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अगले दो लेखों में हम कृष्ण, बलराम और सुभद्रा के जन्म से जुड़ी कुछ कहानियां जानेंगे। महाराष्ट्र के एलोरा में गुफा क्रमांक 27 वहां की सबसे प्राचीन गुफाओं में से एक है। यहां एक उल्लेखनीय प्रतिमा मिलती है, जिसमें कमल का फूल धारण की हुई देवी को दो देवताओं के साथ दिखाया गया है। माना जाता है कि देवी के बायीं ओर के देवता कृष्ण और उनके दाहिने ओर के देवता बलराम हैं। यह मान्यता है कि ये देवी एकानंशा हैं, अर्थात वे जिनका कोई अंश नहीं है। वे आदि शक्ति और कृष्ण की बहन, दोनों हैं। वास्तव में, देवी की बायीं ओर की प्रतिमा दो भुजाओं वाले कृष्ण की नहीं, बल्कि चार भुजा वाले विष्णु की है। इसमें विष्णु कमल, चक्र, शंख और गदा धारण किए हुए हैं। यह दो बातों का संकेत देता है। पहली यह कि यहां शक्तिशाली ग्वाले कृष्ण की कहानी और वैदिक देवता विष्णु की धारणा का मिलन हो रहा है। विष्णु को चार भुजाओं वाले संरक्षक के रूप में दिखाया गया है, जो राजा का रूप लेकर धरती पर अपना कार्य करते हैं। इस प्रतिमा से हिंदू धर्म के उस रूप का उद्गम भी दिखाई देता है, जो प्रतिमाओं और मंदिरों पर आधारित है। इसमें देवताओं को चार भुजाओं के साथ दिखाया जाता है। यह लगभग पांचवीं सदी में गुप्त काल के दौरान हुआ। इससे पहले की बौद्ध और जैन कला में देवताओं को केवल दो भुजाओं के साथ दिखाया जाता था। लेकिन हिंदू कला में देवताओं की कई भुजाएं और कई मुख होते थे। यह धारणा वेदों में भी पाई जाती है। इसके आधार पर हम दावे के साथ कह सकते हैं कि जिन वैदिक परंपराओं पर बौद्ध और जैन धर्म हावी हुए, उनमें और उत्तरकालीन हिंदू परंपराओं में घनिष्ठ संबंध था। उल्लेखनीय बात यह है कि आगे चलकर ये उत्तरकालीन हिंदू परंपराएं बौद्ध और जैन धर्मों पर हावी हुईं। वैदिक काल में ब्राह्मण समाज अपने विचार साधारणतः अपने पास ही रखता था। लेकिन हिंदू धर्म के उद्गम के साथ यह बदल गया। ब्राह्मण अपने विचारों को देशभर के लोक धर्मों में मिलने वाले प्रज्ञ विचारों के साथ जोड़ने लगे। इस प्रकार, दो शक्तिशाली लोक देवता – कृषि से जुड़े बलराम और पशुपालन से जुड़े कृष्ण, हिंदू देव गण में शामिल हो गए। समय के साथ बलराम को शिव से और कृष्ण को विष्णु से जोड़ा गया। दोनों को देवी से भी जोड़ा गया। देवी शिव की पत्नी और विष्णु की बहन मानी जाने लगीं। इस प्रकार के कई विचार स्थानीय मंदिर परंपराओं से उभरे, न कि धार्मिक ग्रंथों से। किसी औपचारिक संप्रदाय के निर्मित होने के बहुत पहले लोग ‘हलि’ और ‘चकरी’ नामक देवताओं को पूजते थे। ‘हलि’ हल धारण करते थे और ‘चकरी’ बैलगाड़ियों तथा अश्वगाड़ियों का चक्का धारण करते थे। उस काल के दो प्रमुख पेशों, कृषि और पशुपालन, में हल और चक्के का उपयोग होता था। दोनों पेशों के लिए देवी एकानंशा, अर्थात धरती आवश्यक थीं। इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि कृषि और पशुपालन के देवताओं के बीच पृथ्वी की देवी को रखने का विचार किसी मार्गी धर्म का हिस्सा बनने से बहुत पहले लोगों के बीच रहा हो। चक्का-धारक और हल-धारक देवता की प्रतिमाएं 2100 वर्ष पुराने भारतीय-यूनानी सिक्कों पर पाई जाती हैं। यूनान के लोग मानते थे कि भारतवासी यूनानी देवता हेराकल्स को पूजते थे। क्या वे हरि-कुल-एश अर्थात हरि के कुल की आराधना की ओर संकेत कर रहे थे? हम केवल अनुमान लगा सकते हैं। इस कहानी के सबसे लोकप्रिय हिंदू विवरण के अनुसार, एक दैवीय आवाज ने मथुरा के राजा कंस को बताया कि उसकी बहन देवकी का आठवां पुत्र उसका वध करेगा। इसलिए कंस ने अपनी बहन की सभी संतानों का वध करने की ठान ली। कृष्ण की कहानी में सातवां शिशु किसी दूसरी महिला के गर्भ में स्थानांतरित होकर जीवित रहा। आठवें शिशु का जन्म होते ही उसे चोरी-छिपे एक ग्वाले के घर ले जाया गया, जहां उसका पालन-पोषण हुआ। उसी ग्वाले की पुत्री ने उसका स्थान ले लिया। जब कंस ने उस शिशु का वध करने का प्रयास किया, तब वह एक देवी में बदल गई। इस प्रकार, जीवित रहने वाले तीन नवजात शिशु बलराम, कृष्ण और सुभद्रा थे। आगे चलकर कृष्ण और बलराम ने कुश्ती के खेल में कंस का वध किया। बौद्ध धर्म के घट जातक में इसी कहानी का थोड़ा अलग वर्णन है। यहां कंस ने देवकी को एक किले में बंदी बना लिया था, जहां वह गुपचुप सागर नामक राजकुमार से प्रेम करने लगी। जब कंस को इसकी जानकारी मिली, तब वह अपनी बहन की केवल पुत्रियों को जीवित रखने के लिए तैयार हुआ। इस प्रकार, जब कंस की बहन की पुत्री जन्मी, तब उसे जीवित रखा गया। इसके बाद कंस की बहन ने दस पुत्रों को जन्म दिया। इन पुत्रों की जगह उसकी दासी की पुत्रियां कंस को प्रस्तुत की गईं, जो प्रसव के समय मर चुकी थीं। उसके दस पुत्र दासी के घर में बड़े हुए। यौवन में वे शक्तिशाली मल्लयोद्धा बने और उन्होंने कंस का वध किया। अगले लेख में हम इन कहानियों का जैन विवरण जानेंगे और सभी कहानियों का विश्लेषण भी करेंगे।
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रसरंग में मायथोलॉजी:हल और चक्र के देवताओं से कैसे जुड़े बलराम एवं कृष्ण?
