Headlines

PV Sindhu Column | India Breaking Barriers In Space Tech & Innovation


  • Hindi News
  • Opinion
  • PV Sindhu Column | India Breaking Barriers In Space Tech & Innovation

5 घंटे पहले

  • कॉपी लिंक
पी.वी. सिंधु दो बार की ओलिम्पिक पदक विजेता बैडमिंटन खिलाड़ी - Dainik Bhaskar

पी.वी. सिंधु दो बार की ओलिम्पिक पदक विजेता बैडमिंटन खिलाड़ी

क्या होता अगर दस साल पहले कोई भारतीय लड़की कहती कि उसे रॉकेट बनाना है। इसरो में शामिल होकर नहीं, बल्कि खुद का रॉकेट। ऐसे में शायद उसके आसपास के लोग खामोश रह जाते। फिर कोई सहानुभूति से समझाता कि यह उसके बस की बात नहीं।

कि इतने बड़े सपने तो दूसरे देशों के लोगों के लिए होते हैं। लेकिन 18 जुलाई 2026 को एक निजी भारतीय कंपनी का बनाया रॉकेट अंतरिक्ष की कक्षा में पहुंच गया। इसे स्काईरूट ने बनाया था, जिसकी बुनियाद दो युवा इंजीनियरों ने रखी थी। दोनों ने अपने काम छोड़कर इस लगभग नामुमकिन सपने को सच करने की ठानी थी।

पिछले दस वर्षों में देश में प्रतिभाओं में कोई बदलाव नहीं आया है। भारत के पास काबिलियत हमेशा से थी। जो चीज बदली, वह था अवसर। हमारे इतिहास में ज्यादातर समय किसी बड़े सपने का जवाब होता था कि ऐसा करना मुमकिन नहीं। इसलिए नहीं कि काबिलियत में कमी थी। बल्कि इसलिए कि मंजिल तक पहुंचने का दरवाजा ही बंद था। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की सबसे बड़ी कामयाबी यह रही कि अब वह दरवाजा खुल चुका है।

इस बदलाव की गहराई को समझना जरूरी है। दशकों तक भारत में हर बड़े सपने को रुकावटों का सामना करना पड़ता था। कोई भी अहम काम करने के लिए आपको लाइसेंस, मंजूरी, जान-पहचान या प्रभावशाली परिवार के नाम की जरूरत पड़ती थी।

जब दरवाजे कम हों तो वे सबसे पहले उनके लिए खुलते हैं, जिनके पास पहले से चाबियां होती हैं। नौजवान, गरीब और वे लोग दरवाजे के बाहर ही इंतजार करते रह जाते थे, जिनके पास कोई बड़ी पहचान नहीं थी। प्रधानमंत्री मोदी ने इस बंद दरवाजे को देखा और समझा कि असल में इसके क्या कारण थे।

उन्होंने बदलाव को एक ही लाइन में बयान किया- सरकार का रवैया ‘जब तक इजाजत न हो, तब तक पाबंदी’ से बदलकर ‘जब तक मना न हो, तब तक इजाजत’ हो गया है। उनके काम के पीछे एक पक्का संकल्प रहा है- पाबंदियों की दीवार गिराना और खुले दरवाजों वाला देश बनाना। ऐसा देश जहां इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि आप किसकी संतान हैं, फर्क इससे पड़ता है कि आप क्या बनने की काबिलियत रखते हैं।

अंतरिक्ष पर 60 साल तक सरकार का एकाधिकार रहा। 2020 में उसे उन सबके लिए खोल दिया गया, जिनके पास रॉकेट छोड़ने की योग्यता थी। फिर हमारे खेतों के ऊपर का आसमान खुला। उस रूल-बुक को फाड़कर फेंक दिया गया, जिसके मुताबिक एक छोटे-से ड्रोन को उड़ाने के लिए दर्जनों कागजात और इजाजतों की जरूरत पड़ती थी। अब किसी छोटे शहर का कोई नौजवान अपना ड्रोन बना सकता है। 2014 में अंतरिक्ष से संबंधित एक स्टार्टअप था। आज लगभग 440 हैं।

लेकिन सिर्फ दरवाजे खोलना अधूरी बात होगी। एक खुले दरवाजे का कोई फायदा नहीं, अगर वहां तक पहुंचने का आपके पास कोई रास्ता ही न हो। यहीं पर इस सोच की न्यायसंगतता नजर आती है। 2016 में स्टार्टअप इंडिया की शुरुआत के समय देश में 350 स्टार्टअप थे। आज इनकी संख्या दो लाख से ज्यादा है इन्होंने बीस लाख से ज्यादा नौकरियां सृजित की हैं। ये अब हर कोने में पहुंच चुके हैं, जिनमें से एक लाख से भी अधिक की शुरुआत महिलाओं द्वारा की गई है।

करोड़ों ऐसे भारतीय जिनके पास कभी बैंक खाता नहीं था, उन्हें इस दायरे में लाया गया, जहां एक साधारण फोन ही बैंक बन गया। राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने उस व्यवस्था को बदला, जिसके तहत छात्र को किसी एक विषय में दाखिल करा दिया जाता था।

अब छात्र ऐसे विषयों को पढ़ सकते हैं, जिन्हें पहले कभी साथ नहीं पढ़ाया जाता था, किसी डिग्री को बीच में छोड़कर वहीं से दोबारा शुरू कर सकते हैं और देश से बाहर जाए बिना ही विश्वस्तरीय पढ़ाई कर सकते हैं, क्योंकि दुनिया भर के विश्वविद्यालय यहां अपने कैम्पस खोल रहे हैं।

यह सब एक ही बात की ओर इशारा करता है- एक ऐसा देश जिसने आखिरकार अपने युवाओं पर भरोसा करने का फैसला किया है। नरेंद्र मोदी ने भारत के युवाओं को कभी भी ऐसी समस्या नहीं माना, जिसे बस मैनेज करना हो या जिसे उन्होंने सिर्फ वोट बैंक समझा हो।

वे युवाओं से बराबरी के स्तर पर बात करते हैं। यही इस नेतृत्व का वास्तविक मापदंड है। यह कोई योजना या आंकड़ा नहीं, बल्कि एक युवा भारतीय की सोच और कल्पना के दायरे में आया बदलाव है। अब किसी युवा भारतीय के लिए केवल यही सवाल नहीं रह गया है कि उसे सपने देखने की अनुमति है या नहीं; अब सवाल यह है कि वह कितनी दूर जाने का इरादा रखता है।

खबरें और भी हैं…



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *