति भी बदल गई। जहां पहले केवल 45-50% बच्चे ही पूरी यूनिफॉर्म में आते थे, वहीं बाद में यह आंकड़ा 100% हो गया। इसी तरह जहां बच्चों के पास जूते, टाई और बेल्ट नहीं होते थे, वहां अभिभावकों के सहयोग से यह भी 100% तक पहुंच गया। खुशबू कहती हैं, “जब अभिभावकों ने देखा कि दूसरे क्षेत्र से आकर एक शिक्षिका हमारे बच्चों के लिए इतनी मेहनत कर रही हैं, तो उन्होंने भी कहा कि हम अपने बच्चों के लिए मेहनत करेंगे और उन्हें आगे बढ़ाएंगे।” पहले 30-40 बच्चे, फिर एक साथ 90 बच्चे बैठकर पढ़ने लगे खुशबू कुमारी का कहना है कि शिक्षा में सुधार के लिए उन्होंने बच्चों को केवल किताबों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने गतिविधि आधारित शिक्षण और नवाचार को पढ़ाई का हिस्सा बनाया। वह कहती हैं कि बच्चों के प्रति उनका जुड़ाव एक मां जैसा है। जब कोई बच्चा विद्यालय नहीं आता था तो उन्हें चिंता होती थी कि बच्चा पढ़ाई से दूर क्यों है। इसी सोच के साथ उन्होंने गतिविधियों और नवाचार के माध्यम से बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। इसका असर बच्चों की रुचि पर पड़ा। बच्चे पढ़ाई से जुड़ने लगे और विद्यालय में उनका ठहराव भी बढ़ा। उन्होंने बताया कि जिस कक्षा में पहले 30-40 या उससे भी कम बच्चे रहते थे, वहां बाद में करीब 90 बच्चे एक साथ बैठकर पढ़ने लगे। ‘बच्चे मेरे लिए सिर्फ विद्यार्थी नहीं, अपने बच्चों जैसे हैं’ खुशबू कुमारी कहती हैं कि बच्चों के प्रति उनका लगाव ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। उनका कहना है, “बच्चों के प्रति मेरा जो सानिध्य और प्रेम है, वह मुझे एहसास कराता है कि ये मेरे बच्चे हैं। मैं उनके लिए मां जैसी चिंता करती हूं। जब कोई बच्चा विद्यालय नहीं आता था तो मुझे चिंता होती थी कि वह पढ़ाई से दूर क्यों है।” इसी सोच ने उन्हें बच्चों के लिए नए तरीके अपनाने के लिए प्रेरित किया। उनके अनुसार, नवाचार से पढ़ाई को बच्चों के लिए आसान और रुचिकर बनाया गया। जब बच्चे सीखने की प्रक्रिया में आनंद महसूस करने लगे तो उनका विद्यालय से जुड़ाव भी मजबूत होता गया। ‘चुनौतियां ही इंसान को मजबूत बनाती हैं’ राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए चयनित होने के बाद खुशबू कुमारी अपने सफर को याद करते हुए कहती हैं कि जिस विद्यालय में जाने से पहले उन्हें चुनौतियों के बारे में चेतावनी दी गई थी, वही विद्यालय उनके लिए बड़ी उपलब्धि का कारण बन गया। उनका कहना है कि मुश्किल परिस्थितियों से भागने के बजाय उन्हें स्वीकार करना चाहिए। “मैंने चुनौतियों को अपनी कमजोरी नहीं माना, बल्कि उन्हें अपनी ताकत बनाया। अगर हम चुनौतियों से डर जाएंगे तो बदलाव कैसे लाएंगे?” 12 साल का अनुभव आया काम खुशबू कुमारी के पास करीब 12 वर्षों का शिक्षण अनुभव है। इससे पहले भी उन्होंने विद्यालयों में बच्चों की उपस्थिति, सीखने की क्षमता और विद्यालय से जुड़ाव बढ़ाने के लिए गतिविधि आधारित शिक्षण और नवाचार का इस्तेमाल किया। उनके अनुसार, शिक्षक का काम केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं है। शिक्षक को यह देखना चाहिए कि बच्चा विद्यालय आ रहा है या नहीं, वह कक्षा में रुक रहा है या नहीं और जो पढ़ाया जा रहा है उसे समझ भी रहा है या नहीं। 2019 के बाद बांका को मिला राष्ट्रीय स्तर पर मौका खुशबू कुमारी के राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए चयन को बांका जिले की शिक्षा व्यवस्था के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। 2019 के बाद करीब सात साल के अंतराल में जिले से किसी शिक्षिका का राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए चयन हुआ है। उनके चयन से शिक्षा विभाग के अधिकारियों, शिक्षकों और शिक्षा जगत से जुड़े लोगों में खुशी है। अधिकारियों का कहना है कि खुशबू कुमारी ने जिस तरह सीमित संसाधनों के बीच बच्चों की उपस्थिति, अनुशासन, यूनिफॉर्म और अभिभावकों की भागीदारी में सुधार किया, वह दूसरे शिक्षकों के लिए भी प्रेरणादायक है। खुशबू की कहानी में बदलाव के 4 आंकड़े



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