उत्तर प्रदेश के कानपुर का एक मोहल्ला। दिवाली के ठीक अगले दिन। शोर शांति में तब्दील हो चुका था। सुबह करीब 5 बजे कुछ औरतें टहल रही थीं। अचानक उनकी निगाह औंधे मुंह पड़ी 6-7 साल की एक बच्ची पर पड़ी। खून से लथपथ। बदन पर कोई कपड़ा नहीं था।
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औरतें चीख पड़ीं। उनमें से एक चिल्लाई- ‘ये तो प्रिया है, रमा की बेटी!’ रात को इसकी मां इसे ढूंढ रही थी।
चंद मिनटों में ये बात पूरे इलाके में फैल गई। लोग दौड़े-दौड़े आने लगे। इन्हीं में एक थी प्रिया की मां रमाबाई। वो जैसे ही प्रिया को उठाने आगे बढ़ी, औरतों ने पकड़ लिया। कहने लगीं- पुलिस को आ जाने दो।
कुछ देर में पुलिस पहुंची। जैसे ही बच्ची का शव सीधा किया गया, सभी सहम गए। बच्ची का पेट किसी धारदार हथियार से काटा गया था। किडनी, कलेजा नोच लिए गए थे।
जुबान और नाक कटी हुई थी। आंखें फोड़ दी गई थीं। जैसे किसी जानवर ने पूरे शरीर को नोचा हो। शरीर के निचले हिस्से से भी खून बह रहा था।
पुलिस समझ चुकी थी कि बच्ची से रेप हुआ है।
आज के ब्लैकबोर्ड में एक ऐसी औरत और गांव वालों का स्याह पहलू जिन्हें अब किसी पर भी विश्वास नहीं है…
जिस महिला की बेटी के साथ ये सब हुआ, उसके दो बच्चों समेत पूरे मोहल्ले के बच्चे छह साल से एक-दूसरे के घर जाना छोड़ चुके हैं।
रमाबाई बताती हैं- मैं शादी होकर इसी घर में आई थी। पड़ोस में सुनीता और परम रहते थे। उनके बच्चे नहीं थे। जब मेरी बड़ी बेटी हुई तो सुनीता सारा दिन मेरे घर पर ही बैठी रहती थी। उसकी देखभाल करती थी। फिर कुछ साल बाद छोटी बेटी हुई प्रिया।

रमाबाई जब अपनी बेटी की दास्तां सुना रही थीं, तो उनके हाथों में प्रिया की तस्वीर थी। वे बार-बार तस्वीर को पोछ रही थीं, जैसे उसे छूकर बेटी को महसूस कर रही हों।
एक साथ दो बच्चे और घर का काम संभालना मुश्किल हो गया था, लेकिन सुनीता ने मेरी हमेशा मदद की। कभी बच्चों के चक्कर में खाना बनाने में देर हो जाती तो वो मेरे घर आकर खाना बना देती। कभी बच्चों को नहलाकर तैयार कर देती।
जब मेरा बेटा हुआ तो मुश्किलें और बढ़ गईं। तब सुनीता ने कहा- ‘प्रिया की चिंता मत करो, मैं रात में भी उसे अपने घर पर ही सुला लूंगी। तुम बेटे का ध्यान रखो।’ वो थी तो मेरी पड़ोसन, लेकिन रिश्ता एकदम बहन जैसा हो गया था।
कई बार ऐसा हुआ कि प्रिया खेलते-खेलते अक्सर उसी के घर सो जाती थी। मैं उसे लेने भी नहीं जाती थी। सुनीता सुबह होते ही खुद मेरी बेटी को घर ले आती थी।
सुनीता के जेठ का बेटा था अंकुर। वो पांच साल का था जब उसके मां-बाप की एक्सीडेंट में मौत हो गई थी। तबसे सुनीता और परम के साथ ही रहता था। अब वह 18-19 साल का हो चुका था। प्रिया के साथ खूब खेलता था। कई बार हमारे घर भी आ जाता था, बेटे और बड़ी बेटी के साथ भी खेलता था।
15 नवंबर, 2020 को भी यही हुआ। उस दिन दिवाली थी। अंकुर घर आया और प्रिया के साथ खेलने लगा। कुछ देर बाद बोला-’चाची, प्रिया को पटाखे दिलवाने बाजार ले जाऊं?’ मैंने ये कहकर मना कर दिया कि वो अभी छोटी है। हाथ जल जाएगा। पिछले साल पटाखे जलाने में बेटे का हाथ जल गया था।
अंकुर बोला- ‘ठीक है चाची, फिर मैं अपने लिए ही ले आऊंगा।’ मैं घर के काम में लग गई। अंदर वाले कमरे की सफाई करने लगी। अंकुर, प्रिया को अपने साथ ले गया। मुझे लगा सुनीता के घर ले गया होगा। शाम हुई। त्योहार का दिन था तो खाने की तैयारी में लग गई।
जब फुर्सत हुई तो देखा प्रिया अब तक घर नहीं आई थी। मैंने बेटे से कहा- ‘प्रिया को बुलाकर ले आओ, पूजा का समय हो गया है।’
बेटे ने आस-पड़ोस में हर जगह पूछा, देखा, लेकिन प्रिया कहीं नहीं मिली। घर आकर बोला- मां, प्रिया तो कहीं नहीं है। इसके बाद मैं और मेरे पति उसे ढूंढने निकले। एक घर, दूसरा घर, तीसरा घर, चौथा… हर दरवाजे पर पूछती रही- ’प्रिया आई है क्या?’ हर जगह से जवाब मिला- ’नहीं।’ हमें डर लगने लगा था।
पूरा गांव छान मारा। जब प्रिया कहीं नहीं मिली तो थाने जाकर पुलिस को बताया। पुलिस भी खोजबीन में लग गई।
मुझसे पूछा कि ‘आखिरी बार किसके साथ देखा था?’ मैंने बताया कि ‘अंकुर घर आया था, वही अपने साथ ले गया था।’
पुलिस तुरंत उसके घर पहुंची, लेकिन वहां ताला जड़ा था। अब पुलिस का शक और गहरा गया। अब तक रात बीत चुकी थी। हम सब घर के बाहर ही थे, तभी कुछ औरतों ने आवाज देकर बताया कि प्रिया खेतों में पड़ी है।
उसके बाद जो हुआ वो तो मैं बता ही चुकी हूं। प्रिया की लाश मिलते ही पुलिस अंकुर को और तेजी से ढूंढने लगी।
कुछ ही घंटों में अंकुर पुलिस के हाथ लग गया। पूछताछ में उसने बताया कि प्रिया को खेत पर ले गया था। वहां उसका एक दोस्त पहले से मौजूद था। दोनों ने प्रिया के मुंह में कपड़ा ठूंस दिया ताकि वो चिल्ला न सके। इसके बाद दोनों ने खूब शराब पी और बारी-बारी से प्रिया के साथ रेप किया। फिर गला दबाकर उसे मार दिया।’
रमाबाई रोते हुए आगे कहती हैं- मेरी बच्ची को मारकर भी उन्हें चैन नहीं आया। उन्होंने प्रिया के पेट को चाकू से काटा। सबसे पहले कलेजा खींचकर बाहर निकाला। फिर चाकू से ही काटकर किडनी निकाली। फिर जुबान और नाक काटी। आखिरी में चाकू उसकी आंख में घोंप दिया। फिर अंकुर ने कलेजा उठाया और लाश वहीं छोड़कर भाग आया।

रमाबाई कहती हैं- जिन्हें अपना समझा, उन्हीं ने मेरी बेटी को मार डाला और खा गए।
अंकुर सीधे अपने चाचा-चाची परम और सुनीता के घर पहुंचा। उन्हें प्रिया का कलेजा दिया। सुनीता ने उस कलेजे को तीन-चार बार पानी से धोया और एक पतीले में रख लिया। फिर रसोईं से रोटियां लेकर आई। थाली में कलेजा और रोटियां परोसी। फिर परम और सुनीता रोटी के साथ मेरी बेटी का कलेजा खा गए।
पुलिस वालों ने अंकुर से पूछा कि उन लोगों ने कलेजा क्यों खाया? तब अंकुर ने बताया कि परम और सुनीता की शादी को करीब 30 साल हो चुके थे। उनकी कोई संतान नहीं थी। काफी कोशिशों के बाद भी सुनीता की गोद खाली थी।
एक दिन, एक तांत्रिक उनके घर आया और बोला- ‘दिवाली की रात किसी बच्ची का कलेजा रोटी के साथ खाने से बच्चा हो सकता है। तांत्रिक ने उन्हें एक किताब भी दी थी, जिसमें इस बारे में लिखा था। तब चाचा-चाची ने मुझसे दिवाली के दिन प्रिया को मारने के लिए कहा। इसलिए मैंने उसे मार दिया।’
रमाबाई रोते हुए कहती हैं- उन्होंने इसी अंधविश्वास के चलते मेरी बेटी मार दी। बच्चा चाहिए था तो मुझसे कह देते। मैं अपनी प्रिया उन्हें दे देती, लेकिन मारा क्यों। अपनी औलाद पैदा करने के लिए किसी का बच्चा कोई कैसे मार सकता है। क्या ये सब करने के बाद उसकी गोद भर गई? जो मुझे चाची-चाची कहता था, उसी ने मेरी बेटी के साथ दरिंदगी की? मेरी बेटी की जुबान तक काट दी… क्या उसे ये डर था कि मरने के बाद भी मेरी बेटी हैवानों का सच दुनिया को बता देगी।
रमाबाई कहती हैं- मैं तो अपनी बेटी को आखिरी बार ठीक से देख भी नहीं सकीं। पुलिस प्रिया के शव को पोस्टमॉर्टम के लिए ले गई और वहां से सीधे श्मशान घाट। न बेटी को गोद में लेने का मौका मिला, न माथा चूम सकी, न आखिरी बार सीने से लगा सकी। बस एक तस्वीर है, जिसे देखकर अपनी बच्ची की याद में रो लेती हूं।
रमाबाई तस्वीर को टकटकी लगाकर देखती हैं। कहती हैं- तबसे हम लोगों ने दिवाली नहीं मनाई। दिवाली नजदीक आती है तो डर लगने लगता है। वह रात याद आती है। बेटी का चेहरा याद आ जाता है।

अभी रमाबाई के परिवार में एक बेटी और एक बेटा है। वह कहती हैं- ‘अब मैं इन्हें किसी के घर नहीं जाने देती।’
पहले गांव के बच्चे एक-दूसरे के घर बेफिक्र होकर जाते थे। पड़ोसी दूसरे के बच्चों को अपने बच्चों की तरह प्यार करते थे। लेकिन प्रिया की मौत के बाद यह भरोसा टूट गया। बहुत लोग अपने बच्चों को किसी के घर भेजने से डरते हैं।
मेरी बच्ची की मौत ने सिर्फ मेरी गोद ही खाली नहीं की, बल्कि पूरे गांव से एक-दूसरे पर भरोसा भी छीन लिया।
तमाम सुनवाइयों और सबूतों के बाद प्रिया के कातिलों को अपने जुर्म की सजा मिल चुकी है। मामले में दिसंबर 2023 स्पेशल पॉक्सो कोर्ट ने अंकुर, उसके दोस्त धीरेन, परम और सुनीता को उम्रकैद की सजा सुनाई गई। लेकिन उसकी मां के जेहन में सुनवाइयों का दौर अब भी जारी है और सवाल सिर्फ एक- मेरी बेटी का क्या कसूर था?
नोट- सभी नाम बदले हुए हैं।
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