राजस्थान के निकाय चुनाव में इस बार सिर्फ बोर्ड नहीं बदले, वार्डों में चेहरों की उम्र भी बदली है। राज्य के अलग-अलग हिस्सों में कई Gen-Z जीतकर पार्षद बने हैं।
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Gen-Z यानी जिनकी उम्र 29 साल या इससे कम है। सीएम भजनलाल, डिप्टी सीएम दीया कुमारी व राज्यवर्धन सिंह राठौड़ के इलाके से रिकॉर्ड तोड़ जेन-जी जीते हैं।
पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट और कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद डोटासरा के गढ़ और निर्दलीय विधायक रवींद्र भाटी के इलाके में भी Gen-Z की ताकत दिखी।
अब सवाल यह है कि यह मौजूदगी कितनी बड़ी है? क्या यह सिर्फ पार्षद स्तर तक सीमित है या निकाय प्रमुखों तक भी पहुंची है? और क्या इसे राजस्थान की स्थानीय राजनीति में उभरते पीढ़ीगत बदलाव के तौर पर देखा जाना चाहिए?
जानेंगे आज के राजस्थान एक्सप्लेनर में इन्हीं सवालों के जवाब…
सवाल-1: इस बार निकाय चुनाव में Gen-Z की एंट्री चर्चा में क्यों है?
जवाब: इसकी 3 प्रमुख वजहें हैं:
कई जगह बहुत कम उम्र के चेहरे जीते हैं: निकाय चुनावों में आमतौर पर अनुभवी, स्थानीय रूप से जमे हुए या पारिवारिक नेटवर्क वाले चेहरे मजबूत माने जाते हैं। ऐसे में कम उम्र के उम्मीदवारों का जीतना अपने आप में बड़े बदलाव का संकेत है।
यह एक-दो शहरों तक सीमित नहीं दिखता: चाहे कांग्रेस के असर वाले इलाके हों या बीजेपी/क्षेत्रीय प्रभाव वाले, हर जगह युवा चेहरे जीतकर आए हैं।
युवा अब ‘राजनीति का भविष्य’ नहीं, ‘मौजूदा उपस्थिति’ बनते दिख रहे हैं: राजनीति में युवाओं की बात अक्सर आने वाले समय के रूप में होती है, लेकिन इस बार वे सीधे नतीजों में दिख रहे हैं।

सवाल-2: प्रदेश में कितने Gen-Z पर जनता ने जताया भरोसा?
जवाब: निकाय चुनाव में इस बार प्रदेश की जनता ने जेन-जी पर जमकर भरोसा जताया। स्थानीय चुनाव होने के कारण जनता ने पार्टियों से ज्यादा चेहरों पर भरोसे की मुहर लगाई है। फिर चाहे बात अपने वार्ड की हो या शहरी सरकार के मुखिया पद की। इसे दो स्तरों पर समझा जा सकता है:
1. कितने Gen-Z पार्षद चुने गए: राजस्थान में 10,244 पार्षदों के लिए चुनाव हुए। इनमें से 1094 (यानी कुल 10.68 प्रतिशत) जेन-जी पार्षद चुनाव जीतकर निकायों में पहुंचे हैं। वहीं 30 साल तक की उम्र के पार्षदों की कुल संख्या 1388 है, जो कुल पार्षदों का 13.55 फीसदी है।
जिलेवार स्थिति: इस उम्र के सर्वाधिक 73 पार्षद झुंझुनूं जिले से जीतकर आए, जबकि सबसे कम 3 पार्षद सलूंबर जिले से रहे।
शून्य उपस्थिति वाले निकाय: 5 नगर निकायों में 30 साल से कम उम्र का एक भी पार्षद चुनाव जीतकर नहीं आया। इनमें चूरू जिले की साहवा नगर पालिका, नागौर जिले की मेड़ता सिटी, पाली जिले की रानीखुर्द व सुमेरपुर, और सिरोही जिले की मंडार नगर पालिका शामिल हैं।
निर्विरोध युवा चेहरे: सीकर जिले की रामगढ़ शेखावाटी नगर पालिका से कांग्रेस की 22 वर्षीय सोफिया सबसे कम उम्र की निर्विरोध पार्षद निर्वाचित हुईं। इनके अलावा नागौर जिले की बासनी नगर पालिका से 23 साल की मोना बानो, डीग जिले की पहाड़ी नगर पालिका से 24 साल की पिंकी कुमारी और 29 साल की साबरिन भी निर्विरोध पार्षद निर्वाचित हुईं।

2. कितने Gen-Z निकाय प्रमुख चुने गए: प्रदेश में 15 जेन-जी सभापति और पालिका चेयरमैन चुने गए हैं। इनमें सबसे कम उम्र की निकाय प्रमुख यांशिका मेवाड़ा हैं, जो झालावाड़ जिले की अकलेरा नगर पालिका की चेयरमैन बनी हैं।
प्रदेश के 19 निकायों में प्रमुखों की उम्र 30 साल या उससे कम है:
एक-एक निकाय प्रमुख वाले जिले: अजमेर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, दौसा, धौलपुर, जैसलमेर, झालावाड़, करौली, नागौर, प्रतापगढ़, सीकर, टोंक और उदयपुर।
दो-दो निकाय प्रमुख वाले जिले: जयपुर, झुंझुनूं और जोधपुर।

सवाल-3: पायलट-डोटासरा के जिलों से लेकर दीया कुमारी-रवींद्र सिंह भाटी के क्षेत्रों तक Gen-Z की कितनी रही मौजूदगी? जवाब: इस बार निकाय चुनावों में टिकट वितरण से पूर्व जेन-जी को लेकर खूब चर्चा रही। भाजपा और कांग्रेस सहित कई बड़ी पार्टियों ने युवाओं को मौका देने की बात कही थी। दिग्गजों के सियासी गढ़ और उनके जिलों में जेन-जी पार्षदों के आंकड़े इस प्रकार हैं:

सीएम भजनलाल शर्मा के गृहजिले भरतपुर में 23 और डिप्टी सीएम दीया कुमारी व राज्यवर्धन राठौड़ के गृह जिले जयपुर में 57 जेन-जी पार्षद बने।
भजनलाल शर्मा (गृह जिला – भरतपुर): भरतपुर जिले में 30 साल तक के 26 युवा पार्षद बनकर निकायों में पहुंचे हैं, जिनमें से 23 पार्षद जेन-जी हैं।
दीया कुमारी व राज्यवर्धन सिंह राठौड़ (जयपुर): जयपुर जिले में 30 साल तक के 70 युवा पार्षद चुनकर आए हैं, जिनमें से 57 पार्षद जेन-जी हैं।
गोविंद सिंह डोटासरा (लक्ष्मणगढ़/सीकर): सीकर जिले में 30 साल तक के 49 युवा पार्षद बनकर निकायों में पहुंचे हैं, जिनमें से 40 पार्षद जेन-जी हैं।
सचिन पायलट (टोंक): टोंक जिले में 30 साल तक के 52 युवा पार्षद बने हैं, जिनमें से 40 पार्षद जेन-जी हैं। टोंक नगर परिषद के नए सभापति मयंक गोयल भी मात्र 24 साल के हैं।
रवींद्र सिंह भाटी (शिव/बाड़मेर): शिव विधानसभा क्षेत्र ग्रामीण इलाका होने के कारण भले ही वहां निकाय न हों, लेकिन उनके गृह जिले बाड़मेर से 29 साल तक के 12 जेन-जी पार्षद चुनकर आए हैं।
कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के गृह जिले सीकर व सचिन पायलट के गृह जिले टोंक में 40-40 जेन-जी पार्षद बने।

सवाल-4: निकाय चुनाव में कम उम्र के उम्मीदवारों की जीत को इतना अहम क्यों माना जा रहा है? जवाब: क्योंकि स्थानीय निकाय की राजनीति आसान नहीं मानी जाती। इसके 3 बड़े कारण हैं:
स्थानीय नेटवर्क का प्रभाव: वार्ड स्तर पर पहचान, पहुंच और लगातार मौजूदगी जरूरी होती है। कम उम्र में यह राजनीतिक पूंजी बनाना आसान नहीं होता।
सीधा और व्यक्तिगत मुकाबला: वार्ड चुनाव होने के कारण लोग उम्मीदवार, उसके परिवार और उसकी सक्रियता को व्यक्तिगत रूप से जानते हैं। ऐसे में जीत मिलना जनता की सीधी स्वीकार्यता दिखाता है।
भविष्य की राजनीति का आधार: स्थानीय निकाय अक्सर राजनीतिक करियर की पहली निर्वाचित सीढ़ी साबित होते हैं। इसलिए यहां युवाओं की जीत को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
सवाल-5: इस पूरी तस्वीर से क्या बड़ा ट्रेंड निकलता है? जवाब: राजस्थान निकाय चुनाव के नतीजे यह दिखाते हैं कि जेन-जी की मौजूदगी अब केवल अपवाद या इक्का-दुक्का उदाहरण नहीं रह गई है। पार्षदों और निकाय प्रमुखों-दोनों स्तरों पर नई पीढ़ी की मजबूत संख्या स्थानीय राजनीति में एक उभरते पीढ़ीगत बदलाव का स्पष्ट संकेत है। हालांकि, इसका अंतिम निष्कर्ष इस बात से तय होगा कि ये युवा प्रतिनिधि अपने कार्यकाल में क्या और कितना बदलाव ला पाते हैं।
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