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रसरंग में मायथोलॉजी:दिव्य प्रतीक से देव वाहन तक, हिंदू धर्म में प्राणियों की भूमिका




पंद्रहवीं सदी में सारला दास द्वारा रचित ओड़िया महाभारत में वर्णन मिलता है कि कृष्ण अर्जुन के सामने नवगुंजर नामक प्राणी के रूप में प्रकट हुए थे। नवगुंजर का शरीर मुर्गे, मोर, शेर, बाघ, कूबड़ वाले बैल, हाथी, घोड़े, सांप और मनुष्य के अंगों से मिलकर बना था। इस विलक्षण प्राणी को देखकर अर्जुन दंग रह गए और तुरंत समझ गए कि उन्हें स्वयं भगवान का साक्षात्कार हुआ है। हिंदू आख्यान शास्त्र में प्राणियों की अहम भूमिका है। कुछ प्राणियों के माध्यम से तत्वमीमांसा से जुड़े विचार व्यक्त किए जाते हैं तो कुछ प्राणी भगवान के स्वरूप होते हैं। वहीं कई प्राणी देवताओं के ‘वाहन’ के रूप में जाने जाते हैं। देवताओं से तरह-तरह के जीव जुड़े हैं – चलने वाले, तैरने वाले, रेंगने वाले और उड़ने वाले। आइए, इनके बारे में विस्तार से जानते हैं। कहते हैं कि जब ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की, तब विश्व ने शतरूपा नामक स्त्री का रूप धारण किया। फिर ब्रह्मा अपनी ही निर्मिति पर मोहित होकर उनका पीछा करने लगे। अपने सृजनकर्ता से बचने के लिए शतरूपा विविध प्राणियों के मादा रूप धरने लगीं। ब्रह्मा भी प्रत्येक प्राणी का नर रूप लेते गए और इस प्रकार प्राणी जगत की सभी प्रजातियों का जन्म हुआ। अन्य कथाओं के अनुसार, ब्रह्मा के पुत्र महर्षि कश्यप की कई पत्नियां थीं, जिनसे विभिन्न प्रकार के जीवों की उत्पत्ति हुई। कद्रू ने सांपों को और विनता ने पक्षियों को जन्म दिया। वहीं भगवान शिव को सभी जीवों का स्वामी यानी पशुपति माना जाता है। स्वाभाविक रूप से, जीवन की शुरुआत समुद्र से हुई। इसलिए विष्णु का पहला अवतार भी मत्स्य अवतार था, क्योंकि केवल मछली ही तैरकर प्रलय से जीवित बच सकती थी। प्रथम मानव मनु ने एक विशाल नाव में जीवों की सभी प्रजातियों को सुरक्षित रखा और मत्स्य उस नाव को मेरु पर्वत तक सकुशल ले गया। अगला महत्वपूर्ण प्राणी कछुआ (कूर्म) है, क्योंकि माना जाता है कि धरती उसी की समतल और स्थिर पीठ पर टिकी है। कछुआ स्थिरता और दीर्घायु का प्रतीक है। वह ऋषि का भी प्रतीक माना जाता है, क्योंकि ऋषि की तरह वह भी अपने बाहरी अंगों को समेटकर चिंतन में लीन हो सकता है। मध्यकालीन सिंध के देवता झूलेलाल को वरुण का अवतार माना जाता है और उन्हें मछली पर सवार दिखाया जाता है। उत्तर भारत में गंगा को देवी मानकर उन्हें डॉल्फिन या मकर पर सवार दर्शाया जाता है, जबकि उनकी बहन यमुना कछुए पर सवार होती हैं। दोनों नदियों के वाहन सर्वथा उपयुक्त हैं, क्योंकि जहां गंगा तीव्र गति से बहने वाली नदी है, वहीं यमुना का प्रवाह धीमा है। कुछ विद्वानों का मानना है कि मकर डॉल्फिन नहीं बल्कि मगरमच्छ है। पारंपरिक रूप से मकर को ‘कैप्रिकॉर्न’ से जोड़ा जाता है, जिसका शरीर हाथी के सिर और मछली की पूंछ से बना माना गया है। यह वसंत ऋतु व उर्वरता का प्रतीक है और कामदेव से जुड़ा है।



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