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Youth Memory Loss & AI Dependency


चाबी कहां रखी, गाड़ी किस पार्किंग में खड़ी की, सामने वाले ने क्या कहा या जरूरी काम कब करना है- युवा रोजमर्रा की ऐसी बातें भूलने लगे हैं।

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मोबाइल, गूगल और AI पर बढ़ती निर्भरता से कुछ लोगों में खुद जानकारी याद रखने और अपनी याददाश्त पर भरोसा करने की आदत प्रभावित हो रही है। इसका असर पढ़ाई, काम और जिम्मेदारियों पर पड़ रहा है।

कंसल्टेंट क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. अंजलि सहाय के क्लिनिकल ऑब्जर्वेशन के मुताबिक, पिछले 3-4 साल में उनके पास आने वाले युवाओं में 60-70% को भूलने, ध्यान न टिकने या चीजें याद न रहने की शिकायत है।

5-8 साल पहले यह अनुपात 30-40% था। यह उनके पास आने वाले लोगों का अनुभव है, पूरी आबादी का सर्वे नहीं।

हर जवाब मोबाइल में, खुद याद करने की कोशिश कम

मेमोरी तब बनती है, जब हम किसी चीज को देखते, सुनते या अनुभव करते हैं। जानकारी को दोहराने और याद करने से दिमाग में बना स्मृति चिन्ह मजबूत होता है।

जरूरी बातें मोबाइल में सेव करने और हर सवाल का जवाब गूगल या AI से लेने की आदत खुद याद करने की कोशिश कम कर सकती है।

जवाब पता होने के बावजूद मोबाइल चेक करने की जरूरत महसूस होना भी निर्भरता का संकेत हो सकता है। तकनीक काम आसान करती है, लेकिन जरूरत से ज्यादा निर्भरता अपने जवाब और क्षमता पर भरोसा कम कर सकती है।

भूलने से आत्मविश्वास घटा तो एंग्जाइटी का खतरा

बार-बार भूलने से व्यक्ति को डर लगने लगता है कि कहीं जरूरी काम छूट न जाए। यह चिंता एंग्जाइटी, नकारात्मक विचार और घबराहट बढ़ा सकती है। कुछ लोग लोगों से मिलना-जुलना भी कम कर देते हैं, जिससे अकेलापन बढ़ सकता है। हालांकि, हर व्यक्ति में ये सभी स्थितियां बनें, यह जरूरी नहीं है।

32 साल के मेडिकल स्टूडेंट को सबमिशन तक याद नहीं रहते थे

एक 32 साल का मेडिकल स्टूडेंट मोबाइल और आईपैड में जरूरी काम नोट करता था, लेकिन सबमिशन, जरूरी कॉल और पेमेंट भूलने लगा। तय समय पर लोगों से मिलने भी नहीं पहुंच पाता था। इसका असर उसके काम पर पड़ा। उसे एक महीने के लिए सस्पेंड किया गया और नोटिस भी मिला।

इसके बाद उसने मनोवैज्ञानिक से मदद ली। उसे पॉकेट डायरी में काम लिखने, घर से निकलने से पहले जरूरी सामान चेक करने, दिनचर्या व्यवस्थित करने और कुछ समय गैजेट से दूरी बनाने की सलाह दी गई।

17-18 साल के छात्र को भी थी याद रखने में परेशानी

एक अन्य मामले में छात्र की मां नौवीं-दसवीं तक उसका बैग तैयार करती थीं, किताबें-टिफिन व्यवस्थित करती थीं और होमवर्क पर नजर रखती थीं। स्कूल से शिकायतें आने पर छात्र कहता था, ‘मैं क्या करूं, मुझे याद ही नहीं रहता।’ बच्चों को धीरे-धीरे अपना बैग तैयार करने और जरूरी कामों की जिम्मेदारी खुद निभाने की आदत डालनी चाहिए।

हर भूल अल्जाइमर नहीं, लेकिन लगातार परेशानी को न टालें

चाबी भूल जाना या कोई बात याद न आना अपने आप में अल्जाइमर का संकेत नहीं है। सामान्य भूल में व्यक्ति को कुछ देर बाद याद आ सकता है कि वह क्या भूल गया था। डिमेंशिया में मेमोरी के साथ सोचने-समझने और रोजमर्रा के काम करने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, डिमेंशिया उम्र बढ़ने का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। याददाश्त की परेशानी लगातार बनी रहे और काम प्रभावित हों तो चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।

परिवार से बातचीत और सामाजिक मेलजोल भी जरूरी

घर में हर व्यक्ति अपनी स्क्रीन में व्यस्त रहे तो बातचीत का समय कम हो सकता है। दोस्तों से मिलना, परिवार के साथ समय बिताना और पुराने अनुभव साझा करना मानसिक सक्रियता बनाए रखने में मदद कर सकता है।

लगातार गैजेट में व्यस्त रहना और सामाजिक गतिविधियों से कटना भी ध्यान देने योग्य बदलाव हैं।

डॉ. अंजलि सहाय के मुताबिक, टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करें, लेकिन हर काम के लिए उस पर निर्भर न रहें। खुद पर भरोसा रखें और याददाश्त की परेशानी लगातार बनी रहने पर विशेषज्ञ से सलाह लें।

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