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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को झारखंड में डीजीपी की नियुक्ति से जुड़े नियमों पर सुनवाई की। कोर्ट ने इन नियमों को अपने पहले के एक आदेश के विपरीत बताया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की खंडपीठ ने झारखंड के डीजीपी को पद से हटाने का आदेश देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी ऐसे अधिकारी की नियुक्ति रद्द करने से पहले उसका पक्ष सुनना जरूरी है, जिस पर फैसले का सीधा असर पड़ेगा। कोर्ट ने डीजीपी तदाशा मिश्रा को पक्ष रखने का नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने कहा कि यदि संबंधित नियमों को रद्द किया जाता है, तो इसका असर वर्तमान डीजीपी की नियुक्ति पर भी पड़ सकता है। इसलिए उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जा रहा है। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और झारखंड सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पक्ष रखा। मालूम हो कि केंद्र सरकार ने झारखंड सरकार की डीजीपी नियुक्ति नियमावली-2025 को चुनौती दी है। शीर्ष अदालत ने 6 महीने की शर्त पर उठाया सवाल सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड की नियमावली के उस प्रावधान पर आपत्ति जताई, जिसके तहत ऐसे अधिकारी भी डीजीपी पद के लिए पात्र हो सकते हैं, जिनकी सेवानिवृत्ति में छह माह से कम समय बचा हो। कोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान प्रथम दृष्टया प्रकाश सिंह मामले में दिए गए उसके निर्देशों के विपरीत दिखाई देता है। कोर्ट के पूर्व के आदेश में स्पष्ट है कि डीजीपी के लिए विचार किए जाने वाले अफसरों के पास सेवानिवृत्ति से पहले कम से कम छह माह की सेवा बची होनी चाहिए। वहीं डीजीपी चुने जाने के बाद अधिकारी को कम से कम दो वर्ष का कार्यकाल दिए जाने की व्यवस्था है। डीजीपी का चयन यूपीएससी द्वारा तैयार पैनल में शामिल अधिकारियों से किया जाना है। जबकि, झारखंड में डीजीपी तदाशा मिश्रा की नियुक्ति 30 दिसंबर 2025 को हुई थी। जबकि उनकी सेवानिवृत्ति 31 दिसंबर को होनी थी। यानी नियुक्ति से एक दिन पहले डीजीपी बनाया गया। सरकार ने इससे एक दिन पहले नियमावली में संशोधन करके कम से कम 6 माह की शेष सेवा की बाध्यता हटा दी थी। अदालत ने इस पर सवाल उठाया है। आगे क्या… नियम रद्द हुआ तो नियुक्ति पर भी असर सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि यदि झारखंड की डीजीपी नियुक्ति नियमावली को रद्द किया जाता है तो उसका असर तदाशा मिश्रा की नियुक्ति पर भी पड़ सकता है। इसी कारण कोर्ट ने उन्हें पक्ष रखने का अवसर देना जरूरी माना। राज्य सरकार को भी नियमावली पर पुनर्विचार करने के लिए कहा गया है। सुनवाई के दौरान झारखंड सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि सरकार नियमावली की समीक्षा करेगी। उन्होंने पश्चिम बंगाल और पंजाब सहित अन्य राज्यों राज्यों में बनी ऐसी व्यवस्था की भी समीक्षा होनी चाहिए। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने एमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन को निर्देश दिया है कि वे दूसरे राज्यों में डीजीपी की नियुक्ति से संबंधित कानून, नियम और नियुक्तियों का अध्ययन कर रिपोर्ट दें।
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झारखंड की डीजीपी तदाशा मिश्रा को नोटिस, जवाब मांगा:डीजीपी को हटाने का आदेश देने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, कहा- पक्ष सुनना जरूरी
