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पिछली कड़ियों में हमने देखा कि हिंदू आख्यानों में प्राणियों की भूमिका केवल देवी-देवताओं के वाहनों तक सीमित नहीं है। वे उनके स्वभाव, शक्तियों और उनसे जुड़े विचारों के प्रतीक भी बनते हैं। किसी प्राणी में एकाग्रता दिखाई देती है तो कोई विवेक का प्रतीक बनता है। कहीं वह शक्ति और पौरुष को दर्शाता है तो कहीं मनुष्य की अपनी कमजोरियों की ओर संकेत करता है। इस शृंखला के अंतिम लेख में हम कुछ और प्राणियों और उनसे जुड़े प्रतीकों के बारे में जानेंगे। अग्निदेव का वाहन मेढ़ा है। लोक धर्मों में गर्दभ (गधा) ज्वर की देवी का वाहन माना जाता है। दक्षिण कर्नाटक के जनजातीय धर्मों में देवताओं को वराह पर सवार दिखाया जाता है। इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण विष्णु के वराह अवतार का है, जिसमें वे पृथ्वी को समुद्रतल से अपने दांतों पर सुरक्षित बाहर ले आते हैं। दूसरी ओर, चंद्र का वाहन मृग माना जाता है। नेपाल के हिंदू धर्म में चंद्र को हंसों द्वारा खींचे गए रथ पर दिखाया जाता है। विद्या की देवी सरस्वती को सारस के साथ जोड़ा जाता है। सारस लंबे समय तक एक पैर पर संतुलित रहकर मछलियां पकड़ते हैं और इसलिए उन्हें एकाग्रता का प्रतीक माना जाता है। सरस्वती और ब्रह्मा दोनों राजहंस से भी जुड़े हैं। इसका कारण यह बताया जाता है कि राजहंस जल में तैरते हैं, लेकिन इसके बावजूद जल उसके शरीर से चिपकता नहीं है। इस प्रकार, वह तटस्थता का प्रतीक है। साथ ही वह ऋषि का भी प्रतीक है, जो संसार से जुड़े रहने के बावजूद उससे तटस्थ रहते हैं। कुछ विद्वानों ने तर्क दिया है कि राजहंसों को सरस्वती और ब्रह्मा के साथ केवल आधुनिक काल के पोस्टरों में जोड़ा जाने लगा है। परंपरागत प्रतिमाओं में वे हंस से जुड़े हैं। हंस में दूध और पानी के मिश्रण को अलग करने की जादुई क्षमता मानी जाती थी। इस रूपक के माध्यम से मानवीय मन के विवेक की ओर ध्यान आकर्षित किया गया। सरस्वती मोर से भी जुड़ी हैं। हालांकि यह मुख्यतः कैलेंडरों के चित्रों में पाया जाता है, न कि परंपरागत चित्रों में। अधिकांश मोरों के विपरीत, यह मोर अपने पंख नहीं फैलाता। इस प्रकार, उसे सरस्वती की उस विनम्रता का प्रतीक माना जा सकता है, जो उनकी प्रज्ञा से उत्पन्न हुई है। देवताओं के सेनापति और शिव-पुत्र कार्तिकेय भी मोर पर सवार दिखाए जाते हैं। लेकिन उनका मोर अपने सुंदर पंख फैलाए नजर आता है। यह पौरुष गर्व का संकेतक है, जिसके कार्तिकेय प्रतीक हैं। कार्तिकेय मंगल ग्रह के स्वामी भी हैं। उनके ध्वज पर मुर्गे का चिह्न है। यह भी पौरुष गर्व का प्रतीक है। उधर, गुजरात की बहुचरा माता भी मुर्गे पर सवार दिखाई जाती हैं। कार्तिकेय के भाई गणेश की सवारी एक मूषक है। हालांकि कुछ लोग मानते हैं कि वह मूषक नहीं, बल्कि घूस है (चूहे का एक प्रकार)। मूषक उन कष्टकारी समस्याओं का प्रतीक है, जिनका सभी को सामना करना पड़ता है और जिन्हें गणेश वश में कर लेते हैं। गणेश अपने पेट पर नाग को लपेटे रहते हैं। फन वाला नाग हिंदू आख्यानों में सबसे प्रसिद्ध रेंगने वाले प्राणियों में से एक है। अपना फन उठाए हुए वह स्थिरता का प्रतीक है। नागों का हिंदू ब्रह्मांडशास्त्र में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। नाग-लोक नामक एक संपूर्ण लोक और उसमें मणियों से जड़ा नगर ‘भोगवती’ उन्हें समर्पित हैं। वासुकि उनके राजा हैं और लोग सर्पदंश से बचने के लिए उनकी बहन मनसा देवी की पूजा करते हैं। कर्कोटक नामक फन वाला नाग शिव के गले में लिपटा होता है। विष्णु आदि शेष नामक नाग की कुंडलियों पर लेटे हुए दिखाए जाते हैं। कई फनों वाले आदि शेष समय के प्रतीक माने जाते हैं। मकर जैसे मिश्रित प्राणी हिंदू आख्यानों में बहुधा पाए जाते हैं। बुध ग्रह यली पर सवार होते हैं, जिसका शरीर शेर का और सिर गज का होता है। गौ-देवी ‘सुरभि’ को कभी-कभार पंखों सहित चित्रित किया जाता है। धन के देवता कुबेर उन देवताओं में हैं, जो सबसे विकसित प्राणी यानी मनुष्य पर सवार होते हैं। और शायद यह उचित भी है, क्योंकि कुबेर हमें याद दिलाते हैं कि कैसे मनुष्य धन का दास बन गया है।
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रसरंग में मायथोलॉजी:मोर से मूषक तक, देवताओं के साथ जुड़े प्राणियों के अनूठे अर्थ
