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मैं पुणे में नया था। 2008 तक मैं यहां सिर्फ एक विजिटर था। उस साल एक प्रोजेक्ट पर काम करते हुए मैं अपने एक रिपोर्टर के साथ पुणे में एक जानी-मानी हस्ती की मीटिंग में पहुंचा। वे कोई पब्लिक अनाउंसमेंट करने वाले थे। मीटिंग को संबोधित कर रहे व्यक्ति सीढ़ियों पर बैठे थे, जो कि उनका स्टाइल था। जबकि सारे रिपोर्टर उनके चारों तरफ खड़े थे। ऐसा इसलिए, क्योंकि उन्होंने पत्रकारों से मिलने के लिए सबसे सस्ता ठिकाना बुक किया था। मेरे जैसे देर से पहुंचने वाले के लिए उन्हें देख पाना भी संभव नहीं था। मैं भीड़ के पीछे चुपचाप खड़ा हो गया, क्योंकि उनकी आवाज मुझे साफ सुनाई दे रही थी। उनका अनोखा, आकर्षक और बेहद अधिकारपूर्ण लहजा न सिर्फ भीड़ को शांत रखे हुए था, बल्कि मुझ समेत सभी को अटेंटिव बनाए हुए था। अचानक मेरा फोन बजा और उसे मैंने तुरंत साइलेंट कर दिया। लेकिन कुछ ही सेकंड बजी वह कॉलर ट्यून अथॉरिटेटिव टोन वाले उन व्यक्ति का ध्यान खींचने के लिए काफी थी। मौजूदा विषय से थोड़ा हटकर उन्होंने आदेश दिया कि ‘रघु, आगे आकर मेरे बगल में बैठो।’ शाायद वह एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी की ‘भगवान वेंकटेश्वर सुप्रभातम’ वाली मेरी कॉलर ट्यून से मुझे पहचान गए- बारीक से बारीक चीजों पर उनकी पैनी नजर रहती थी। मुझे उनकी जो बात पसंद थी, वह था छोटी से छोटी बात में भी जीवन जीने का उनका असाधारण तौर पर सरल और जमीनी तरीका। एक बार वे 2003 में इंदौर में इस अखबार के दफ्तर में आए और बोले कि ‘मुझे एक दिन के लिए आपकी कार और ड्राइवर चाहिए, क्योंकि मैं राइफल शूटिंग की प्रैक्टिस के लिए महू जा रहा हूं।’ उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि ‘क्या आप दे सकते हैं?’ उन्होंने बस आदेश दिया। मैंने संकोच के साथ कहा कि ‘दादा, मेरे पास तो बस मारुति जेन है, आपके कद के मुताबिक बड़ी कार नहीं है।’ वे मुस्कराए और बोले कि ‘इसीलिए तो आपसे मांग रहा हूं।’ मैंने बस सिर हिलाया और उन्हें गाड़ी तक ले गया। ऑफिस ड्राइवर बेहद खुश था, क्योंकि वह किसी और को नहीं, बल्कि बॉलीवुड और मराठी रंगमंच के एक्टर नाना पाटेकर को ले जाने वाला था, जिनका गुरुवार सुबह गोवा में निधन हो गया। अपने मूल सिद्धांतों और आमजन के प्रति गहरी संवेदना के कारण उन्होंने लग्जरी भरी जिंदगी को ठुकरा दिया था। जब भी हमारी मुलाकात होती तो वे इस बारे में बात करते कि वे कितने भाग्यशाली थे कि गलियों की दीवारों पर सितारों के चेहरे बनाने वाले पेंटर के तौर पर सफर शुरू करके अंतत: वे उन्हीं बिलबोर्ड्स पर अपना चेहरा देख पाए। बहुत से लोग शायद नहीं जानते होंगे कि उन्होंने मुंबई के प्रतिष्ठित जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स से स्केच आर्टिस्ट और कैलीग्राफर की ट्रेनिंग ली थी। बाद में कॅरिअर में अच्छी कमाई होने के बावजूद उन्होंने उसी 750 वर्ग फीट के घर में रहना पसंद किया- जिसमें प्लेन-वाइट दीवारें और सादा वुडन फर्नीचर था- क्योंकि उन्होंने आलीशान सेलेब्रिटी लाइफस्टाइल अपनाने से इनकार कर दिया था। उन्हें पढ़ना और लिखना पसंद था और वे गांव की शांत जिंदगी को तरजीह देते थे। किसानों की दुर्दशा से परेशान और अपनी आय का बड़ा हिस्सा उनके वेलफेयर में लगाने वाले इस व्यक्ति ने एक बार मुझसे कहा था कि ‘मैं एक्टिंग इसलिए करता हूं क्योंकि इससे मेरे बिल चुकते हैं। जब पैसे खत्म हो जाते हैं तो मैं किसी प्रोड्यूसर को फोन करके किसी रोल के लिए कहता हूं। नहीं तो आपकी तरह मेरे सैकड़ों दोस्त हैं, जो कम से कम एक दिन का खाना तो मुझे खिला देंगे और आपकी अगली बारी एक साल बाद ही आएगी।’ वे हमेशा लाखों लोगों, खासकर किसान समुदाय से जुड़ना चाहते थे। क्योंकि उन्हें लगता था कि इससे ‘उनकी अंतिम यात्रा में उन्हें कंधा देने वाले बहुत-से लोग मौजूद रहेंगे।’ फंडा यह है कि जिंदगी की असली दौलत यह नहीं कि पैसा आपके लिए क्या खरीद सकता है, बल्कि यह है कि किसी दूसरे का दर्द कम करने में यह कैसे मदद कर सकता है। कमाई आपके बिल चुका सकती है, लेकिन जो भी आपके पास है, उसे बांटना किसी दूसरे का बोझ हल्का कर सकता है।
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एन. रघुरामन का कॉलम:पैसा किसी का दर्द कम न कर सके तो उसके कोई मायने नहीं हैं
