संयुक्त राष्ट्र ने भारत समेत 164 देशों के समर्थन से दुनिया के नए नक्शे का प्रस्ताव पारित किया। तीन दिन बाद भारत ने इसी नक्शे पर ऐतराज जता दिया। वजह- कश्मीर के कुछ हिस्से को पाकिस्तान और चीन का इलाका दिखाया जाना। विवाद में पाकिस्तान भी कूद पड़ा और भार
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सवाल-1: दुनिया को नए नक्शे की जरूरत क्यों पड़ गई? जवाबः पहले ये जान लेते हैं- रूस ज्यादा बड़ा है या अफ्रीका? मौजूदा वर्ल्ड मैप को देखकर ज्यादातर लोग रूस कहेंगे। लेकिन असलियत में अफ्रीका 78% बड़ा है। तो ऐसी गफलत होती क्यों है?
हमारी धरती गोल है। इस पर बने देशों को सपाट कागज पर दिखाने के लिए गोल ग्लोब को खोला गया है। जब किसी गोल चीज को खोलते हैं, तो उसके बीच वाले हिस्से का सरफेस एरिया ज्यादा होता है और ऊपर-नीचे के हिस्सों का कम। इस कमी को पूरा करने के लिए कागज पर बने नक्शे में बीच के, यानी भूमध्य रेखा के पास के इलाकों को छोटा कर दिया जाता है और ऊपर-नीचे के इलाकों को बड़ा। इसे Gif से समझिए…

इस कमी के कारण अफ्रीका और ग्रीनलैंड पुराने मैप में लगभग बराबर दिखते हैं, जबकि अफ्रीका का क्षेत्रफल ग्रीनलैंड से 14 गुना ज्यादा है। इसी तरह रूस भी छोटा होने के बावजूद अफ्रीका से बड़ा दिखता है।
दुनिया का ऐसा नक्शा 1569 में यूरोपियन मैप मेकर जेरार्डस मर्केटर ने बनाया था। तब इसे जहाजों के नेविगेशन के लिए बनाया गया था।
इसी कमी के खिलाफ अफ्रीका से नया वर्ल्ड मैप बनाने की मुहिम शुरू की। क्षेत्रफल के हिसाब से नया नक्शा तैयार किया- ‘द इक्वल अर्थ मैप प्रोजेक्शन’। इसमें अफ्रीका, ब्राजील, दक्षिण अमेरिका को मार्केटर मैप की तुलना में बड़ा दिखाया गया। ग्रीनलैंड और यूरोप को वर्तमान से छोटा दिखाया है। भारत का आकर भी पहले से थोड़ा बढ़ा दिखता है।
इसे पहली बार 2018 में पेश किया गया। फरवरी 2026 में अफ्रीकी संघ ने ‘इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन’ को अपनाया। सदस्य देशों से स्कूली पाठ्यक्रमों में इसे शामिल करने की अपील की।
इसके बाद 4 सितंबर को अफ्रीकी देश टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट डुसे ने ‘करेक्ट द मैप’ यानी ‘मैप सही करो’ प्रस्ताव UN में पेश किया। इसमें ‘इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन’ मैप या देशों के क्षेत्रफल के हिसाब से बने किसी और मैप के इस्तेमाल की अपील की गई।
सवाल-2: संयुक्त राष्ट्र में इस मैप के समर्थन-विरोध में कौन था? जवाबः भारत और पाकिस्तान समेत 164 देशों ने नए मैप के प्रस्ताव का समर्थन किया। अमेरिका इसके खिलाफ वोट करने वाला इकलौता देश रहा। यूक्रेन, सर्बिया, जॉर्जिया समेत 6 देशों ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया। 4 सितंबर को ये प्रस्ताव पारित हो गया।
गौर करें- UN ने अपने प्रस्ताव में मर्केटर मैप को बैन नहीं किया है। जबकि ऐसे नक्शों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने को कहा है, जिनमें देशों को उनके असल क्षेत्रफल के हिसाब से बड़ा या छोटा दिखाया गया है।
सवाल-3: भारत ने समर्थन में वोट किया, फिर अब ऐतराज क्यों जता रहा है? जवाबः UN में प्रस्ताव पारित होने के बाद इक्वल अर्थ की वेबसाइट का एक नक्शा चर्चा में आ गया। इसमें PoK और अक्साई चिन को भारत का हिस्सा नहीं दिखाया गया है।

यह तस्वीर इक्वल अर्थ की वेबसाइट पर दुनिया के पॉलिटिकल मैप की है। इसमें जम्मू-कश्मीर का कुछ हिस्सा पाकिस्तान और चीन में दिखाया गया है।
सवाल उठने लगे कि क्या भारत ने ऐसे नक्शे को मंजूरी दे दी है, जिसमें पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है। 6 सितंबर को भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने X पर पोस्ट में दो बातों पर सफाई दी…
जम्मू-कश्मीर पर भारत का स्टैंडः जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न हिस्सा है। इन्हें दुनिया के नक्शे में भारत के आधिकारिक नक्शे के हिसाब से ही दिखाया जाना चाहिए। कोई भी गलत चित्रण मान्य नहीं किया जाएगा।
मैप के समर्थन में वोटिंग की वजहः भारत ने प्रस्ताव का समर्थन किया, क्योंकि भारत समान-क्षेत्रफल वाले नक्शों को बढ़ावा देता है। प्रस्ताव का मतलब किसी खास नक्शे, प्रोजेक्शन या राष्ट्रीय सीमाओं के चित्रण को मंजूरी देना नहीं है।’
पाकिस्तान भी विवाद में कूद पड़ा। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सज्जाद हैदर ने 7 सितंबर को बयान दिया, ‘जम्मू-कश्मीर को लेकर भारत के दावे बेबुनियाद हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जम्मू-कश्मीर को विवादित भूमि माना जाता है। भारत की एकतरफा कार्रवाइयां और गैर-कानूनी कब्जा इसे बदल नहीं सकता।’
पाकिस्तान का कहना है कि जम्मू-कश्मीर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के सबसे पुराने अनसुलझे मामलों में से एक है। इसका निपटारा भी UNSC और कश्मीर की आवाम के प्लेबिसाइट, यानी जनमत संग्रह से होगा।
पूर्व राजदूत मंजीव सिंह पुरी के मुताबिक, ‘भारत ने मैप के ज्योग्राफिकल प्रेजेंटेशन के पक्ष में वोट दिया है। देशों की सीमाओं पर वोट न तो UN में लिया गया था, न भारत ने इस पर वोट दिया है।’
सवाल-4: आखिर भारत-पाकिस्तान के बीच कश्मीर को लेकर विवाद किस बात का है?
जवाब: अंग्रेजों से भारत की आजादी के लिए 18 जुलाई 1947 को इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट पारित हुआ। इसने देश को 2 डोमिनियन में बांटा- भारत और पाकिस्तान। इसी के साथ ‘कश्मीर विवाद’ शुरू हो गया…
- दरअसल, तब देश में 565 रियासतें थीं। इनके पास 3 रास्ते थे- भारत का हिस्सा बने, पाकिस्तान में शामिल हो या आजाद रहे।
- कश्मीर रियासत के राजा हरि सिंह ने आजादी चुनी। 12 अगस्त 1947 को कश्मीर ने ऐलान किया- ‘हम किसी देश में विलय नहीं करेंगे।’
- राजा के बेटे कर्ण सिंह के मुताबिक, ‘भारत लोकतंत्र लाने जा रहा था, जो राजा को पसंद नहीं था। पाकिस्तान मुस्लिम देश बनने जा रहा था। उसके साथ जाना भी ठीक नहीं था।’
- पाकिस्तानी कबायलियों और सेना ने अक्टूबर 1947 में कश्मीर में धावा बोल दिया। साफ था कि नाराज पाकिस्तानी हुक्मरान कश्मीर पर कब्जा करना चाहते थे।

करीब 5,000 कबायलियों ने भारत पर हमला बोला था। इनकी हथियार और ट्रेनिंग पाकिस्तान से मिले थे।
- कबायलियों ने खुद को स्वतंत्रता सेनानी कहा और गैर-मुस्लिमों का नरसंहार किया, घर लूटे, औरतों का रेप और अपहरण हुआ।
- जब राजा हरि सिंह इन्हें रोकने में नाकाम रहे, तो भारत से मदद मांगी और 26 अक्टूबर 1947 भारत में विलय के प्रस्ताव पर दस्तखत कर दिए।
- अगली सुबह भारतीय फौज श्रीनगर की हवाई पट्टी पर उतरी। कबायलियों को तेजी से पीछे धकेलने लगी। पाकिस्तान भी पूरी ताकत से जुट गया और डेडलॉक की स्थिति बन गई।
- 31 दिसंबर 1947 को भारत यह मामला UN ले गया। 1 साल 2 महीने और 5 दिन की जंग के बाद 1 जनवरी 1949 को सीजफायर हुआ। दोनों देशों की सेनाएं जिस जगह थीं, वहीं डटी रहीं। जुलाई 1949 में इसे सीजफायर लाइन माना गया।
- तब तक कश्मीर के 34% इलाके, यानी करीब 83,157 वर्ग किमी जमीन पर पाकिस्तान का कब्जा था। इसे ही PoK कहते हैं।
- UN में प्रस्ताव पास हुआ कि कश्मीर की जनता वोटिंग करे कि वे भारत का हिस्सा रहना चाहते हैं या पाकिस्तान का। लेकिन यह जनमत संग्रह कभी नहीं हो पाया।
फिर 1962 की जंग में चीन ने भारत के अक्साई चिन पर कब्जा कर लिया। 1963 में पाकिस्तान ने गिलगित-बाल्टिस्तान की शक्सगाम घाटी भी चीन को दे दी। फिलहाल जम्मू-कश्मीर के 7 हिस्से हैं…

डिस्क्लेमरः भारतीय संविधान के अनुसार PoK समेत संपूर्ण जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है। दैनिक भास्कर इस संवैधानिक स्थिति का पूर्ण समर्थन करता है। स्टोरी में इस्तेमाल हुए संदर्भ, नाम या ब्योरे जैसे ‘आजाद जम्मू-कश्मीर’, ‘गिलगित-बाल्टिस्तान’ आदि का सिर्फ रिपोर्टिंग के लिए जिक्र है।
1971 की जंग के बाद शिमला समझौते में तय हुआ कि भारत-पाकिस्तान अपने विवाद शांतिपूर्ण तरीके से और बिना तीसरे पक्ष की मध्यस्थता के सुलझाएंगे। भारत का अभी भी यही रुख है कि कश्मीर का मामला द्विपक्षीय है और इसमें UN या किसी देश की दखलअंदाजी नहीं होनी चाहिए।
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