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धमतरी शहर के मराठा पारा में मराठा समाज ने सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार माता लक्ष्मी की पूजा की। भाद्रपद महीने में होने वाला यह उत्सव कई घरों में ढाई दिनों तक पूरे विधि-विधान और उत्साह के साथ मनाया गया। समाज के लोगों का कहना है कि पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा में आज भी आधुनिक बदलाव नहीं किया गया है। समाज के विश्वजीत कृदत्त ने बताया कि भाद्रपद महीने में मराठा समाज के लोग यह विशेष पूजा करते हैं। पहले दिन यानी सप्तमी को भगवती की स्थापना, दूसरे दिन अष्टमी को महापूजन और तीसरे दिन नवमी को विसर्जन किया जाता है। सप्तमी को स्थापना, अष्टमी को महापूजन उन्होंने बताया कि यह पूजा मूल रूप से 16 दिन तक किए जाने वाली मान्यता से जुड़ी है। पौराणिक कथा के अनुसार, युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से अपना ऐश्वर्य वापस पाने का उपाय पूछा था। तब उन्हें 16 दिन तक व्रत और पूजा करने का सुझाव दिया गया था। इसमें हर दिन जंगली फूल और सब्जियां चढ़ाने की बात कही गई है। आम लोगों के लिए 16 दिनों तक यह अनुष्ठान करना कठिन होने के कारण परंपरा में इसे ढाई दिनों में पूरा किया जाता है। 16 सब्जी और 16 चटनी का महाभोग इस पूजा की खास बात इसका भोग है। एक ही दिन माता को 16 प्रकार की सब्जियां, 16 तरह की चटनियां और उबली हुई रोटियां चढ़ाई जाती हैं। इसके अलावा विशेष नैवेद्य की भी परंपरा है। विश्वजीत कृदत्त के मुताबिक, उनके घर में करोंजी की पापड़ी का फुलौरा बनाकर लटकाया जाता है। मान्यता है कि यदि माता को रात में भूख लगे तो वे इसे निकालकर खाएंगी। रात में शहद मिलाकर दूध भी रखा जाता है। अगले दिन ताजी करोंजी का नैवेद्य चढ़ाया जाता है। अष्टमी के दिन महाभोग के साथ पूजा पूरी श्रद्धा से की जाती है। ‘माता को जितना आदेश मिलता है, उतना ही करते हैं’ विश्वजीत कृदत्त ने बताया कि इस पूजा में शुद्धता और नियमों का विशेष ध्यान रखा जाता है। उन्होंने कहा कि पूजा के दौरान जितना माता का आदेश माना जाता है, उतना ही किया जाता है। समाज के लोग इस उत्सव का पूरे साल इंतजार करते हैं। उनके अनुसार, पूजा के दौरान कई लोगों के लिए भोजन की भी व्यवस्था की जाती है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं। समाज में यह मान्यता भी है कि माता से मांगी गई मन्नतें पूरी होती हैं। विसर्जन के बाद मूर्ति संदूक में रखी जाती है इस परंपरा में विसर्जन का तरीका भी अलग है। नवमी के दिन पूजा के बाद मुकुट हिलाकर मूर्ति को वापस संदूक में रखा जाता है। इसके बाद अगले वर्ष दोबारा उसी परंपरा के अनुसार पूजा की जाती है। समाज के लोगों के मुताबिक, यह परंपरा सिर्फ पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि परिवार और समुदाय को अपनी पुरानी मान्यताओं से जोड़ने का माध्यम भी है। 1739 में धमतरी पहुंचे, 1742 से पूजा की परंपरा विश्वजीत कृदत्त के अनुसार, मराठा समाज के लोग यहां 1739 में आए थे और उनके परिवार में माता की यह पूजा 1742 से होती आ रही है। उनका कहना है कि शुरुआत से अब तक पूजा की मूल परंपरा में आधुनिकता नहीं जोड़ी गई है। इस पूजा को लेकर अलग-अलग जगहों पर इसे महालक्ष्मी या गौरी के नाम से भी जाना जाता है। मराठी परंपरा में इसे ‘गौरी गणपति का सन’ कहा जाता है, यानी ऐसा पर्व जिसमें गणेश और गौरी के साथ आने की मान्यता जुड़ी है। सालभर इंतजार करते हैं परिवार मराठा समाज के परिवार इस उत्सव को लेकर खास उत्साह दिखाते हैं। पूजा के दौरान घरों में पारंपरिक खानपान, नैवेद्य और धार्मिक नियमों का पालन किया जाता है। समाज के लोगों का कहना है कि इस आयोजन से उन्हें अपनी पुरानी परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर मिलता है।
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मराठा समाज के घरों में ढाई दिन की लक्ष्मी पूजा:धमतरी में सदियों पुरानी परंपरा का पालन करते हुए 56 भोग चढ़ाया
