4 घंटे पहलेलेखक: आशीष तिवारी
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निर्देशक पद्मकुमार, सिद्धार्थ मेनन और विधात्री बंदी ने दैनिक भास्कर से बातचीत में कमिटमेंट, थेरेपी और मानसिक स्वास्थ्य पर बात की।
‘रिश्ते निभाने से ज्यादा जरूरी उन्हें समझना है’- यही सोच फिल्म ‘मैक्स, मिन एंड म्याउजाकी’ की कहानी के केंद्र में है। यह फिल्म प्यार और बिछड़ने के साथ मानसिक स्वास्थ्य, अकेलेपन, रिश्तों में संवाद, कमिटमेंट और खुद से जुड़ने जैसे विषयों पर बात करती है।
निर्देशक पद्मकुमार नरसिम्हामूर्ति, अभिनेता सिद्धार्थ मेनन और अभिनेत्री विधात्री बंदी ने दैनिक भास्कर से बातचीत में फिल्म, रिश्तों की चुनौतियों, थेरेपी और रिजेक्शन के बीच मानसिक संतुलन पर बात की।

डायरेक्टर पद्मकुमार नरसिम्हामूर्ति कहते हैं कि हिट फिल्म नहीं, मतलब वाली कहानी बनाना उनका मकसद था।
सवाल: आपकी फिल्म रिश्तों के भावनात्मक उतार-चढ़ाव और अकेलेपन को संवेदनशील तरीके से दिखाती है। इस कहानी तक पहुंचने का सफर कैसा रहा?
जवाब (पद्मकुमार): इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि मुझे कहानी कहने की पूरी आजादी मिली। निर्माता ने कोई दबाव नहीं बनाया। उन्होंने भरोसा जताया कि जैसी कहानी मैं कहना चाहता हूं, उसे उसी रूप में पर्दे पर लाऊं। शायद इसी वजह से फिल्म अपनी मूल भावना के साथ दर्शकों तक पहुंच सकी।
सवाल: आज जब ज्यादातर फिल्में ट्रेंड को ध्यान में रखकर बनती हैं, तब आपने अलग रास्ता क्यों चुना?
जवाब (पद्मकुमार): विज्ञापन जगत में लंबे समय तक काम करने के बाद मुझे एहसास हुआ कि फिल्म सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं होनी चाहिए। मैं ऐसी कहानियां कहना चाहता हूं, जो देखने के बाद लोगों के भीतर कुछ छोड़ जाएं। मेरे लिए फिल्म का असर उसकी कमाई से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

एक्टर सिद्धार्थ मेनन कहते हैं कि फिल्म की कहानी ने उन्हें बेहतर इंसान बनने का एहसास कराया।
सवाल: इस कहानी ने आपको कलाकार के तौर पर सबसे ज्यादा किस बात से प्रभावित किया?
जवाब (सिद्धार्थ): जब मैंने पूरी स्क्रिप्ट सुनी तो लगा कि यह सिर्फ फिल्म नहीं, एक अनुभव है। कहानी सुनते-सुनते ही मुझे महसूस हुआ कि यह इंसान को भीतर से बेहतर बनने के लिए प्रेरित करती है। अच्छी कहानियां हमेशा इंसान के साथ लंबे समय तक रहती हैं।
सवाल: आपको इस फिल्म से जुड़ने का फैसला किस बात ने कराया?
जवाब (विधात्री): किरदार का छोटा-सा परिचय पढ़ते ही मैंने तय कर लिया था कि मौका मिला तो यह फिल्म जरूर करूंगी। बाद में पूरी कहानी सुनते हुए मैं भावुक हो गई। मुझे लगा कि यह फिल्म लोगों को अपने रिश्तों और खुद के बारे में सोचने पर मजबूर करेगी।
सवाल: आपके मुताबिक रिश्ते टूटने की सबसे बड़ी वजह क्या होती है?
जवाब (सिद्धार्थ): मेरे हिसाब से रिश्ता खत्म होना गलत नहीं है, बल्कि मायने यह रखता है कि आप उससे बाहर कैसे निकलते हैं। रिश्ते में दोनों लोगों की ग्रोथ उतनी ही जरूरी है जितनी साथ रहना। जरूरत पड़े तो बातचीत करें, थेरेपी लें और अलग होना पड़े तो सम्मान के साथ अलग हों।
सवाल: आज ‘सिचुएशनशिप’ और ‘बेंचिंग’ जैसे शब्द आम हो गए हैं। क्या नई पीढ़ी कमिटमेंट से बचती है?
जवाब (विधात्री): मुझे ऐसा नहीं लगता। आज के युवा पहले खुद को समझना चाहते हैं। जब उन्हें अपने बारे में स्पष्टता मिलती है, तब वे रिश्तों में ज्यादा ईमानदारी से आते हैं। अगर रिश्ता सही लगे तो कमिटमेंट करने में कोई डर नहीं होना चाहिए।
सवाल: क्या आप भी मानते हैं कि आज के युवा रिश्तों से भाग रहे हैं?
जवाब (सिद्धार्थ): बिल्कुल नहीं। मैंने कम उम्र में शादी करने वाले और लंबे रिश्तों के बाद अलग होने वाले भी देखे हैं। किसी एक अनुभव के आधार पर पूरी पीढ़ी को जज नहीं किया जा सकता। जरूरी यह है कि रिश्ता खत्म होने के बाद भी सम्मान बना रहे।

फिल्म ‘मैक्स, मिन और म्याउजाकी’ 24 जुलाई 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होगी।
सवाल: विदेशों में फिल्म दिखाने के दौरान कौन-सी प्रतिक्रिया आपके लिए सबसे यादगार रही?
जवाब (पद्मकुमार): कई लोगों ने कहा कि यह उन चुनिंदा भारतीय फिल्मों में है, जिसमें पुरुष किरदार अपनी भावनाओं को दबाते नहीं हैं। वे संवेदनशील हैं और अपनी कमजोरी स्वीकार करने से नहीं डरते। यह प्रतिक्रिया मेरे लिए बेहद खास रही।
सवाल: क्या इस सोच के पीछे आपका कोई निजी अनुभव भी रहा?
जवाब (पद्मकुमार): कुछ समय पहले मैंने अपने बेहद करीबी दोस्त को खो दिया। बाहर से वह हमेशा खुश नजर आते थे, लेकिन भीतर कितना दर्द था, इसका किसी को अंदाजा नहीं था। तभी महसूस हुआ कि पुरुषों को भी अपनी भावनाएं खुलकर व्यक्त करनी चाहिए।
सवाल: आज के समय में संवेदनशील कहानियां कितनी जरूरी हैं?
जवाब (पद्मकुमार): दुनिया में नफरत और हिंसा बढ़ रही है। ऐसे दौर में फिल्मों की जिम्मेदारी सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। कहानियां लोगों को इंसानियत, करुणा और एक-दूसरे के प्रति संवेदनशील होने की याद दिला सकती हैं।
सवाल: मुश्किल दौर से निकलने में अपनों का साथ कितना मायने रखता है?
जवाब (पद्मकुमार): मजबूत सपोर्ट सिस्टम बहुत जरूरी है। ऐसे लोग होने चाहिए, जिनसे आप खुलकर बात कर सकें। साथ ही जिंदगी को सकारात्मक नजरिए से स्वीकार करना भी जरूरी है। अच्छे रिश्ते ही इंसान की सबसे बड़ी ताकत होते हैं।

अभिनेत्री विधात्री बंदी कहती हैं कि रिजेक्शन रोज मिलता है, इसलिए मजबूत सपोर्ट सिस्टम जरूरी है।
सवाल: लगातार मिलने वाले रिजेक्शन के बीच मानसिक संतुलन कैसे बनाए रखती हैं?
जवाब (विधात्री): इस इंडस्ट्री में रिजेक्शन रोज का हिस्सा है। ऐसे में परिवार और दोस्तों का साथ बहुत जरूरी हो जाता है। समय के साथ मैंने सीखा है कि हर किसी को अपनी जिंदगी में जगह देना जरूरी नहीं होता। अपनी मानसिक शांति की रक्षा करना भी उतना ही अहम है।
सवाल: क्या आपने कभी प्रोफेशनल मदद यानी थेरेपी ली है?
जवाब (सिद्धार्थ): हां, मैंने थेरेपी ली है और इसका फायदा भी महसूस किया है। मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल उतनी ही जरूरी है, जितनी शारीरिक स्वास्थ्य की।
सवाल: दर्शकों के लिए आपका अंतिम संदेश?
जवाब (पद्मकुमार): हमारी कोशिश सिर्फ एक फिल्म बनाने की नहीं थी, बल्कि ऐसी कहानी कहने की थी जो लोगों के दिल तक पहुंचे और उन्हें थोड़ा बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा दे।
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