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एन. रघुरामन का कॉलम:पैरेंट्स के तौर पर हम नई पीढ़ी पर अपना गुस्सा कैसे कंट्रोल कर सकते हैं?




क्या आप अपने बच्चों का होमवर्क देखने के लिए रोजाना ऑफिस से जल्दी घर भागते हैं? क्या आपके बॉस आपको 5 बजते ही घर भागने के लिए टोकते हैं? क्या आप तब फ्रस्ट्रेट होते हैं, जब वे आपको सलाह देते हैं कि ‘जब तक आप अपने काम की जिम्मेदारी नहीं लेते और घर भागना बंद नहीं करते, तब तक कॅरिअर में आगे नहीं बढ़ पाएंगे?’ आपको तब और अधिक झुंझलाहट होती है, जब घर पहुंचकर देखते हैं कि आपके बच्चे टीवी देख रहे हैं? और अंतत:, क्या आपको कभी-कभार लगता है कि इस सबकी वजह आपके स्कूल जाने वाले दो आलसी और लापरवाह बच्चे हैं, जो अपने स्कूल-वर्क की जिम्मेदारी नहीं लेते? और आपको यकीन है कि अगर आप उनका होमवर्क नहीं देखेंगे तो वह पूरा नहीं होगा या ठीक से नहीं होगा। यही वजह है कि आप बॉस की नाराजगी के बावजूद हर दिन घर भागते हैं। इसके भी अधिक जब आप उन्हें होमवर्क के अलावा सब कुछ करते हुए पकड़ते हैं तो आपका भावनात्मक बांध, मेरा मतलब गुस्सा, फूट जाता है और पूरे घर में फैल जाता है। आप ताना मारते हैं कि ‘तुम ऐसे पैरेंट्स के घर कैसे पैदा हो गए, जो अपने स्कूल में काफी ब्रिलियंट थे?’ इस सब की वजह यह है कि आप खुद ऐसे सेल्फ-मोटिवेटेड स्टूडेंट थे, जिसे बहुत कम सुपरविजन की जरूरत थी और आपका दिन 24 घंटे का होता था। दुर्भाग्य से, उनके दिन सिर्फ 18 घंटे के हैं। क्या आपने कहा कि ‘ये क्या बकवास है?’ प्लीज, मुझ पर गुस्सा मत निकालिए। मेरी बात सुनिए। हमें कभी भी अनवरत डिजिटल स्टिम्युलेशन, सोशल मीडिया, स्मार्टफोन, ऑनलाइन गेमिंग और डिस्ट्रैक्ट करने वाली ऐसी अंतहीन चीजों से नहीं जूझना पड़ा, जो आज युवाओं का ध्यान आकर्षित करने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रही हैं। उन पर एकेडमिक प्रेशर भी बढ़ा है और हर पैरेंट्स चाहते हैं कि उनके बच्चे क्लास में फर्स्ट आएं। इसीलिए मैं हमेशा कहता हूं कि हमारे लिए यह अच्छा नहीं कि हम कल की विकास संबंधी अपेक्षाओं को आज के माहौल में उन पर लागू करें। हमारे बचपन और किशोरावस्था से तुलना करें तो आज माहौल पूरी तरह बदल चुका है। इन्डिपेंडेंट लर्निंग, प्लानिंग, टाइम मैनेजमेंट, फ्रस्ट्रेशन-टॉलरेंस और टास्क-इनिसिएशन जैसी क्षमताएं धीरे-धीरे विकसित होती हैं। कुछ लोगों में तो ये 30 की उम्र के बाद आती हैं, जबकि कुछ इन्हें बहुत जल्दी हासिल कर लेते हैं। आप इसलिए परेशान हो रहे हैं, क्योंकि शायद आपके बच्चे लेट-लर्नर हैं। वे बड़े होकर कॉलेज में भी उसी तरह व्यवहार करते हैं। जब पैरेंट्स उनको मेरे पास लाते हैं और वे पढ़ाई में कम रुचि दिखाते हुए कहते हैं कि ‘हमारी जनरेशन को सलाह नहीं चाहिए, एजुकेशन तो पढ़ाकू लोगों के लिए है’, तो मुझे लगता है कि ऐसे बयान कुछ हद तक उनके लड़कपन की दिखावटी बहादुरी को दर्शाते हैं, लेकिन ज्यादातर यह इमोशनल सेल्फ-प्रोटेक्शन होता है। किसी चीज में खुद को कमतर महसूस करने का जोखिम उठाने के बजाय युवाओं के लिए आसान होता है कि उसे खारिज ही कर दें। इसीलिए मैं उनके साथ ऐसी कहानियां शेयर करता हूं, जो उन्हें अंदर तक झकझोर दें। मैंने हाल ही में यूके के मैथ्यू डोनली की कहानी पढ़ी, जो ऐसी ही थी। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से हाल ही ग्रेजुएट हुए डोनली हमेशा कहते हैं कि ‘मैंने ग्रेजुएशन करने के लिए बहुत ही खराब समय चुना।’ वे ऐसा इसलिए कहते हैं, क्योंकि इस साल जब उन्होंने ऑक्सफोर्ड से ग्रेजुएशन किया तो यूके में ग्रेजुएट्स के लिए सिर्फ 8383 वैकेंसी थीं। जबकि 2017 में यह संख्या 55800 थी। सोच रहे हैं कि वह अब क्या कर रहे हैं? वह 6 यूरो की फीस के लिए बिग-मैक डिलीवर कर रहे हैं और हर दिन 125 यूरो कमाते हैं। वह ऑक्सफोर्ड के स्टूडेंट्स समेत हर तरह के लोगों को डिलीवरी करते हैं, लेकिन कभी नहीं कहते कि वह उनसे सीनियर हैं या एजुकेटेड हैं। उनके लिए सबसे मुश्किल काम आउटलेट के उस खास कलेक्शन पॉइंट से खाना लेना रहा है, जहां सभी एक-दूसरे को जानते हैं और ज्यादातर यह भी जानते हैं कि वह ऑक्सफोर्ड ग्रेजुएट हैं। वह अकसर अलग से खड़े हुए ऐसा दिखाते हैं, जैसे फोन पर बात कर रहे हों और संकोच के साथ अपने ऑर्डर नंबर का इंतजार करते हैं। फंडा यह है कि जब बच्चे कोई काम करने से इनकार करें, आलसी दिखें या आपको उल्टा जवाब दें तो यह समझने की कोशिश करें कि उनकी बात लड़कपन की दिखावटी बहादुरी है या इमोशनल सेल्फ-प्रोटेक्शन। एक बार आप इसे समझ जाएंगे तो आपका गुस्सा कम होने लगेगा।



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