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चार दशक पहले जब मैंने मुंबई के नरीमन पॉइंट स्थित फ्री-प्रेस हाउस से कॅरिअर की शुरुआत की और पहली बार पत्रकारिता से जुड़ा तो एक बात मुझे हमेशा आकर्षित करती थी। जब भी मैं लंच के बाद एडिटर से मिलने जाता तो उनका सेक्रेटरी कहता कि ‘सर आराम कर रहे हैं, 15 मिनट बाद आइए।’ एडिटर की कुर्सी के पीछे एक सोफा था, जहां वे एक छोटी झपकी लेते थे। निर्धारित 15 मिनट बाद जब मैं केबिन में जाता तो मुझे एक खुशमिजाज, मुस्कराते चेहरे वाला व्यक्ति दिखता। उन कुछ पलों में वे सख्त एडिटर जैसे नहीं दिखते थे, जो हमारे लिखे हर शब्द को चेहरे पर एक खास सख्ती के साथ देखते थे। बहुत समय बाद में मुझे इन शॉर्ट-ब्रेक्स की अहमियत समझ आई। जब मैंने एक डॉक्टर का इंटरव्यू किया तो उन्होंने समझाया कि कैसे झपकी लेना फायदेमंद हो सकता है। उन्होंने कहा कि इन झपकियों को विटामिन सप्लीमेंट की एक क्विक-डोज मानिए, जो नींद में होने वाली कई सकारात्मक बायोलॉजिकल प्रोसेस को सक्रिय करती है। बॉम्बे- जिसे अब मुंबई कहते हैं- की लोकल ट्रेनों में सफर करते हुए मैंने झपकी की अहमियत को नोटिस करना शुरू किया। जैसे ही चलती ट्रेन में हवा यात्रियों के चेहरे पर लगती है, आप उन्हें नींद लेते हुए देख सकते हैं। खासकर, जब वे सुबह काम पर जाते हैं। और फिर सबसे देखने काबिल बात होती है कि जैसे ही ट्रेन उनके स्टेशन पर धीमी होने लगती है, चंद सेकंड पहले ही वे अचानक जागते हैं और खरगोश जैसी फुर्ती से उतर जाते हैं- मानो पूरे समय जाग रहे थे। इस हफ्ते की शुरुआत में मुझे ये दृश्य तब याद आए, जब मैंने कनाडा की मैकगिल यूनिवर्सिटी में हुए एक शोध के बारे में पढ़ा। इसमें पाया गया कि अगर किसी व्यक्ति को रातभर जागने की जरूरत हो तो 90 मिनट की झपकी मेमोरी परफॉर्मेंस को बहुत बढ़िया हद तक बनाए रखने में मदद कर सकती है। यह झपकी दिमाग को ऐसी अवस्था में पहुंचा देती है, जो नई जानकारी एब्सॉर्ब करने के लिए अनुकूल होती है। यह निष्कर्ष खासकर उन छात्रों के लिए प्रासंगिक है, जो रातभर पढ़ने के लिए नियमित अपनी नींद कुर्बान करते हैं। एक छोटी और सही समय पर ली गई झपकी शायद समय की बर्बादी नहीं है। यही वो ब्रेक हो सकता है, जो दिमाग को ताजा सीखी गई चीजों को याद रखने में और अधिक चुस्ती के साथ काम पर लौटने में मददगार हो। शोध कहता है कि अलर्टनेस बढ़ाने के लिए 20 मिनट आंखें मूंदना पर्याप्त है। लंबी झपकी मेमोरी बढ़ा सकती है और छोटी झपकी मूड बेहतर कर सकती है। इन फायदों के बावजूद सभी को झपकी लेने की सलाह नहीं दी जाती। चूंकि झपकी दिन में हमारे भीतर बनने वाली नींद की जरूरत को कम कर देती है, इसलिए यह रात की नींद पर असर डाल सकती है। क्रॉनिक इन्सोम्निया के मामले में झपकी स्थिति को और बिगाड़ सकती है। अगर आप लगातार दिन में उनींदापन महसूस करते हैं तो यह किसी स्वास्थ्य समस्या का संकेत हो सकता है। वहीं, उम्रदराज लोगों पर हुए अध्ययन बताते हैं कि दोपहर की नींद से आम तौर पर रात की नींद में कोई नुकसान नहीं होता। नाइट शिफ्ट में काम करने वाले लोगों, छोटे बच्चों के पैरेंट्स और अलग-अलग टाइम जोन में यात्रा करने वाले लोगों को झपकी से काफी फायदा हो सकता है। झपकी उस प्रेशर जैसी है, जिसमें अकसर हम अपने-आप नींद में चले जाना महसूस करते हैं। यह तय समय पर होने वाली प्लान्ड एक्टिविटी नहीं हो सकती। कुल मिलाकर, अगर आपको इन्सोम्निया नहीं है तो झपकियां नेचुरल ब्रेन एंड बॉडी बूस्टर हैं, जो आपको सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने में मदद कर सकती हैं- जैसे मुंबई लोकल का यात्री। लेकिन वही यात्री घर लौटते समय कभी नहीं सोता, क्योंकि वह जानता है कि इससे वह सोने के समय तक नींद की पर्याप्त जरूरत नहीं बना पाएगा। इसीलिए टाइमिंग महत्वपूर्ण है। दोपहर में हमें स्वाभाविक रूप से नींद आती है, जिसे लोग ‘पोस्ट-लंच डिप’ कहते हैं। फंडा यह है कि छोटी झपकियां अच्छी हैं, अगर वह आपकी चुस्ती और परफॉर्मेंस को बढ़ाती हैं। लेकिन अगर ऐसा बहुत ज्यादा होने लगे तो यह स्वास्थ्य समस्या के लक्षण भी हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में मेडिकल एडवाइज जरूरी है।
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एन. रघुरामन का कॉलम:छोटी झपकी अच्छी है, लेकिन इसकी अधिकता स्वास्थ्य समस्या का संकेत है
