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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के वन भूमि से अतिक्रमण हटाने के आदेशों के बाद तिब्बती शरणार्थियों की बस्तियों पर बेदखली का डर है। सेंट्रल तिब्बतन रिलीफ कमेटी (सीटीआरसी) ने प्रदेश सरकार और केंद्रीय गृह मंत्रालय से राहत मांगी है। समिति ने सरकार को बताया कि इन शरणार्थियों को दशकों पहले सरकार की सहमति से बसाया गया था। इन्हें हाल के अतिक्रमणों जैसा नहीं माना जाना चाहिए। उनका तर्क है कि ये बस्तियां वन संरक्षण अधिनियम, 1980 से पहले बनी थीं। सीटीआरसी के अनुसार कांगड़ा, मंडी और कुल्लू-मनाली की कुछ तिब्बती बस्तियों और धार्मिक स्थलों पर बेदखली का डर है। मैकलोडगंज में करीब 218 परिवार और रिवालसर में 42 ध्यान गुफाएं व धार्मिक स्थल प्रभावित हो सकते हैं। समिति हाईकोर्ट के आदेश का विरोध नहीं कर रही, बल्कि मांग कर रही है कि इन पुरानी बस्तियों के लिए अलग नीति बने। इसमें उनके ऐतिहासिक और पुनर्वास संबंधी दस्तावेजों का ध्यान रखा जाए। 2014-2015 की नीति का दिया हवाला
सीटीआरसी ने अपने प्रतिवेदन में केंद्रीय पुनर्वास नीति-2014 और हिमाचल प्रदेश की 2015 की नीति का भी हवाला दिया है। समिति की दलील है कि इन नीतियों के तहत वास्तविक रूप से बसाए गए शरणार्थियों और जानबूझकर सरकारी या वन भूमि पर कब्जा करने वाले लोगों को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए। समिति का कहना है कि तिब्बती परिवार कई दशकों से इन स्थानों पर रह रहे हैं और उनकी बस्तियां अचानक किए गए कब्जे का परिणाम नहीं हैं। जब तक समाधान न निकले, कार्रवाई रोकने की मांग
राहत समिति ने सरकार से मांग की है कि केंद्र और राज्य स्तर पर मामले का नीतिगत और कानूनी समाधान निकलने तक तोड़फोड़ या जबरन बेदखली की कार्रवाई नहीं की जाए। इसके लिए मुख्य सचिव, वन विभाग और केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधिकारियों की संयुक्त अंतर-विभागीय बैठक बुलाने का आग्रह भी किया गया है। सरकार के सामने दोहरी चुनौती
मामला अब सरकार के सामने इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि एक तरफ हाईकोर्ट के वन भूमि से अतिक्रमण हटाने के निर्देशों का पालन करना है, वहीं दूसरी तरफ दशकों पहले पुनर्वास प्रक्रिया के तहत बसाए गए तिब्बती शरणार्थियों के दावों पर भी निर्णय लेना होगा।
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हिमाचल में तिब्बती शरणार्थियों पर बेदखली का डर:सरकार से राहत मांगी; बोले- हम नए अतिक्रमणकारी नहीं, दशकों पहले बसाए गए
