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Nepal Floods; Foreign Army Rescue Ban Reason


नेपाल त्रासदी में 600 से ज्यादा मौतों की पुष्टि हो चुकी है। 80 घंटे बाद भी २५०० से ज्यादा लोग गायब हैं। इनमें 320 भारतीयों समेत चीन, अमेरिका, ब्रिटेन जैसे कई देशों के नागरिक भी शामिल हैं। ये देश रेस्क्यू मिशन के लिए अपनी सेनाएं भेजना चाहते हैं, लेकिन

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आखिर 2015 भूकंप के दौरान ऐसा क्या हुआ था, विदेशी सेनाओं की मदद क्यों नहीं लेना चाहता नेपाल और क्या अकेले लापता लोगों को ढूंढ पाएगा; इन्हीं सवालों के जवाब आज के एक्सप्लेनर में…

सवाल-1: विदेशी मदद लेने पर नेपाल का मौजूदा रुख क्या है? जवाबः नेपाल ने विदेशी ‘सर्च एंड रेस्क्यू’ टीमों या सेना वगैरह को आने की मंजूरी नहीं दी है। फिलहाल सिर्फ कुछ देशों के तकनीकी एक्सपर्ट्स जा सकते हैं…

  • 26 अगस्त को नेपाल में बाढ़ आने के बाद भारत, चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया, बांग्लादेश और श्रीलंका ने सर्च और रेस्क्यू टीमें भेजने की पेशकश की थी।
  • 27 अगस्त को नेपाल के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लोक बहादुर छेत्री ने कहा, ‘मदद की पेशकश स्वाभाविक है, लेकिन फिलहाल हमें ऐसी मदद की जरूरत नहीं है। हमारी पुलिस और सेना रेस्क्यू मिशन चला रही हैं।’
  • 28 अगस्त को भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, ‘हमने नेपाल को NDRF की टीमें और जरूरी उपकरण भेजने का प्रस्ताव दिया। उनकी प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहे हैं।’

इसके बाद नेपाल का रुख कुछ बदला…

  • 28 अगस्त को ही एक सीनियर नेपाली ऑफिसर ने काठमांडू पोस्ट से कहा, ‘अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से भारी प्रेशर आया कि कम से कम रेस्क्यू टीम और तकनीकी एक्सपर्ट्स भेजने की परमिशन दी जाए, क्योंकि उनके भी नागरिक लापता हैं। हम कुछ इलाकों में सीमित संख्या में विदेशी एक्सपर्ट्स को परमिशन दे रहे हैं।’
  • नेपाल के डिजास्टर मैनेजमेंट सेंटर के मुताबिक, नेपाल सरकार ने भारत, चीन, ऑस्ट्रेलिया और साउथ कोरिया के एक्सपर्ट्स को मंजूरी दी। ये एक्सपर्ट्स सुरंगों में रेस्क्यू ऑपरेशन चलाने, DNA टेस्टिंग और फोरेंसिक जांच वगैरह में मदद करेंगे।

हालांकि नेपाली विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने साफ किया है कि दूसरे देशों की रेस्क्यू टीम या सेनाओं को नेपाल आने की मंजूरी नहीं है। उन्होंने कहा, ‘सरकार शुरुआती फेज में अपनी फोर्सेज को ही तैनात करना चाहती है। हमारी रेस्क्यू टीमें नेपाल की खास जियोग्राफी और ऊबड़-खाबड़ इलाके को अच्छे से समझती हैं। नए इलाके में बाहरी रेस्क्यू टीमें लगाने से मैनेजमेंट और को-ऑर्डिनेशन में दिक्कतें आएंगी। कई खतरें पैदा हो सकते हैं।’

नेपाली रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये फैसला नेपाली सेना और पुलिस की सिफारिश पर लिया गया है। क्योंकि वो 2015 में नेपाल में आए ‘गोरखा भूकंप’ के दौरान मुसीबत झेल चुके हैं।

बाढ़ के बाद मलबे में दबी नेपाल की एक बस्ती।

बाढ़ के बाद मलबे में दबी नेपाल की एक बस्ती।

सवाल-2: 2015 में ऐसा क्या हुआ था, जो विदेशी सेनाओं की मदद लेने से हिचक रहा नेपाल? जवाब: 25 अप्रैल 2015 को नेपाल में 7.8 की तीव्रता का भूकंप आया। इसमें करीब 9,000 लोगों की मौत हुई, 22,000 घायल हुए और 35 लाख लोग बेघर हो गए थे।

नेपाल के तब के पीएम सुशील कोइराला की सरकार ने विदेशों से मदद मांगी। 34 देशों से 76 ‘सर्च-एंड-रेस्क्यू टीमें नेपाल पहुंच गईं। इनमें 18 देशों की सैन्य टीमें भी थीं। पूरे रेस्क्यू में 3 तरह की दिक्कतें हुईं…

1. हवाई अड्डे से लेकर आपदा के इलाके तक भारी भीड़

नेपाल में तब अकेला इंटरनेशनल एयरपोर्ट था- त्रिभुवन एयरपोर्ट। इस पर सिर्फ एक रनवे था।

नेपाली टाइम्स ने रेड क्रॉस मेंबर सागर श्रेष्ठ के हवाले से लिखा, ‘एयरपोर्ट पर लगातार जेट उतरने लगे थे। कई विमानों को घंटों हवा में चक्कर लगाना पड़ा। कुछ को डायवर्ट करना पड़ा। कई टीमें एयरपोर्ट पर फंसी रह गईं। कई मानवीय संगठनों ने एयरपोर्ट छोड़कर ट्रक के जरिए सामान भेजना शुरू कर दिया।’

न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, नेपाल में ब्यूरोक्रेसी से जुड़ी दिक्कतें भी थीं। नेपाली कस्टम विभाग ने राहत सामग्री पर टैक्स लगाने की कोशिश की, जिसकी काफी आलोचना हुई।

विदेशी टीमें गैर-जरूरी सामान और टूल्स ला रही थीं। अक्सर एक ही जगह पर अलग-अलग देशों की रेस्क्यू टीमें पहुंच जाती थीं। कुछ टीमें मानकों के उलट अपने हिसाब से काम कर रही थीं।

5 मई, 2015 को भूकंप प्रभावित इलाके में दौरे पर नेपाल के तब के पीएम सुशील कोइराला

5 मई, 2015 को भूकंप प्रभावित इलाके में दौरे पर नेपाल के तब के पीएम सुशील कोइराला

2. संवेदनशील इलाकों में विदेशी सेनाएं घूम रही थीं

भूकंप के दिन ही भारतीय वायुसेना के 6 Mi-17 हेलीकॉप्टर त्रिभुवन एयरपोर्ट पर उतरे। इसके तुरंत बाद चीनी वायुसेना ने भी अपने हेलीकॉप्टर भेजे। उसके बाद अमेरिकी विमान भी आए। ये रेस्क्यू मिशन कम, संवेदनशील इलाकों में मिलिट्री एक्सरसाइज ज्यादा लग रही थी।

‘स्ट्रैटेजिक एनालिसिस’ जर्नल में छपी स्टडी के मुताबिक, ‘भारत, चीन दोनों ने रेस्क्यू को नेपाल पर अपना प्रभाव बढ़ाने के औजार की तरह इस्तेमाल किया था।’

साउथ एशियन वॉयसेज की स्टडी में लिखा गया, ‘चीनी सेना दूसरी टीमों से सामंजस्य के बजाय ऐसे बर्ताव कर रही थी, जैसे ये उसका इलाका हो। नेपाल ने भी चीन को खुश रखने के लिए भारतीय रेस्क्यू टीम को चीन के हवाई इलाके के आसपास न उड़ने को कहा था। नेपाल ने चीन के कहने पर ताइवान की मदद की पेशकश भी ठुकरा दी थी।’

12 मई 2015 को नेपाल में Mi-17 हेलिकॉप्टर से एक घायल को रेस्क्यू करके अस्पताल ले जाते भारत के जवान।

12 मई 2015 को नेपाल में Mi-17 हेलिकॉप्टर से एक घायल को रेस्क्यू करके अस्पताल ले जाते भारत के जवान।

4 मई 2015 को नेपाल ने विदेशी रेस्क्यू टीमों को नेपाल छोड़ने को कहा था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसकी एक बड़ी वजह भारत और चीन के बीच टकराव था।

नेपाल के हालिया रुख पर संयुक्त राष्ट्र में नेपाल के पूर्व राजदूत रहे दिनेश भट्टराई कहते हैं, ‘विदेशी टीमों को न बुलाने के पीछे एक बड़ी वजह इलाके की संवेदनशीलता हो सकती है। हालांकि लोक बहादुर छेत्री ने इसे इनकार किया है कि ये फैसला चीन की वजह से लिया गया।

3. भारतीय मीडिया की एकतरफा कवरेज से नाराजगी

भारतीय मीडिया की रिपोर्टिंग के रवैये को लेकर नेपाल में खूब विरोध हुआ था। नेपाली पत्रकार कुंडा दीक्षित ने कहा था- ‘भारतीय मीडिया भूकंप और उसके पीड़ितों की कवरेज को दिल्ली सरकार के जनसंपर्क अभियान की तरह इस्तेमाल कर रही है। वो सिर्फ NDRF की टीमों का काम दिखा रही है। इसका इरादा भारत सरकार की घरेलू छवि सुधारना है।’

भूकंप के करीब एक हफ्ते बाद नेपाल में #GoHomeIndianMedia और #DontComebackIndianMedia जैसे हैशटैग नेपाल में टॉप ट्रेंडिंग में थे। नेपाली लोग कह रहे थे- नेपाल एक संप्रभु देश है, भारत का कोई सुदूर राज्य नहीं है।

द डिप्लोमेट की एक रिपोर्ट में लिखा गया- ‘नेपाल, भारत के ‘बड़े भाई’ वाले रवैये को लेकर पहले से सतर्क रहता है, लेकिन भारतीय मीडिया की कवरेज ने इसे और बदतर बना दिया।

सवाल-3: तो क्या नेपाल अकेले सभी लापता लोगों को ढूंढ पाएगा? जवाब: नेपाल टूरिस्ट बोर्ड के मुताबिक, भारत के अलावा चीन के 100, अमेरिका के 65, मलेशिया के 55, यूक्रेन के 53, ऑस्ट्रेलिया के 35, कनाडा के 30, ब्रिटेन के 33 नागरिक अभी लापता हैं। कुल लापता लोगों की संख्या करीब 3000 बताई जा रही है। हालांकि ये फाइनल आंकड़े नहीं हैं।

नेपाल में सबसे ज्यादा तबाही रसुवा जिले, फिर नवाकोट और धादिंग में हुई है। वहीं चीन की तरफ तिब्बत के ग्यिरोंग काउंटी इलाके में 558 लोग लापता हैं, इनमें ज्यादातर विदेशी नागरिक हैं, जिनमें भारत से कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए हिंदू श्रद्धालु भी हैं।

नेपाल भले दावा करे कि उसके पास पर्याप्त मैनपावर है, लेकिन अकेले सारे लोगों या मृत शरीरों को निकालने का काम मुश्किल है…

  • नेपाल-चीन को जोड़ने वाला ‘मैत्री पुल’ बह गया है। सीमा-पार आवाजाही ठप है। 40 पुल और कई सड़कें पूरी तरह डैमेज हो गई हैं। भारी मशीनरी नहीं पहुंच पा रही है।
  • बिजली, टेलीफोन की लाइंस टूट चुकी हैं। रसुवा में बारिश, कोहरे के चलते रेस्क्यू बार-बार रोकना पड़ रहा है।
  • रसुवा के त्रिशूली-1 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट के इलाके में हालात सबसे खराब हैं। नेपाली सेना के मुताबिक, कीचड़ और मलबे के चलते प्रोजेक्ट की सुरंग में एंट्री और एग्जिट पॉइंट नहीं मिल रहे हैं।
  • नेपाल के पावर प्रोड्यूसर एसोसिएशन के डिप्टी प्रेसिडेंट उत्तम भ्लोम कहते हैं, ‘त्रिशूली-1 प्रोजेक्ट के आसपास लापता 576 लोगों से संपर्क नहीं हो पा रहा। अगर समय रहते टनल के अंदर फंसे हुए लोगों तक पहुंच जाएं, तो उन्हें बचाने की संभावना है।’

सड़कें खराब होने के चलते नेपाल के पास एयर-रेस्क्यू का ही ऑप्शन है। जबकि नेपाली सेना के पास सिर्फ 15 हेलीकॉप्टर हैं। अगर नेपाल को एयर-सपोर्ट चाहिए, तो उसे दूसरे देशों के हेलीकॉप्टरों और सैन्य स्टाफ को भी एंट्री देनी होगी। नेपाली ऑफिसर्स का कहना है कि निजी हेलीकॉप्टरों के इस्तेमाल के बारे में सोचा जा रहा है।

मलबे में दबे हुए लोगों की तलाश के लिए भी ड्रोन, थर्मल उपकरण, खोजी कुत्तों वगैरह की जरूरत होगी। इसके लिए नेपाल को दूसरे देशों की रेस्क्यू टीमों की जरूरत पड़ सकती है।

भारत ने राहत सामग्री की चौथी खेप के साथ डॉक्टरों, पैरामेडिक्स और टनल रेस्क्यू एक्सपर्ट्स की एक 11 लोगों की टीम भी भेजी है। नेपाल ने टनल रेस्क्यू एक्सपर्ट और लाशों की पहचान के लिए एक्सपर्ट्स की मांग की है। भारत और चीन से 42 बेली ब्रिज भी मांगे हैं। ये पोर्टेबल ब्रिज होते हैं, जिनसे गाड़ियां वगैरह पार की जाती हैं।

रेस्क्यू मिशन के दौरान नेपाली सेना का हेलीकॉप्टर

रेस्क्यू मिशन के दौरान नेपाली सेना का हेलीकॉप्टर

सवाल-4: क्या विदेशी सेनाएं अपने नागरिकों को निकालने के लिए जबरन नहीं घुस सकते? जवाब: UN चार्टर के आर्टिकल 2(4) के तहत किसी देश की सेनाएं, बिना दूसरे देश की मर्जी के सीमा में दाखिल नहीं हो सकतीं। ये उसकी संप्रभुता का उल्लंघन माना जाएगा।

रेस्क्यू में मदद के लिए या युद्ध, किसी आपदा में फंसे अपने नागरिकों को निकालने के लिए भी दूसरे देश की मंजूरी जरूरी होती है।

हालांकि अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देशों का सिद्धांत है कि अगर उनके नागरिकों की जान को खतरा हो और मेजबान देश उन्हें बचाने में असमर्थ हो या बचाना न चाहता हो, तो वे कार्रवाई कर सकते हैं. इसे ‘प्रोटेक्शन ऑफ नेशनल्स अब्रॉड’ कहा जाता है। हालांकि ये कोई अंतर्राष्ट्रीय कानून नहीं है। इसे ज्यादातर देश नहीं मानते।

वहीं अगर किसी देश की सरकार अपने यहां फंसे विदेशी नागरिकों की जान बचाने में पूरी तरह असमर्थ हो, तो संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठन दूसरे देशों को जरूरी कदम उठाने की सिफारिश कर सकते हैं।

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