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मुंबई के देवताओं पर शृंखला के अंतिम लेख में आज हम दक्षिण मुंबई में स्थित देवताओं के बारे में जानेंगे।
वर्ष 1661 में अंग्रेजी राजा और पुर्तगाली राजकुमारी के बीच विवाह के बाद अंग्रेजों को ‘दहेज’ में सैलसेट द्वीप के दक्षिण में स्थित सात द्वीप मिले। पुर्तगाली इन द्वीपों को बोम-बाहिआ अर्थात ‘उत्तम खाड़ी’ कहते थे, क्योंकि इन द्वीपों से एक बेहतरीन प्राकृतिक खाड़ी का निर्माण हुआ था। पुर्तगालियों ने सैलसेट के सबसे निकट परेल द्वीप पर सायन किले का निर्माण करके अपने और अंग्रेजों के क्षेत्र की सीमा को चिह्नित किया। अंग्रेजों के तहत बोम-बाहिआ बॉम्बे बन गया। इन द्वीपों के मूल निवासी स्थानीय देवी ‘मुंबा देवी’ के नाम पर इन द्वीपों को मुंबई कहते थे।
लगभग 1800 वर्ष पहले यहां आने वाले यूनानी नाविक इन सात द्वीपों को हेप्टानेशिया कहते थे। परेल द्वीप पर शिव की एक असाधारण प्रतिमा मिली है। ग्यारह फुट लंबी इस प्रतिमा के केंद्र में स्थित शिव से उनके छह अन्य रूप उभरते हुए दिखाई देते हैं। संभवतः कलचुरि राजाओं ने यह प्रतिमा तराशी थी, जिन्होंने 1500 वर्ष पहले एलीफेंटा और जोगेश्वरी की गुफाओं में भी ऐसी ही प्रतिमाएं तराशी थीं।
एक हजार वर्ष पहले शिलाहार राजाओं के शासनकाल में बाणगंगा मंदिर परिसर स्थापित किया गया। स्थानीय आख्यानों के अनुसार, राम ने सीता के लिए यहां बाण मारकर इस कुंड का निर्माण किया था। शिव और कई योगिनियों तथा ग्रामदेवियों को समर्पित मंदिरों से घिरा हुआ यह पहला मंदिर था, जो विष्णु से जुड़ा था।
पाठारे प्रभु समुदाय 13वीं सदी में अपने राजा बिम्बा देव और देवी प्रभा देवी के साथ कल्याण-ठाणे क्षेत्र से होते हुए इन द्वीपों में आकर बसा। ये लोग खिलजी सरदारों के हमलों से बचकर यहां आए थे, जिन्होंने गुजरात और दक्खन पर कब्जा करते हुए एलोरा के निकट देवगिरि में स्थित यादव राजाओं की राजधानी को नष्ट कर दिया था। मराठी बिम्बाख्यान के अनुसार, वे महिकावती में बसे, जहां आज माहिम स्थित है। बिम्बा देव ने बबूल के पेड़ों के बाग में शिव को समर्पित एक मंदिर बनवाया, जो आज बाबुलनाथ के नाम से प्रसिद्ध है। समय के साथ इस मंदिर के मात्र खंडहर रह गए थे। 18वीं सदी में इसका पुनर्निर्माण हुआ।
14वीं और 16वीं सदियों के बीच इस क्षेत्र पर गुजरात के सुल्तानों ने राज किया। इस समय मध्य एशिया, अरब और फारस से कई सूफी और गाजी यहां आए। उन्होंने हज यात्रा की थी, जिस कारण वे हाजी कहलाए। उनकी दरगाहें तीर्थस्थल बन गईं। इनमें माहिम में मखदूम अली माहिमी की दरगाह और वर्ली में हाजी अली की दरगाह मशहूर हैं।
जब अंग्रेज भारत आए, तब उन्होंने देखा कि मुगल पश्चिमी समुद्रतट के मुख्य बंदरगाह सूरत से बहुत टैक्स कमाते थे। सन 1664 में छत्रपति शिवाजी महाराज ने सूरत पर आक्रमण कर दिया। आगे जाकर इस घटना से अंग्रेजों और मुंबई शहर, दोनों को लाभ हुआ। सूरत के कारीगर और व्यापारी रहने के लिए मुंबई आने लगे। उनके साथ कई पारसी भी मुंबई स्थानांतरित हुए। अंग्रेजों के साथ काम करते हुए पारसी समुदाय ने अफीम और कपास का व्यापार किया। मुंबई शहर और उसके कई संस्थानों की स्थापना में इस समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यही कारण है कि मुंबई में कई पारसी अगियारी हैं। प्रारंभिक अगियारी 1701 में फोर्ट जॉर्ज के निकट बनाई गई थी।
लगभग 200 वर्ष पहले सन 1770 और 1850 के बीच अंग्रेजों ने दक्षिण मुंबई के सात द्वीपों के बीच दलदली भूमि को फिर से हासिल करके एक विशाल द्वीप बनवाया। उन्होंने सायन और माहिम के कॉजवे (एक तरह का पुल) बांधकर इस द्वीप को सैलसेट द्वीप से जोड़ दिया। वर्ली की खाड़ी के पानी को शहर में आने से रोकने के लिए समुद्र के किनारे एक दीवार बनानी पड़ी। परंतु यह दीवार लगातार गिरती रहती। फिर पाठारे प्रभु समुदाय के एक सदस्य ने सपने में देखा कि तीन देवियों की मूर्तियां समुद्र में खो गई थीं। लोगों ने ये मूर्तियां ढूंढीं और उन्हें हाजी अली दरगाह के निकट महालक्ष्मी मंदिर में प्रतिष्ठापित किया।
महालक्ष्मी देवी को कमल के फूल अर्पित किए जाते हैं। लोग अक्सर भूल जाते हैं कि तीन देवियों के सामने रखी शेर की प्रतिमा हमें यह याद दिलाने के लिए है कि ये तीनों देवियां आदि शक्ति के रूप हैं। आदि शक्ति न केवल धन की देवी हैं, बल्कि वे राक्षसों का वध करने वाली योद्धा-देवी भी हैं।
सन 1801 में एक स्थानीय ठेकेदार और एक निस्संतान महिला ने मिलकर सिद्धि विनायक मंदिर स्थापित किया था, इस आशा में कि उन्हें संतान प्राप्त होगी। इस मंदिर में प्रतिमा बाणगंगा की प्रतिमा से मिलती-जुलती है। संभवतः यह प्रतिमा 800 वर्ष पहले किसी मूर्तिकार द्वारा तराशी गई हो और फिर कई दशकों बाद लोगों ने उसे ढूंढकर सिद्धि विनायक के मंदिर में प्रतिष्ठापित किया।
आज मुंबई के महानगर में सड़कों, एक्सप्रेसवे, फ्लायओवर, मेट्रो इत्यादि का लगातार निर्माण हो रहा है। लेकिन जो देवियां मुंबई की जड़ों में बसी हैं, उन्हें हम कालबादेवी, जोगेश्वरी, महाकाली, गामदेवी, गोल्फा देवी, महालक्ष्मी, शीतला देवी और प्रभादेवी जैसी जगहों के कारण आज भी भूले नहीं हैं।
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