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एलआईजी चौराहा से नवलखा चौराहा तक प्रस्तावित एलिवेटेड कॉरिडोर को लेकर बुधवार को मप्र हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में सवा घंटे से अधिक समय तक अंतिम सुनवाई हुई। जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस जय कुमार पिल्लई की डिवीजन बेंच के सामने शासन और इंदौर उत्थान अभियान समिति ने कॉरिडोर को ट्रैफिक के लिहाज से उपयोगी और तकनीकी रूप से व्यवहार्य बताया। वहीं याचिकाकर्ताओं ने ट्रैफिक सर्वे की विश्वसनीयता, प्रोजेक्ट की लागत, डिजाइन, रोटरी, राइट टर्न और सतत एलिवेटेड कॉरिडोर की जरूरत पर सवाल उठाए। शासन की ओर से परियोजना की उपयोगिता समझाने के लिए कोर्ट में वीडियो प्रेजेंटेशन भी दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने इसका विरोध करते हुए कहा कि वीडियो से किसी प्रोजेक्ट की उपयोगिता साबित नहीं की जा सकती, इसके लिए वर्तमान ट्रैफिक आंकड़ों और स्वतंत्र तकनीकी अध्ययन की जरूरत है। दोनों पक्षों की अंतिम दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने याचिकाकर्ता से बहस का संक्षिप्त सिनॉप्सिस मांगा है। अब मामले में अंतिम आदेश का इंतजार है। एक्रोपोलिस की ट्रैफिक सर्वे रिपोर्ट पर सबसे ज्यादा आपत्ति सुनवाई के दौरान एक्रोपोलिस कॉलेज की ट्रैफिक सर्वे रिपोर्ट सबसे अहम मुद्दों में रही। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि इस रिपोर्ट के आधार पर कॉरिडोर की उपयोगिता तय नहीं की जा सकती। उनका दावा है कि SGSITS ने सर्वे के मूल डेटा में डेटा दोहराव, कॉपी-पेस्ट की त्रुटियों और कथित डेटा मैनिपुलेशन जैसी विसंगतियां बताई थीं। याचिकाकर्ता पक्ष के अनुसार इन तकनीकी आपत्तियों पर लंबे समय तक विभागीय स्तर पर संयुक्त चर्चा नहीं हुई। बाद में एक्रोपोलिस से इन आपत्तियों पर जवाब मांगा गया। याचिकाकर्ताओं ने मांग की कि सर्वे करने वाली संस्था, ऑडिट विशेषज्ञ और संबंधित विभागीय अधिकारियों की संयुक्त बैठक कर सभी तकनीकी आपत्तियों का समाधान कराया जाए। इंदौर उत्थान अभियान समिति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बागड़िया ने तर्क दिया कि केवल एक सर्वे रिपोर्ट के आधार पर एलिवेटेड कॉरिडोर की व्यवहार्यता पर निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। उनके अनुसार SGSITS की तकनीकी जांच में मूल सर्वे डेटा की कमियां सामने आई थीं और परियोजना का आकलन मौजूदा यातायात परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। 350 करोड़ का प्रोजेक्ट या 700-750 करोड़ तक खर्च? लागत को लेकर भी दोनों पक्षों में अलग-अलग दलीलें सामने आईं। याचिकाकर्ता पक्ष ने कहा कि करीब 350 करोड़ रुपए की लागत का अनुमान वर्ष 2019-20 से चला आ रहा है। इस दौरान डिजाइन और परियोजना की विभिन्न भुजाओं में बदलाव हुए हैं। बिजली लाइनों की शिफ्टिंग और अन्य खर्च जोड़ने के बाद वास्तविक लागत 700 से 750 करोड़ रुपए तक पहुंच सकती है। इसके जवाब में शासन ने बताया कि प्रोजेक्ट का GAD ERP पोर्टल पर अपलोड किया जा चुका है। परियोजना की अनुमानित लागत करीब 350 करोड़ रुपए है और इसमें करीब 10% तक बदलाव संभव है। 24 मीटर की रोटरी पर जाम की आशंका प्रस्तावित करीब 24 मीटर की आंतरिक रोटरी की क्षमता पर भी याचिकाकर्ताओं ने सवाल उठाए। उनका कहना था कि पीक आवर्स में सीमित क्षमता के कारण यहां ट्रैफिक जाम हो सकता है। ढलान से आने वाले वाहनों को रोटरी के पास रुकना पड़ने पर दुर्घटना की आशंका भी जताई गई। शासन की ओर से बताया गया कि गीता भवन सहित प्रमुख स्थानों पर रोटरी, आर्म्स और जरूरी कनेक्टिविटी का प्रावधान किया गया है। इसका उद्देश्य एलिवेटेड कॉरिडोर के साथ नीचे चलने वाले स्थानीय यातायात को भी सुचारू रखना है। अलग-अलग फ्लाईओवर बेहतर या एक ही सतत कॉरिडोर? सुनवाई में एलआईजी से नवलखा तक एक सतत एलिवेटेड कॉरिडोर के बजाय प्रमुख चौराहों पर अलग-अलग फ्लाईओवर बनाने के विकल्प पर भी बहस हुई। याचिकाकर्ताओं का तर्क: एबी रोड पर ट्रैफिक की समस्या मुख्य रूप से लेन की कमी से ज्यादा चौराहों पर क्रॉसिंग और टर्निंग की वजह से है। उनका दावा है कि बड़ी संख्या में वाहन एक-दो चौराहों के बाद ही अपने गंतव्य की ओर मुड़ जाते हैं। इसलिए प्रमुख चौराहों पर अलग-अलग फ्लाईओवर या दूसरे स्थानीय समाधान अधिक प्रभावी हो सकते हैं। इंदौर उत्थान अभियान समिति का तर्क: अलग-अलग फ्लाईओवर बनाने पर लंबे एप्रोच और रैंप की जरूरत होगी। पास-पास स्थित चौराहों के कारण इनके एप्रोच एक-दूसरे को प्रभावित कर सकते हैं और नीचे के स्थानीय यातायात के लिए समस्या बढ़ सकती है। समिति की ओर से इसके समर्थन में कोर्ट के सामने डायग्राम और तुलनात्मक चित्र भी प्रस्तुत किए गए। राइट टर्न की सुविधा पर भी सवाल याचिकाकर्ताओं ने साकेत, खजराना, बंगाली और पिपलियाहाना की ओर से आने वाले यातायात के लिए राइट टर्न की व्यवस्था पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि जरूरी स्थानों पर राइट टर्न नहीं होने पर एलिवेटेड कॉरिडोर की उपयोगिता सीमित हो सकती है। शासन की ओर से जवाब दिया गया कि परियोजना में आवश्यक आर्म्स और कनेक्टिविटी का प्रावधान है, जिससे स्थानीय यातायात को प्रमुख चौराहों और आसपास के क्षेत्रों तक पहुंच मिलती रहेगी। नीचे का ट्रैफिक स्थानीय, ऊपर से गुजरेगा थ्रू ट्रैफिक इंदौर उत्थान अभियान समिति ने परियोजना की उपयोगिता समझाते हुए कहा कि एलिवेटेड कॉरिडोर का उद्देश्य थ्रू ट्रैफिक को ऊपर ले जाना है, जबकि नीचे की सड़क स्थानीय यातायात के लिए उपलब्ध रहेगी। इससे दोनों प्रकार के यातायात को अलग-अलग स्तर पर संचालित किया जा सकेगा और चौराहों पर दबाव कम करने में मदद मिलेगी। फ्लाई ऐश के इस्तेमाल पर पर्यावरण का मुद्दा निर्माण के दौरान फ्लाई ऐश के इस्तेमाल पर भी याचिकाकर्ताओं ने आपत्ति उठाई। घनी आबादी वाले क्षेत्र में इसके परिवहन और हैंडलिंग से प्रदूषण व जनस्वास्थ्य पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव का मुद्दा उठाया गया। याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि कॉरिडोर की संरचना को देखते हुए बड़े पैमाने पर भराव की जरूरत नहीं होगी। स्वतंत्र तकनीकी समिति बनाने की मांग याचिकाकर्ता अतुल शेठ की ओर से पूरे प्रोजेक्ट का स्वतंत्र तकनीकी अध्ययन कराने के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित करने की मांग की गई। उनका कहना था कि समिति की रिपोर्ट आने तक परियोजना से जुड़े कार्य रोके जाएं और रिपोर्ट के आधार पर आगे निर्णय लिया जाए। याचिकाकर्ता पक्ष ने अपने अध्ययन के आधार पर दावा किया कि एलिवेटेड कॉरिडोर की उपयोगिता 10% से कम है, जबकि अलग-अलग प्रमुख चौराहों पर फ्लाईओवर की संयुक्त उपयोगिता 42% से अधिक हो सकती है। ये आंकड़े याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से प्रस्तुत किए गए दावे हैं, हाईकोर्ट का निष्कर्ष नहीं। अब कोर्ट के आदेश पर नजर सवा घंटे से अधिक चली अंतिम सुनवाई में दोनों पक्षों ने परियोजना की उपयोगिता, ट्रैफिक सर्वे, तकनीकी व्यवहार्यता, लागत और डिजाइन से जुड़े अपने तर्क रखे। सुनवाई के अंत में कोर्ट ने याचिकाकर्ता से बहस का संक्षिप्त सिनॉप्सिस मांगा है। इसके बाद मामले में अंतिम आदेश आने की उम्मीद है। याचिकाकर्ता अतुल शेठ सहित सात लोग इस मामले में पक्षकार हैं। इंदौर उत्थान अभियान समिति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बागड़िया और अधिवक्ता मालविका मिश्रा पॉल ने पक्ष रखा।
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एलआईजी-नवलखा एलिवेटेड कॉरिडोर पर सवा घंटे बहस:24 मीटर रोटरी और 350 करोड़ लागत पर सवाल; एलिवेटेड कॉरिडोर मामले में अंतिम सुनवाई पूरी
