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मध्यप्रदेश में विकास परियोजनाओं के लिए जमीन की कमी और वन भूमि के इस्तेमाल के बीच एक नए मॉडल पर काम करने की तैयारी है। इसमें ऐसी सरकारी जमीन, जो रिकॉर्ड में वन भूमि के रूप में दर्ज है, लेकिन मौके पर पेड़-जंगल बहुत कम है, उसे विकास कार्यों के लिए इस्तेमाल करने का रास्ता तलाशा जा रहा है। इसके बदले चंबल क्षेत्र की उपयुक्त राजस्व और बीहड़ जमीन वन विभाग को देने का प्रस्ताव है। इस जमीन पर जंगल विकसित किया जाएगा। इस मॉडल की शुरुआत बैतूल से करने की तैयारी है। जिले में उद्योग और औद्योगिक क्षेत्र विकसित करने के लिए करीब 1500 एकड़ जमीन की जरूरत बताई गई है। उद्योग विभाग के मुताबिक, चिन्हित जमीन का बड़ा हिस्सा वन भूमि में आता है। ऐसे में वन भूमि के बदले चंबल क्षेत्र की उपयुक्त जमीन देने का विचार सामने आया है। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने कहा कि मुख्यमंत्री मोहन यादव और अधिकारियों के साथ करीब एक साल से इस पर चर्चा चल रही है। अब बैतूल से प्रस्ताव तैयार कर आगे भेजने की दिशा में काम किया जा रहा है। हालांकि यह अभी प्रस्ताव के स्तर पर है और इसे लागू करने के लिए तय कानूनी प्रक्रिया और केंद्र की मंजूरी जरूरी होगी। बैतूल में 1500 एकड़ जमीन की जरूरत जिला उद्योग केंद्र के मैनेजर धीरज मंडलेकर के अनुसार वन विभाग को प्रस्ताव देने की तैयारी है और परिवेश पोर्टल पर भी आवेदन किया गया है। उनके मुताबिक, जिले में 8 से 10 बड़ी औद्योगिक इकाइयां निवेश करना चाहती हैं। इनसे करीब 1200 करोड़ रुपए के निवेश की संभावना बताई गई है। वन भूमि होने के कारण जमीन उपलब्ध कराने में दिक्कत आ रही है। इसी वजह से वन भूमि के बदले चंबल की उपयुक्त जमीन ट्रांसफर करने को लेकर चर्चा चल रही है। हेमंत खंडेलवाल का तर्क- एक जमीन से दो काम हो सकते हैं हेमंत खंडेलवाल का कहना है कि बैतूल समेत प्रदेश के कई जिलों में ऐसी जमीन है, जो सरकारी रिकॉर्ड में फॉरेस्ट के नाम से दर्ज है, लेकिन वहां पेड़ों की संख्या बहुत कम है। उनका तर्क है कि स्कूल, मंडी और बांध जैसे विकास कार्यों के लिए जमीन की जरूरत होती है, लेकिन वन भूमि के रिकॉर्ड के कारण उसका इस्तेमाल नहीं हो पाता। ऐसी जमीन को दूसरी उपयुक्त जमीन से बदलने की व्यवस्था हो तो विकास परियोजनाओं के लिए जमीन मिल सकती है। इसी सोच के तहत चंबल क्षेत्र की राजस्व बीहड़ जमीन को वन विभाग के लिए इस्तेमाल करने का प्रस्ताव है। उनका कहना है कि इससे एक तरफ विकास परियोजनाओं के लिए जमीन उपलब्ध हो सकती है और दूसरी तरफ बीहड़ क्षेत्र में जंगल विकसित किया जा सकता है। MP में करीब 6.83 लाख हेक्टेयर बीहड़ क्षेत्र पुराने मध्यप्रदेश विधानसभा के सरकारी रिकॉर्ड में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सॉयल साइंस एंड लैंड यूज प्लानिंग के आंकड़ों के आधार पर प्रदेश में करीब 6.83 लाख हेक्टेयर बीहड़ क्षेत्र बताया गया है। इसमें चंबल और दूसरी नदियों के आसपास करीब 1.82 लाख हेक्टेयर क्षेत्र शामिल है। इसी तरह की जमीन को वनीकरण के लिए इस्तेमाल करने का विचार है। हालांकि बीहड़ जमीन पर गहरी खाइयां और मिट्टी का कटाव होता है। इसलिए किसी जमीन को जंगल विकसित करने के लिए उपयुक्त मानने से पहले उसकी स्थिति, पानी की उपलब्धता और लंबे समय तक पौधों को बचाने की संभावना देखना जरूरी होगा। पेड़ कम होने से वन भूमि का दर्जा खत्म नहीं होता इस प्रस्ताव में सबसे महत्वपूर्ण सवाल जमीन की कानूनी स्थिति का है। किसी जमीन पर पेड़ कम होने या जंगल दिखाई नहीं देने से उसका वन भूमि का कानूनी दर्जा अपने आप खत्म नहीं हो जाता। सुप्रीम कोर्ट के टीएन गोदावर्मन मामले में वन की परिभाषा और रिकॉर्ड में दर्ज वन भूमि को लेकर कई निर्देश दिए गए हैं। मध्यप्रदेश में भी छोटे झाड़ और बड़े झाड़ के जंगल जैसी श्रेणियों में दर्ज जमीनें वन रिकॉर्ड में शामिल हैं। इसलिए अगर ऐसी जमीन का इस्तेमाल गैर-वन कार्य के लिए करना है तो निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा। वन भूमि के डायवर्जन के लिए केंद्र की मंजूरी भी जरूरी हो सकती है। सिर्फ जमीन बदलना काफी नहीं, वनीकरण की शर्त भी जरूरी चंबल की जमीन वन विभाग को देने का मतलब सिर्फ जमीन का रिकॉर्ड बदलना नहीं होगा। जिस जमीन को जंगल विकसित करने के लिए दिया जाएगा, उसकी उपयुक्तता भी देखनी होगी। बीहड़ क्षेत्र में मिट्टी का कटाव और गहरी खाइयां बड़ी चुनौती हैं। इसलिए वहां पौधरोपण के साथ उन्हें लंबे समय तक बचाने की व्यवस्था भी जरूरी होगी। इसके अलावा जमीन का मालिकाना हक, वनीकरण की शर्तें और संबंधित परियोजना के लिए क्षतिपूर्ति वनरोपण की प्रक्रिया भी देखनी होगी। DFO बोले- अभी औपचारिक प्रस्ताव नहीं मिला उत्तर वन मंडल के DFO नवीन गर्ग के मुताबिक, अभी उनके पास इस संबंध में कोई औपचारिक प्रस्ताव नहीं आया है। फिलहाल यह योजना और जमीन के चयन के स्तर पर है। उनके मुताबिक, उद्योग विभाग की ओर से जमीन का चयन और प्रस्ताव आने के बाद ही वन विभाग उसे तय प्रक्रिया के अनुसार देखेगा। जरूरत पड़ने पर मामला सुप्रीम कोर्ट की इंपावरमेंट कमेटी तक भी जा सकता है। नियमों के अनुसार प्रस्ताव आने पर ही आगे की स्थिति स्पष्ट होगी। भिंड में बीहड़ जमीन के इस्तेमाल का उदाहरण मध्यप्रदेश में बीहड़ जमीन को वनीकरण के लिए इस्तेमाल करने के उदाहरण पहले भी सरकारी स्तर पर सामने आए हैं। भिंड जिले में अलग-अलग परियोजनाओं के लिए वन मंजूरी से जुड़े रिकॉर्ड में कई गांवों की जमीन को क्षतिपूर्ति वनरोपण के लिए चिन्हित किया गया है। इससे यह पता चलता है कि बीहड़ और राजस्व जमीन पर जंगल विकसित करने का विचार पहले भी सरकारी प्रक्रियाओं में इस्तेमाल हुआ है। हालांकि बैतूल की वन भूमि के बदले चंबल की जमीन देने का प्रस्ताव तभी आगे बढ़ सकेगा, जब जमीन की कानूनी स्थिति और सभी जरूरी शर्तें पूरी होंगी। प्रस्ताव पास हुआ तो दूसरे जिलों में भी हो सकता है इस्तेमाल फिलहाल बैतूल का यह मॉडल अंतिम रूप से मंजूर योजना नहीं है। अभी उद्योगों के लिए जमीन की जरूरत और वन भूमि से जुड़ी समस्या को देखते हुए प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है। यदि प्रस्ताव को कानूनी और पर्यावरणीय मंजूरी मिलती है और चंबल की जमीन वनीकरण के लिए उपयुक्त पाई जाती है, तो भविष्य में इसी तरह के मॉडल पर दूसरे जिलों में भी विचार किया जा सकता है। इस पूरे प्रस्ताव की असली परीक्षा यही होगी कि विकास के लिए जमीन उपलब्ध कराने के साथ वन भूमि के कानूनी नियमों और जंगल विकसित करने की शर्तों का कितना पालन होता है। एक तरफ बैतूल में उद्योगों के लिए जमीन मिलने की उम्मीद है, तो दूसरी तरफ चंबल के बीहड़ों में जंगल विकसित करने की योजना है।
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बैतूल की वन भूमि के बदले चंबल में जमीन मिलेगी:उद्योगों के लिए 1500 एकड़ की जरूरत, वनभूमि में लगाए जाने का प्रस्ताव
