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‘हमें दिन में 12 घंटे काम करना पड़ता है। समय पर पैसे नहीं मिलते। सप्ताह की कोई छुट्टी नहीं। महीने के 30 दिन काम। बीमारी या थकान की वजह से छुट्टी लेते हैं तो सैलरी काट ली जाती है। सात-आठ महीने बाद, जब हमने गांव जाने के लिए छुट्टी मांगी तो सेठ (मालिक) ने हमारी सैलरी रोक दी और निकाल दिया।’ ‘हफ्ते में एक छुट्टी मांगने वाले 250 से 300 लोगों को नौकरी से निकाला गया। मजदूरों पर दबाव डाला जा रहा है। इसलिए हम घर जा रहे हैं। अब अगर सेठ को हमारी जरूरत होगी और हमें बुलाएंगे, तो हम आएंगे।’ ये शब्द सूरत के उन बेबस मजदूरों के हैं जो बिहार और उत्तर प्रदेश लौट रहे हैं। फैक्ट्री मालिकों के शोषण (जिसमें वीकली ऑफ मांगने पर सैलरी काटना शामिल है) के खिलाफ शुरू हुआ ‘गांव चलो आंदोलन’ अब जोर पकड़ चुका है। सूरत शहर और जिले के लगभग 10 लाख मजदूर बिहार लौट रहे हैं। शुक्रवार को बड़ी संख्या में मजदूर अपने घर लौटने के लिए रेलवे स्टेशनों पर पहुंचे। सूरत रेलवे स्टेशन पर लंबी लाइन लग गई। यहां मजदूरों ने दिव्य भास्कर को अपनी पीड़ा और सेठ द्वारा किए जा रहे शोषण के बारे में बताया। पढ़िए रिपोर्ट… सिर्फ दिलासा देते हैं, बाद में कोई कुछ नहीं सुनता: प्रेमचंद्र अपनी मजबूरी और दर्द बताते हुए अयोध्या लौट रहे मजदूर प्रेमचंद्र ने कहा, ‘हफ्ते में एक रविवार की छुट्टी मिलनी चाहिए, लेकिन छुट्टी नहीं मिलती। मजदूर छुट्टी मांगते हैं तो मालिक पहले तो हां बोलकर दो हफ्ते की छुट्टी दे देते हैं और बाद में अपनी बात से मुकरकर पुराना सिस्टम शुरू कर देते हैं।’ मालिक ने कहा- संडे की छुट्टी नहीं मिलेगी, जाना है तो जा सकते हो अपने परिवार से दूर रहकर मेहनत करने वाले इन मजदूरों को छुट्टी लेना मुश्किल हो रहा है। घर जा रहे अजय ने बताया, ‘मुझे छुट्टी नहीं दी जा रही थी। मालिक ने साफ कह दिया है कि अगर छुट्टी लोगे तो सैलरी कट जाएगी।’ इलाहाबाद के राजीव कुमार पाल ने भी अपनी पीड़ा बताई। उन्होंने कहा, ‘सैलरी न बढ़ने और छुट्टी लेने पर सैलरी काटने की पॉलिसी की वजह मैं घर जा रहा हूं। मैंने सप्ताह की छुट्टी मांगी तो मालिक ने सीधे कह दिया कि संडे की छुट्टी नहीं मिलेगी, अगर जाना है तो जा सकते हो।’ ‘सूरत में गुलाम बनने से अच्छा है गांव में खेती करना’ फैक्ट्री मालिकों के शोषण से परेशान होकर लौट रहे मजदूरों ने गांव में छोटी-मोटी नौकरी और खेती करने का फैसला लिया है। UP के प्रयागराज के लिए निकले बृजेश निषाद ने कहा, ‘मैं चार-पांच महीने से यहां काम कर रहा था। मांगने पर भी छुट्टी नहीं मिलती थी। इसलिए गांव जा रहा हूं। सप्ताह में एक दिन छुट्टी लेता था तो मालिक उस दिन की सैलरी काट लेते थे। मैं गांव जा रहा हूं। वहां रेत में खीरा उगाकर गुजारा कर लूंगा। सूरत में गुलाम बनने से अच्छा गांव में खेती करना है।’ अपने घर लौट रहे अजय ने कहा, ‘गांव जाकर जो भी काम मिलेगा करूंगा।’ 12 घंटे काम करने के बाद भी सैलरी रोकी गई सिर्फ छुट्टी ही नहीं, बल्कि काम के घंटे और सैलरी रोकने की धमकियों ने वर्कर्स को अंदर से पूरी तरह तोड़ दिया है। मनोज कुमार सिंह नाम के एक वर्कर ने कांपती हुई आवाज में कहा, ‘मुझे 12 घंटे ड्यूटी करनी पड़ती थी। सैलरी भी समय पर नहीं मिल रही थी। गांव जाने के लिए छुट्टी मांगी तो नहीं मिली। सैलरी भी रोक दी गई। मेरे साथ फैक्ट्री से निकाले गए 25-30 लोग गांव जा रहे हैं। अब गांव में खेती करेंगे।’ ‘सेठ बुलाएंगे तभी आएंगे, 30 दिन काम नहीं करेंगे’ मजदूर महीने के 30 दिन लगातार काम करने का प्रेशर नहीं झेल पा रहे हैं। शिववंदन कुमार नाम के एक मजदूर ने गुस्से में कहा, ‘मालिक ने मुझसे 12 घंटे ड्यूटी करवाई और गेट से बाहर निकाल दिया। मजदूरों ने महीने में 26 दिन ड्यूटी करने की बात की। मालिक ने 30 दिन काम करने को कहा तो काम करने से मना कर दिया।’ उन्होंने कहा, ‘अब मैं गांव जा रहा हूं। जब सेठ को आदमियों की जरूरत होगी तो वह बुला लेंगे, नहीं तो वह वापस नहीं आएंगे। अब आऊंगा तो भी महीने के 30 दिन काम नहीं करूंगा।’ लेबर यूनियन ने कहा- मजदूरों की सैलरी रोककर उन्हें परेशान किया जा रहा है। मजदूरों के इस पलायन के बीच लेबर यूनियन उनकी मदद के लिए आ गई हैं और मालिकों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। लेबर यूनियन के प्रतिनिधि अजय डी. दूबे ने कहा कि ‘गांव चलो’ आंदोलन के तहत बड़ी संख्या में मजदूर गांव जा रहे हैं। उनकी टीम इन मजदूरों को पानी और बिस्किट दे रही है। दूबे ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि इस आंदोलन की शुरुआत से ही मालिक मजदूरों को बहुत परेशान कर रहे हैं। उन्हें नौकरी से निकाल रहे हैं, जिसके सबूत के तौर पर उनके पास कई वीडियो भी हैं। सूरत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री के भविष्य के लिए बड़ा खतरा यह स्थिति दिखाती है कि सूरत की एम्ब्रॉयडरी इंडस्ट्री में वर्कर्स का कितना भयानक मानसिक और आर्थिक शोषण हो रहा है। कारीगर, जो इस इंडस्ट्री की रीढ़ हैं, उनका ऐसा पलायन भविष्य में टेक्सटाइल मार्केट के लिए बड़ी समस्या खड़ी कर सकता है। अगर वर्कर्स की वीकली लीव और इंसानियत भरे बर्ताव की मांगें मैन्युफैक्चरर्स ने जल्द से जल्द नहीं मानीं तो सूरत की यह चमकती हुई इंडस्ट्री कारीगरों की कमी के कारण अंधेरे में जा सकती है।
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गुजरात में गांव चलो आंदोलन-बिहार लौट रहे 10 लाख मजदूर:सूरत रेलवे स्टेशन पर लंबी लाइन, लोग बोले-छुट्टी मांगी तो सेठ ने निकाला, अब वहां नहीं जाएंगे
