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ललिता गौतम हत्याकांड में प्रशासन को सात दिन का अल्टीमेटम:मेरठ सिवाया टोल पर गरजे चंद्रशेखर आजाद, कहा- यह घटना जातिवादी मानसिकता का नतीजा




आजाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद शुक्रवार को ललिता गौतम हत्याकांड के पीड़ित परिवार से मिलने मेरठ पहुंचे। पुलिस ने कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए उन्हें थिरोट गांव जाने की अनुमति नहीं दी, जिसके बाद चंद्रशेखर टोल के पास ही धरने पर बैठ गए। आखिरकार पीड़ित परिवार को गांव से सिवाया टोल स्थित कार्यालय में बुलाकर उनकी मुलाकात कराई गई। इस दौरान हाल ही में आजाद समाज पार्टी में शामिल हुए पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रेम प्रकाश भी उनके साथ मौजूद रहे। करीब दो घंटे तक चली बातचीत में चंद्रशेखर ने परिवार से पूरे घटनाक्रम, पुलिस कार्रवाई और प्रदर्शन के दौरान हुए लाठीचार्ज की जानकारी ली। परिवार ने सांसद को बताया कि पुलिस ने प्रदर्शन के दौरान महिलाओं तक को नहीं बख्शा और उन्हें दौड़ा-दौड़ाकर पीटा गया। महिलाओं ने उन्हें चोटों के निशान भी दिखाए। इस पर चंद्रशेखर आजाद ने मौके पर मौजूद पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों से घटना के प्रति नाराजगी जताई। उन्होंने पीड़ित परिवार की सुरक्षा, निष्पक्ष जांच, एससी-एसटी एक्ट के तहत मिलने वाली आर्थिक सहायता तथा प्रभावित परिवार के पुनर्वास संबंधी मांगें अधिकारियों के सामने रखीं। अधिकारियों ने इन मांगों पर कार्रवाई का भरोसा दिलाया। बोले- जिन्हें मरहम लगाना था, उन्होंने जख्म दिया
मीडिया से बातचीत में चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि इतने गंभीर मामले में जिस प्रकार पीड़ित दलित परिवार के साथ व्यवहार किया गया, वह अधिकारियों की जातिवादी मानसिकता को उजागर करता है। उन्होंने कहा कि जिस समय परिवार के जख्मों पर मरहम लगाने की आवश्यकता थी, उस समय उन्हें और अधिक पीड़ा देने का काम किया गया। इससे परिवार भयभीत और असुरक्षित महसूस कर रहा है। एसएसपी के रवैये पर जताई नाराजगी
उन्होंने मेरठ के एसएसपी अविनाश पांडेय के रवैये पर भी तीखा हमला बोला। कहा कि प्रदर्शनकारियों के साथ जो कुछ हुआ, वह बेहद शर्मनाक है और इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। आरोप लगाया कि ऐसा प्रतीत होता है कि किसी के इशारे पर यह कार्रवाई की गई। एसएसपी पहले से मानसिक रूप से तैयार थे, जिसकी झलक उनकी भाषा और व्यवहार में दिखाई देती है। इतने वरिष्ठ पद पर बैठे अधिकारी को अपने व्यवहार पर खेद व्यक्त करना चाहिए, क्योंकि यदि शीर्ष स्तर पर ऐसा रवैया अपनाया जाएगा तो अधीनस्थ अधिकारियों से संवेदनशीलता की अपेक्षा नहीं की जा सकती। सात दिन का अल्टीमेंटम वरना आंदोलन
नगीना सांसद ने जिला प्रशासन को सात दिन का अल्टीमेटम देते हुए कहा कि यदि उनकी मांगों पर कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन मेरठ तक सीमित नहीं रहेगा। इसके बाद राजधानी लखनऊ में मुख्यमंत्री आवास का घेराव किया जाएगा। उन्होंने कहा कि उनकी प्रमुख मांगों में निष्पक्ष जांच, पीड़ित परिवार की सुरक्षा, एससी-एसटी एक्ट के तहत सभी वैधानिक लाभ और प्रभावित परिवार के पुनर्वास की व्यवस्था शामिल है। बोले- फिर तो यह गोली भी चलवा देंगे
चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि अपने राजनीतिक जीवन में उन्होंने किसी अधिकारी का ऐसा व्यवहार पहले नहीं देखा। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी टिप्पणी या छोटे विवाद पर अधिकारी इस हद तक आक्रोशित हो सकते हैं कि हिरासत में लिए गए लोगों के साथ मारपीट करें, तो यह लोकतंत्र और कानून व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है। यदि अधिकारियों का गुस्सा इस स्तर तक पहुंच सकता है तो यह आशंका भी पैदा होती है कि भविष्य में इससे अधिक कठोर कदम भी उठाए जा सकते हैं। गोली भी चलवा सकते हैं। तथ्यों को छिपाने का हो रहा प्रयास
नगीना सांसद ने आरोप लगाया कि घटना के बाद भी अधिकारियों द्वारा खेद व्यक्त न करना और आंदोलन में शामिल लोगों को जेल भेज देना इस बात की ओर संकेत करता है कि कहीं न कहीं कुछ तथ्यों को छिपाने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जिले का माहौल सामान्य नहीं है और कुछ लोग जातीय तनाव पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी पार्टी इन मंसूबों को कामयाब नहीं होने देगी। संविधान ने दिया आंदोलन का अधिकार
बसपा सुप्रीमो मायावती द्वारा दिए गए बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि वह उनका सम्मान करते हैं, लेकिन लोकतंत्र में सड़क पर संघर्ष भी संवैधानिक अधिकार है। जब लोगों को न्याय नहीं मिलता तो उन्हें आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ता है। किसान आंदोलन इसका बड़ा उदाहरण रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या आर्थिक रूप से कमजोर दलित परिवार लंबे समय तक अदालतों में मुकदमा लड़ने का खर्च उठा सकते हैं। ऐसे में लोकतांत्रिक आंदोलन ही उनकी आवाज बनता है। जिलाधिकारी को सुननी होगी जनता की आवाज
चंद्रशेखर ने प्रशासन पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि यदि दलित समाज के लोग अपनी बात उठाते हैं तो उसे गलत क्यों माना जाता है। उन्होंने पूछा कि जिन अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों के साथ ऐसा व्यवहार किया, क्या वे बता सकते हैं कि उन्होंने पिछली बार किसी अन्य वर्ग के लोगों के साथ ऐसा कब किया था। उन्होंने जिलाधिकारी द्वारा मिलने से इनकार किए जाने पर भी सवाल खड़े किए और कहा कि जनता से संवाद प्रशासन की जिम्मेदारी है। मेरठ की घटना जातिगत भेदभाव का नतीजा
सांसद ने घोषणा की कि यदि निर्दोष लोगों को रिहा नहीं किया गया और न्याय नहीं मिला तो आंदोलन जारी रहेगा। उन्होंने कहा कि 20 जुलाई से संसद का सत्र शुरू होगा, लेकिन इसके बाद भी आवश्यकता पड़ने पर वह स्वयं आंदोलन में बैठेंगे। उन्होंने कहा कि हरिद्वार में एक सांसद के कपड़े फाड़े जाते हैं और मेरठ में हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों की पिटाई होती है। आखिर यह किस कानून और किस पुलिस एक्ट के तहत किया जा रहा है। उनका आरोप था कि यह पूरा मामला जातिगत भेदभाव और सत्ता के दुरुपयोग से जुड़ा हुआ दिखाई देता है।



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