5 घंटे पहले
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अशोक गुलाटी कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) के पूर्व अध्यक्ष
पच्चीस वर्ष का समय पीछे मुड़कर यह देखने और समझने के लिए पर्याप्त होता है कि नरेंद्र मोदी के शासनकाल के- पहले मुख्यमंत्री और फिर प्रधानमंत्री के रूप में- भारतीय कृषि के लिए क्या मायने हैं। यह यात्रा अक्टूबर 2001 में गुजरात से शुरू हुई थी, जब मोदी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, और मई 2014 में इसने एक राष्ट्रीय कैनवास का रूप ले लिया।
गुजरात गाथा तो एक कृषि चमत्कार थी। 2001-02 से 2013-14 के बीच गुजरात की कृषि जीडीपी लगभग 9% प्रति वर्ष की दर से बढ़ी, जो प्रमुख राज्यों में सबसे अधिक थी। यह सफलता किसी एक योजना के दम पर नहीं मिली थी, यह पूरे इकोसिस्टम का परिणाम थी।
गुजरात ने खेतों तक पानी पहुंचाने और प्रकृति द्वारा प्रदत्त जल को सहेजने में व्यापक निवेश किया। चेक डैम और खेत-तालाबों ने वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण में मदद की। नर्मदा नहर प्रणाली ने सिंचाई का विस्तार किया, जबकि माइक्रो-इरिगेशन ने किसानों को कम पानी में अधिक उत्पादन लेने में सक्षम बनाया।
बिजली भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी। ज्योतिग्राम योजना ने कृषि फीडरों को अलग किया और किसानों को विश्वसनीय बिजली उपलब्ध कराई। इससे सिंचाई अधिक सुनिश्चित हुई और ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन की गुणवत्ता में भी सुधार आया। इसके बाद सड़कों की बारी आई। हर मौसम में चालू रहने वाली ग्रामीण कनेक्टिविटी ने गांवों को बाजारों, बीज-खाद आपूर्तिकर्ताओं, विस्तार सेवाओं और कस्बों से अधिक प्रभावी ढंग से जोड़ा।
एक दिलचस्प संस्थागत इनोवेशन ज्ञान को किसान तक पहुंचाने का प्रयास था। कृषि महोत्सव और कृषि रथ ने कृषि वैज्ञानिकों, विस्तार अधिकारियों और मिट्टी, पानी, तकनीक तथा उन्नत प्रथाओं से जुड़ी जानकारी को सीधे गांवों तक पहुंचाया। इसका मूल विचार यह था कि किसानों को ज्ञान के लिए संस्थानों तक जाने के बजाय कृषि-ज्ञान स्वयं किसानों तक पहुंचना चाहिए।
पानी, बिजली, सड़क, तकनीक, कृषि-विस्तार और बाजार- जब ये सभी तत्व साथ आए तो किसानों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी और कृषि विकास का इंजन बन गई। जो भी राज्य अपने किसानों और अर्थव्यवस्था को समृद्ध बनाना चाहता है, उसके लिए यह आज भी एक अनुकरणीय मॉडल है। मोदी पीएम बने, तो यह कैनवास एक राज्य से बढ़कर पूरे देश तक फैल गया।
गुजरात के अनुभवों को राष्ट्रीय कार्यक्रमों में ढाला गया। जल प्रबंधन पर ध्यान दिया गया। मृदा स्वास्थ्य कार्ड ने वैज्ञानिक मिट्टी परीक्षण और सटीक पोषक तत्व प्रबंधन को मुख्यधारा में ला दिया। सिंचाई को अधिक एकीकृत दृष्टिकोण मिला, जिसमें वाटरशेड विकास, सूक्ष्म सिंचाई और ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ पर अधिक बल दिया गया। अमृत सरोवर पहल ने जल संपत्तियों के निर्माण व कायाकल्प के प्रयासों को नया आयाम दिया।
इन सभी पहलों के पीछे का अंतर्निहित सिद्धांत भारत के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है। पानी केवल एक कृषि इनपुट नहीं है; वह कृषि विकास का प्रमुख स्रोत है। मोटे अनाजों (मिलेट्स) को प्रोत्साहन के मोर्चे पर मोदी के प्रयासों को व्यापक समाज का समर्थन भी मिला है, जिसका प्रमाण मिलेट्स की बढ़ती लोकप्रियता है।
पीएम-किसान ने किसानों के हाथों में सीधी आय पहुंचाई। जून 2026 तक, 23 किश्तों के जरिए 4.46 लाख करोड़ से अधिक की राशि स्थानांतरित की जा चुकी है। इसका महत्व सरकार और किसान के बीच प्रत्यक्ष, डिजिटल और पारदर्शी वित्तीय माध्यम स्थापित करने में है, जिसने बिचौलियों के प्रभाव को समाप्त कर दिया।
सहकारिता क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करने के लिए इसका अलग मंत्रालय बनाया गया। गुजरात के अनुभव को देखते हुए यह स्वाभाविक भी है, जहां सहकारिता का इकोसिस्टम मौजूद है। मोदी के 25 वर्षों के कार्यों पर दृष्टि डालें, तो कृषि विकास की एक गहरी अवधारणा स्पष्ट दिखाई देती है।
प्रधानमंत्री मोदी ने गुजरात में कृषि को जमीनी स्तर से समझा और राष्ट्रीय स्तर पर पिछले बारह वर्षों में उन विचारों में से कई को बड़े पैमाने पर लागू किया है। साथ ही कई नई और दूरदर्शी नीतिगत दिशाएं भी सामने आई हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

