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- Jayti Ghosh Column | Climate Change, Economic Inequality & Development
3 घंटे पहले
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जयती घोष मैसाचुसेट्स एमहर्स्ट यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर
जलवायु-नीतियों के केंद्र में एक विरोधाभास है। दुनिया भर में लोग चाहते हैं कि सरकारें ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए कदम उठाएं। फिर भी, कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में वोटर ऐसी पार्टियों का समर्थन कर रहे हैं, जो जलवायु संकट से या तो इनकार करती हैं या उसकी गम्भीरता को कम करके पेश करती हैं।
यह विरोधाभास गहरी आर्थिक विषमता से उपजा है। इस साल की शुरुआत में जहां एक तरफ इलॉन मस्क ट्रिलियनेयर बने थे, वहीं अर्थ4ऑल के लिए इप्सोस की ओर से किए गए सर्वे में यह भी सामने आया कि दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में 10 में से 4 लोगों को डर था कि अगले 12 महीनों में उनका परिवार बुनियादी जरूरतें पूरी करने लायक भी नहीं रहेगा। निम्न-आय वाले देशों में आर्थिक असुरक्षा की स्थिति तो इससे भी ज्यादा गम्भीर है।
इस आंकड़े के पीछे चार दशकों के अधूरे वादे छिपे हैं। सम्पत्ति का फायदा निचले तबके तक पहुंचने का नव-उदारवादी विजन सिरे नहीं चढ़ पाया है। 2008 के वित्तीय संकट और उसके बाद आए वैश्विक झटकों ने उस व्यवस्था की कमियां भी उजागर कर दीं, जिसमें मुनाफा तो निजी हाथों में जाता है, लेकिन जोखिमों को समाज के सिर डाल दिया जाता है। इसमें भी सबसे ज्यादा कीमत गरीबों को चुकानी पड़ती है। नतीजतन, सरकारों के प्रति अविश्वास और गहरा होता गया।
लेकिन अब वही सरकारें लोगों से अपने इस अश्वासन पर भरोसा करने को कह रही हैं कि इस बार का व्यापक बदलाव पिछले वाले से अधिक न्यायपूर्ण होगा। अर्थ4ऑल का सर्वे आज वैधता के इसी संकट को सामने रखता है। 17 देशों के 13516 लोगों पर यह सर्वे किया गया, जिनमें चीन, रूस और सऊदी अरब को छोड़कर जी20 के सदस्य देश और स्वीडन भी शामिल है।
सर्वे में 70% लोगों ने माना कि उनके देश में आर्थिक असमानता बहुत ज्यादा है, जबकि 65% ने कहा कि आर्थिक व्यवस्था ‘अमीरों और ताकतवर लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए बनाई गई है’। दो-तिहाई से ज्यादा लोग आर्थिक व्यवस्था में बड़े बदलाव चाहते हैं, जबकि सिर्फ 8 फीसदी लोग इससे असहमत हैं।
लोगों के अपने अनुभवों से भी इन जवाबों की पुष्टि होती है और ये तार्किक भी हैं। ऐसी दुनिया में जहां दौलत कुछ लोगों के ही हाथों में सिमट गई है और बड़ी कंपनियां तथा सुपर-रिच लोग नियम-कायदों, कर-व्यवस्था और सरकारी खर्च को अपने फायदे के लिए उपयोग कर लेते हैं।
यह धारणा सही है कि नियम ताकतवर लोगों ने अपने ही फायदे के लिए बनाए हैं। विषमता रचने वाली यह राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था ही सस्ती ऊर्जा, अच्छे रोजगार, सार्वजनिक सेवाएं और जलवायु संकट से निपटने की सरकारों की क्षमता को भी कमजोर करती है।
इसी वजह से क्लाइमेट एक्शन के लिए जनसमर्थन शर्तों पर टिका हुआ है। सर्वे में शामिल देशों में 54% लोग ग्रीनहाउस उत्सर्जन कम करने के लिए सरकार की मजबूत कार्रवाई का समर्थन करते हैं, भले ही इससे कीमतों में उछाल आए।
इनमें अमेरिकी भी शामिल हैं, हालांकि ट्रम्प ने जलवायु संबंधी कई अहम नीतियों को खत्म कर दिया है। लेकिन सभी 17 देशों में निम्न-आय वर्ग और दक्षिणपंथ की ओर झुकाव रखने वाले लोगों के बीच इस समर्थन में गिरावट दिखी है।
जलवायु नीतियां यदि सर्वाधिक उत्सर्जन करने वाले अमीरों के लिए सबकुछ पहले जैसा ही चलते रहने देंगी तो उन्हें सामाजिक और राजनीतिक समर्थन नहीं मिल सकता। सर्वे में 67% लोगों ने कहा कि एक दशक पहले की तुलना में उनका देश अब ज्यादा विभाजित लगता है।
सामाजिक एकजुटता में तेजी से आ रही गिरावट से चुनौती और बढ़ जाती है। राजनीतिक विभाजन तो सबसे ज्यादा दिखाई देता है। इसी तरह उच्च और निम्न आय वर्ग के लोगों के बीच तनाव 63%, प्रवासियों और मूल निवासियों के बीच 62% तथा जलवायु परिवर्तन को लेकर चिंतित और इस पर संदेह करने वाले लोगों के बीच 53% रहा।
ऐसे विभाजित समाजों के लिए सामूहिक फैसले लेना, लागत साझा करना और ऐसी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं को आगे बढ़ाना मुश्किल होता है, जिनका लाभ मिलने में वर्षों या दशकों का समय लग सकता है।
उस व्यवस्था की कमियां उजागर हुई हैं, जिसमें मुनाफा तो निजी हाथों में जाता है, लेकिन जोखिमों को समाज के सिर डाल दिया जाता है। सबसे ज्यादा कीमत गरीबों को चुकानी पड़ती है। सरकारों के प्रति अविश्वास और गहरा होता गया है। (@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)

