- Hindi News
- Opinion
- Navneet Gurjar Column | Changing Political Landscape & Climate Crisis
3 घंटे पहले
- कॉपी लिंक

नवनीत गुर्जर
मौसम, गीत और लोकगीत अब लगभग एक जैसे हो चले हैं। मौसम जाने किस प्रदेश के, किस शहर की, किस गली में सूखा रहेगा, और किस गली को भिगोएगा, पता ही नहीं चलता।
जिन प्रदेशों ने कभी बारिश की लम्बी झड़ी देखी ही नहीं थी, जिनकी उम्मीदें बादलों के शहर की जालिम दीवारों से टकराकर लहूलुहान होती रहती थीं, वहां अब मेघ खूब बरस रहे हैं। जहां सात-सात, आठ-आठ दिन की झड़ी लगा करती थी, वहां अब सूखा पड़ा है।
हालांकि ये सितम्बर का महीना है, काश फूलने लगा है और वर्षा भी बुढ़ा गई है- “फूले काश सकल महि छाई, जनु वर्षाकृत प्रकट बुढ़ाई।’ दरअसल, गीत और लोकगीत भी इसी मौसम की तरह होते हैं। जाने कौन व्यक्ति किस देश या प्रदेश में जाकर गीतों या लोकगीतों का विषय बन जाए, कहा नहीं जा सकता।
किताबें बताती हैं- ग्रीस में सिकंदर और उसकी चंदन की कुर्सी के बारे में कई गीत लिखे गए। जाहिर है ये गीत वहां मेसीडोनिया से आए होंगे। लेकिन भारत में तो वह आक्रांता था, इसलिए यहां के लोकगीतों में उसके प्रति कड़वाहट ही देखने को मिलती है। होनी ही थी।
इसी का उल्टा वाकया इज्जत बेग के बारे में मिलता है। जब वह हमारे देश में आया और उसने एक सुंदर कुम्हारन से प्रेम किया तो हमने उसके बारे में कई तरह के गीत लिखे। जब समरकंद वालों से पूछा गया कि क्या आपने भी ऐसा कुछ लिखा है, तो जवाब मिला- हमारे देश में तो वह बस एक अमीर सौदागर का बेटा था। …और कुछ भी नहीं। प्रेमी तो वो आपके देश जाकर बना। सो गीत आपको ही लिखने थे। आखिर हम कैसे लिखते भला?
गीत, लोकगीत और मौसम से याद आया कि इस समय राजनीति में भी इन तीनों को मिलाकर एक तरह की नई इबारत लिखी जा रही है। इबारत लिखने वाली है जेन-जी और जेन-अल्फा। यानी आज का युवा और किशोर।
उनमें जोश है। व्यवस्था, खासकर कुव्यवस्था के विरोध में उनके भीतर गुस्सा है। वे अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं। जोश के साथ। छोटे-छोटे बच्चे, बड़े-बड़े अफसरों, नेताओं से अपनी मांगें मनवा रहे हैं।
मांगें भी इनकी छोटी-छोटी हैं। टाटपट्टी की जगह बेंच। स्कूल भवन की मरम्मत। स्कूल तक के रास्ते पर सड़क का निर्माण आदि। नेता, राजनेता और राजनीतिक दल अब उन्हें साधने, बहलाने, फुसलाने में जुटे हुए हैं। पर ये युवा हैं कि किसी भी तरह झुकने को तैयार नहीं हैं।
इसलिए कि वो दिन लद गए, जब पैरों की आहट की आदी गलियां भी शाम पड़े सो जाया करती थीं। वो दिन लद गए, जब पहली पूरी पीढ़ियों की आंखें बूढ़े बरगद की तरह ठंडी हुआ करती थीं।
दरअसल, युवावस्था उम्र का एक ऐसा पड़ाव होता है, जिसमें अब तक का जाना-पहचाना सबकुछ शरीर के कपड़ों की तरह तंग हो जाता है। होंठ जिंदगी की प्यास से खुश्क हो जाते हैं।
आकाश के तारे जिन्हें सप्तऋषियों के आकार में देखकर प्रणाम करना होता था, उन्हें पास जाकर छू लेने को जी करता है। इर्द-गिर्द, दूर-पास की हवाओं में इतनी मनाहियां, इतने इनकार होते हैं और इतने विरोध, कि सांसों में आग सुलग उठती है।
अपनी इस आग को ये युवा जिस दिन वोटिंग मशीन में डाल देंगे, उस दिन राजनीतिक दलों की हवा तंग होने लगेगी। यही डर अब हर राजनीतिक पार्टी को सता रहा है।
नेताओं, पार्टियों द्वारा सत्ता की लालसा में जिन पत्थरों पर घिसकर अपनी इच्छाओं के दांत पैने किए जा रहे थे, वही दांत अब खट्टे हो चले हैं। हो सकता है राजनीतिक दल ऐसी कोई चाल चलें कि कालांतर में या समय बीतने के साथ इन युवाओं का गुस्सा ठंडा पड़ जाए, क्योंकि राजनीति जो न कराए वो कम होता है।
रिश्ते, नाते, भाई, बंधु इस राजनीति के लिए हमेशा परिचित भी होते हैं और अपरिचित भी। जैसा मौका होता है, वैसा राग छेड़ दिया जाता है। वैसी रार ठान ली जाती है।
समय के बारे में वैसे कुछ नहीं कहा जा सकता। क्योंकि मनुष्य के दो ही पांव होते हैं और मुकद्दर के हजारों!
अपनी आग को ये युवा जिस दिन वोटिंग मशीन में डाल देंगे अपनी आग को ये युवा जिस दिन वोटिंग मशीन में डाल देंगे, उस दिन राजनीतिक दलों की हवा तंग होने लगेगी। यही डर अब हर राजनीतिक पार्टी को सता रहा है। हो सकता है राजनीतिक दल ऐसी कोई चाल चलें कि समय बीतने के साथ इन युवाओं का गुस्सा ठंडा पड़ जाए, क्योंकि राजनीति जो न कराए वो कम होता है।

