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एनडीपीएस केस में पुलिस की विवेचना में 11 खामियां:एफआईआर से पहले कागज में दर्ज था अपराध नंबर, वजन में भी 142 ग्राम का अंतर; 1280 गोलियों का आरोपी बरी




1280 नशीली गोलियां पकड़ने का दावा करने वाली भिलाई नगर पुलिस की जांच अदालत में सवालों के घेरे में आ गई। सेक्टर-6 में पकड़े गए बी. पवन कल्याण के खिलाफ पुलिस बरामदगी से जुड़े जरूरी तथ्य और प्रक्रिया अदालत में साबित नहीं कर सकी। विशेष न्यायाधीश सुनीता टोप्पो की अदालत ने जांच में सामने आई 11 खामियों को देखते हुए आरोपी को संदेह का लाभ दिया और बरी कर दिया। मामले में पुलिस ने जब्ती के समय 1280 गोलियों का वजन 153.06 ग्राम दर्ज किया था। बाद में न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने हुई गिनती और जांच के दौरान इन्हीं 1280 गोलियों का वजन 294.98 ग्राम पाया गया। यानी दोनों रिकॉर्ड में 141.92 ग्राम का अंतर था। अदालत के सामने इस अंतर का संतोषजनक जवाब अभियोजन नहीं दे पाया। 15 दिसंबर 2024 को पकड़ा था, 61 पट्टियों में थीं गोलियां
मामला 15 दिसंबर 2024 का है। पुलिस को आयकर भवन, सेक्टर-6 के पास नशीली गोलियां बेचने की सूचना मिली थी। पुलिस ने मौके पर बी. पवन कल्याण को पकड़ा और उसके पास से अल्प्राजोलम की 1280 गोलियां बरामद करने का दावा किया। बाद में इसी मामले में अपराध क्रमांक 510/2024 दर्ज किया गया। हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में भी 1280 गोलियां 61 पट्टियों में बरामद होने और उनका वजन 294.98 ग्राम दर्ज होने का उल्लेख है। गवाहों ने भी पुलिस की कार्रवाई को पूरी तरह नहीं माना
कोर्ट में मामले के दोनों स्वतंत्र गवाह राधेश्याम और प्रदीप कुमार ठाकुर ने पुलिस की कार्रवाई का पूरा समर्थन नहीं किया। इसके अलावा गोलियों का वजन करने वाले व्यक्ति और मालखाने के मुंशी को भी अभियोजन ने गवाह के रूप में पेश नहीं किया। इससे बरामदगी और जब्त माल को सुरक्षित रखने की प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े हुए। एफआईआर से पहले कागज में लिखा था अपराध क्रमांक
एफआईआर 15 दिसंबर को शाम 5.21 बजे दर्ज की गई थी, लेकिन पुलिस के मुताबिक मौके पर तैयार किए गए तौल पंचनामा, नमूना सील पंचनामा और जब्ती पत्रक में पहले से ही अपराध क्रमांक 510/2024 लिखा था। अदालत में यह भी सवाल बना कि एफआईआर दर्ज होने से पहले मौके पर तैयार दस्तावेजों में अपराध क्रमांक कैसे दर्ज हो गया। नशे की गोलियों के नमूने लेने में भी सवाल
पुलिस ने बरामद सभी पट्टियों से नमूने नहीं लिए। नमूने लेने की कार्रवाई में भी चार दिन का अंतर सामने आया। अदालत में मुखबिर से मिली सूचना को वरिष्ठ अधिकारी तक पहुंचाने को लेकर पुलिस के बयान और दस्तावेज एक जैसे नहीं मिले। इसी तरह अदालत में विवेचना में 11 खामियां गिनाई। अभियोजन इन कमियों के बीच आरोपी के खिलाफ आरोप साबित नहीं कर सका। इसी आधार पर अदालत ने बी. पवन कल्याण को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता ज्ञान प्रकाश दांडेकर ने पैरवी की।



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