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Pawan K Verma Column | Understanding Dharma, Ethics & Moral Responsibility


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2 घंटे पहले

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पवन के. वर्मा पूर्व राज्यसभा सांसद व राजनयिक - Dainik Bhaskar

पवन के. वर्मा पूर्व राज्यसभा सांसद व राजनयिक

धर्म क्या है? ‘धर्म’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘धृ’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ है- धारण करना और संभालकर रखना। आम तौर पर धर्म का अनुवाद कर्तव्य, सदाचार, नैतिकता, कानून या उस नैतिक-व्यवस्था के रूप में किया जाता है, जो समाज को संभाले रखती है। लेकिन इनमें से कोई भी शब्द धर्म के व्यापक अर्थ को व्यक्त नहीं करता। हिंदू-दृष्टि में धर्म अस्तित्व की नैतिक जटिलताओं के बीच रास्ता खोजने का तरीका है।

धर्म आचरण के लिए एक स्पष्ट नैतिक ढांचा अवश्य प्रदान करता है, लेकिन यह बाइबिल के ‘टेन कमांडमेंट्स’ की तरह कोई कठोर नियमावली नहीं है। मानवीय विवेक और व्यवहार ने धर्म को परिस्थितियों के अनुरूप कई कारकों से प्रभावित होने की गुंजाइश दी है।

इनमें देश-धर्म यानी अलग-अलग क्षेत्रों में प्रचलित आचरण, आश्रम-धर्म यानी जीवन की अवस्था के अनुसार कर्तव्य, कुल-धर्म यानी परिवार के प्रति दायित्व, जाति-धर्म यानी जातिगत निष्ठा, स्वभाव-धर्म यानी व्यक्ति की प्रकृति, स्वधर्म यानी अंतरात्मा के विवेक से किया गया चुनाव और आपद्धर्म यानी संकट के समय अपनाया जाने वाला आचरण शामिल हैं।

धर्म हमसे कहता है कि किसी पर फैसला सुनाने से पहले संदर्भ, मंशा, परिस्थितियों और परिणामों को परखो। लेकिन यही परिष्कृत-जटिलता लोगों को अपने दोषों को सही ठहराने के लिए धर्म का इस्तेमाल करने की गुंजाइश भी देती है।

कोई गलत काम करने पर शक्तिशाली लोगों की जानी-पहचानी प्रतिक्रिया याद कीजिए। वे कहते हैं- परिस्थितियों ने मुझे विवश कर दिया, राजनीतिक दबाव था, सुरक्षा से जुड़े सवाल थे, यह फैसला व्यापक जनहित में लिया गया था, जिम्मेदार कोई और था, मंशा गलत नहीं थी, आदि-आदि।

इस तरह तो हर गलत काम के लिए एक बहाना बनाया जा सकता है। अगर हर उल्लंघन के साथ कोई-न-कोई स्पष्टीकरण दिया जाता रहे, तो धीरे-धीरे स्पष्टीकरण ही दोषमुक्ति का आधार बन सकता है। हिंदू महाकाव्य ऐसी परिस्थितियों से भरे पड़े हैं, जहां देखने में धर्मसम्मत रास्ता किसी दूसरी नैतिक जिम्मेदारी से टकराता है।

सत्य और करुणा आमने-सामने आ सकते हैं; निष्ठा और न्याय में टकराव हो सकता है; परिवार के प्रति कर्तव्य और समाज के प्रति दायित्व एक-दूसरे के विरोध में खड़े हो सकते हैं; और व्यक्तिगत सदाचार का टकराव किसी सामूहिक उद्देश्य से हो सकता है। खासकर महाभारत तो नैतिकता की नियम-पुस्तिका कम और नैतिक दुविधाओं की विशाल प्रयोगशाला अधिक है।

इसीलिए हिंदू मानस दुनिया को संतों और पापियों के दो खानों में बांटने से हिचकता है। दुर्योधन निस्संदेह गंभीर अधर्म के लिए जिम्मेदार है, फिर भी महाकाव्य में उसकी मृत्यु के समय स्वर्ग से उस पर फूल बरसते हैं। रावण ऐसे कृत्य करता है, जिनका नैतिक रूप से बचाव नहीं किया जा सकता, फिर भी रामायण उसे एक विद्वान और महान शिवभक्त के रूप में भी याद करती है।

आप कह सकते हैं कि यह सिद्धांत कि किसी एक निर्दोष व्यक्ति को सजा मिलने की तुलना में कई दोषियों का बच निकलना बेहतर है, मानवीय है। लेकिन अगर व्यवस्था इतनी जटिल हो जाए कि किसी के दोष को साबित करना लगभग असंभव हो तो कोई नेक इरादा भी बुरे नतीजे दे सकता है। दुर्भाग्य से आज स्थिति यह हो गई है कि जिसके पास जितनी अधिक ताकत होती है, उसके पास अपनी भूलों को सही ठहराने के लिए उतने ही अधिक बहाने भी मौजूद होते हैं।

हमें समझना होगा कि धर्म भले ही संदर्भ पर निर्भर हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उसके कोई परिणाम नहीं होते। इसी तरह, कानून और नैतिकता एक ही चीज नहीं हैं। कोई अपराध कानूनी तौर पर साबित करना मुश्किल हो सकता है, फिर भी नैतिक रूप से उसका बचाव नहीं किया जा सकता। एक परिपक्व समाज को इन दोनों अंतर को समझना चाहिए।

वास्तव में धर्मसम्मत नैतिकता यह सवाल पूछती है कि मेरे आचरण ने व्यापक नैतिक व्यवस्था को संभाला है या उसे नुकसान पहुंचाया है। धर्म की कसौटी यह नहीं हो सकती कि हम अपने किए को सही ठहराने के लिए कितने चतुर तर्क दे सकते हैं। कसौटी यह होनी चाहिए कि क्या हम अब भी अपने किए की जिम्मेदारी स्वीकार करने के लिए तैयार हैं?

धर्मसम्मत नैतिकता पूछती है कि मेरे आचरण ने नैतिक व्यवस्था को संभाला है या उसे नुकसान पहुंचाया है? धर्म की कसौटी यह नहीं है कि हम अपने किए को सही ठहराने के लिए कितने तर्क दे सकते हैं। कसौटी यह है कि क्या हम अपने किए की जिम्मेदारी स्वीकारते हैं? (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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